गांव तो मैने 1975 में ही छोड़ दिया था जब एम ए की शिक्षा लेने गोरखपुर जाना पड़ा। किन्तु 1977 के बाद जब नौकरी लग गई तो गांव आना कम हो गया। वैसे तो मां-बाबूजी के कारण प्राय: महीने में दो तीन बार गांव आ जाता किन्तु दो तीन दिन से अधिक न रह पाता। केवल गर्मी की छुट्टी में या दूसरी लम्बी छुट्टियों में ही ज्यादा दिन के लिए आने का अवसर मिल पाता। 1982 में मां चल बसी। बाबूजी टूट गए। वे कभी हम लोगों के पास आते कभी गांव। उनका मन कहीं नहीं रमता, किन्तु ज्यादातर गांव में ही रहते। हम उनकी सुविधाओं की समुचित व्यवस्था न कर सके। यद्यपि उनके लिए हम गांव आते –जाते रहे, किन्तु इससे भला उनका कितना कष्ट दूर होता। हां उनके दोनो पुत्र प्रतिष्ठित नौकरियों में आ गए थे। यही उनके लिए सबसे बड़ी संजीवनी थी और इसी के बल पर वे अपने जीवन के बाकी दिन अकेले काट रहे थे। 1991 में बाबूजी भी चल बसे। अब गांव में हमारा आना-जाना और कम हो गया। 1994 में मैने कलकता की राह ली। अब गांव आना और भी कम हो गया। अमूमन साल में एक-दो बार ही गांव आ पाता अधिक से अधिक एक सप्ताह रुकता और फिर कलकत्ते की राह लेता। मां-बाबूजी के न रहने से गांव में बिलकुल मन न लगता। इस बीच मेरे अनुज भी बीएचयू चले गए और गांव से संपर्क क्षीण से क्षीणतर होता गया।
अप्रैल 2013 के अन्तिम हफ्ते जब गांव आया तो पूरे पन्द्रह दिन रुका। इस बीच जी पी ( ज्ञान प्रकाश शर्मा ) के यहां से निमंत्रण आया भोजन का। पता चला कि उनके यहां आम के पेड़ का विवाह है। इसी उपलक्ष्य में उन्होंने एक भोज का भी आयोजन किया है। ख्याल आया, लगभग चालीस साल पहले हमारे घर में भी आम की शादी हुई थी। हमारे आम के बाग के दो पेड़ बाद में लगाए गए थे- लहसुनवा और सेंनुरिहवा। दोनो पेड़ों के फल हमारे बाबूजी और मां तब तक नहीं खाए जब तक उन दोनो पेड़ों का विवाह नहीं हो गया। आज उन दोनो पेड़ों का अस्तित्व भी नहीं है।
मुझे आश्चर्य मिश्रित खुशी हुई कि आज के उत्तरआधुनिक युग में भी गांवों में वृक्षों के प्रति रागात्मक लगाव बचा हुआ है। पूर्वजों ने वृक्षों को अपने परिवार के सदस्यों की तरह ही पाला पोसा और ममता दिया। वह अपनत्व आज भी बरकरार है -यह देखकर मेरे खुशी का ठिकाना नहीं था। अपनी संतान की तरह उनका भी विवाह और उसके बाद ही उनके फलों का स्वाद लेना –प्रकृति से ऐसा रिश्ता क्या दुनिया के अन्य देशों में भी होता होगा? नहीं जानता। किन्तु हमारे पूर्वजो की इस देन के लिए उनके प्रति श्रद्धा में सिर जुक जाता है। अपनी परंपरा को सिरे से नकारने वालो! परंपरा के इस उदात्त मूल्य के प्रति तुम्हारी क्या धारणा है?
यह परंपरा गांव में अभी मौजूद है किन्तु पश्चिमी सभ्यता के रंग में रंगे बड़े बड़े उद्योगपति जंगल के जंगल काटते जा रहे हैं, पशु पक्षियों का विनाश करते जा रहे हैं और इसके साथ ही मानवता के विनाश के लिए गहरी खाई खोदते जा रहे हैं। संभव है उन्हें आम के विवाह की कथा सुनकर हँसी आए किन्तु मैं तो जी पी के इस अनुष्ठान के प्रति नतमस्तक हूँ और उनके यहाँ भोज में बड़े उल्लास से शामिल हुआ।
परन्तु क्या उक्त अनुष्ठान के आधार पर यह कहा जा सकता है कि गांव में अभी भी पुरानी उदात्त परंपराएं जिन्दा हैं? गांव के लोग अब भी उतने ही सीधे सादे सरल और अपने पड़ोसियों के प्रति संवेदनशील है? क्या वे अब भी उतने ही ईमानदार और सच्चरित्र हैं? मेरी स्मृतियों में कुछ संदर्भ हैं, कुछ ऐसी घटनाएं झिलमिला रही हैं जिनसे आज के अपने गांव की तुलना करें तो एक दूसरा ही और भयावह दृश्य उभर कर सामने आता है।

निस्संदेह भौतिक दृष्टि से हमारे गांव का विकास हुआ है। प्रो। शिब्बन लाल सक्सेना के प्रयास से इस पिछड़े और तथाकथित तराई के इलाके में महाराजगंज में इटरमीडिएट और डिग्री कालेज खुल गया था। मैंने इंटर और बीए तक की शिक्षा महाराजगंज में गांव से पैदल जाकर ही हासिल की। यदि महाराजगंज में कालेज न होता तो? महाराजगंज से गांव तक कच्ची सड़क हुआ करती थी जिसमें अनवरत बैलगाड़ियों के चलने के कारण बड़े- बड़े गड्ढे होते थे। जंगल से लकड़ियां लेकर रात दिन बैलगाड़िया चलती रहती थीं जो घुघली, सिसवा और आगे भी बहुत दूर तक जाती थी। गदुलहिया टोला जिसे आजकल रामपुर चौराहा कहते हैं में पन्द्रह-बीस पेड़ों का बाग था और उन पेड़ों पर असंख्य गादुल (चमगादड़) लटके रहते थे। उतने बड़े-बड़े गादुल मैने और कहीं नहीं देखे।

हमारे गांव में कई बड़े-बड़े तालाब थे प्राय: हर टोले पर। उन तालाबों का पानी हमेशा स्वच्छ रहता था । हम उसमें प्राय: नहाते थे गर्मियों के दिन में दोपहर के समय अमूमन बच्चे और जवान तालाबों में नहाते, अपने पशुओं को नहलाते। प्राय: हर कोई तैरना सीख लेता। अब वे तालाब अपने अस्तित्व को समेट रहे हैं और मैले कुचैले उपेक्षित पड़े हैं। उस समय प्राय: पीने के लिए भी कूँए (इनार) के पानी का इस्तेमाल होता था गर्मियों में कुओं के जल का स्तर कुछ नीचे जरूर चला जाता था किन्तु पानी की किल्लत सुनने में नहीं आती थी। लगातार इस्तेमाल होने से कुएं के पानी हमेशा साफ रहते और उसे पीने से किसी को पेट का रोग सुनने में नहीं आता था। खेतो की सिंचाई के लिए भी अमूमन कच्चे कुँए खोदे जाते और बरसात आने पर वे पाट दिए जाते। गांव के हर टोले पर पक्के कुएं जरूर होते। संपन्न लोग पक्के कुंए और पोखर लोक हित में खुदवाते। कुंआ खुदवाना पुण्य का काम माना जाता। आज कुँओं की संस्कृति बिलकुल खत्म हो चुकी है। गांव के पास की रेहाव नदी जो पानी से सदा भरी रहती थी, नदुआ बाजार जाने वाले लोगों को नौका से नदी पार करना पड़ता था, गर्मियों में भी छाती तक पानी में नदी पार करना पड़ता था- आज लगभग जलविहीन हो चुकी है। मैने देखा रामघाट पर एक पुल है जिसपर नदी न लिखकर रेहाव नाला लिखा हुआ है। कहां गई हमारी वह उफनाने वाली प्यारी नदी?
मुझे लगता है कि मेरे गांव में पहले गरीबी जरूर थी किन्तु आत्मनिर्भरता भी थी। पूरा गांव स्वावलम्बी था और परस्पर सहयोग के बलपर गांव के गरीब भी निर्द्वन्द्व रहते थे। किसानों की आत्महत्या की कौन कहे, डिप्रेशन, सूगर और बलडप्रेशर जैसे रोग गांव में सुनने को भी नहीं मिलते थे। हफ्ते में एक ही अच्छा बाजार लगता था नदुआ बाजार। लोग बाजार जाते और हफ्ते भर के लिए नमक, मिट्टी का तेल और मसाले खरीद लाते थे, बाकी चीजे अपने जरूरत भर की सभी खुद पैदा कर लेते थे। हर टोले पर प्राय: कोल्हू गड़ता था। गुड़( भेली ) और राब सभी अपनी जरूरत भर की बना लेते थे जो साल भर चलता था। मेरे घर में एक डेहरी होती थी जिसमें हर साल सिर्फ भेली रखा जाता था और साल भर खराब नहीं होता था। हाँ बाद में वह कुछ गीला जरूर हो जाता था। राब तो बड़े से हाँड़ी ( मिट्टी का पात्र ) में रखा रहता था और हम गर्मियों मे प्राय: रोज ही राब का रस बनाकर पीते -दही या नीबू का रस डालकर। उससे जो बचता वही गन्ना सुगर मिल में भेजा जाता। बाकी लहसुन, प्याज, आलू तथा सब्जियां आदि सभी लोग अपनी जरूरत भर की खुद पैदाकर लेते और सालभर उसका उपयोग करते। हमारे गांव का कोइरी समुदाय ही नहीं, दूसरे लोग भी भरपूर मात्रा में सब्जियां उगाते और अपने उपयोग के बाद बाजार में भी बेच आते। हर घर में कोई न कोई पशु जरूर होता- बैल, गाय या भैंस। जिनकी हैसियत अच्छी नहीं होती, या कम खेती होती वे अमूमन एक बैल रखते और दूसरा बैल किसी दूसरे का लेकर खेती का काम कर लेते। भरपूर मात्रा में गोबर की खाद होती या कम्पोस्ट की खाद। हर साल एक बार यह देसी खाद खेतों में जरूर पड़ती। रासायनिक खाद गिने-चुने लोग डालते। देशी खाद पाकर जो अन्न पैदा होता उसका स्वाद ही निराला होता। अब तो सिर्फ मैं उसकी कल्पना ही कर सकता हूं।
सत्तर के दशक में भी हमारे गांव में गूहूं पीसने और चावल कूटने की मशीन नहीं थी। घर की महिलायें ही घर के सदस्यों को खाने के लिए घर में चक्की ( जांता ) पर गेहूं पीसतीं तथा ढेकी पर धान कूटतीं। रात तीन बजे ही घर की महिलाएं जग जातीं और जाँत पर बैठ जातीं। घर में अगर एक से अधिक महिलें होती तो जांत पर दो बैठती और जँतसार गाते-गाते दो तीन घंटे मे घर भर के लिए आटा पीस देतीं। इसी तरह घरों में धान कूट लिया जाता। धान कूटने के लिए तो दो महिलाओं का होना जरूरी होता। यदि किसी के घर कोई आयोजन होता तो पड़ोसी बांटकर आटा पीसते, चावल कूटते और चिउड़ा भी कूटते। सबेरा होते होते इन कामों को निपटा दिया जाता और नित्य क्रिया करके अन्य कामों में लग जाती। इतना शारीरिक श्रम करने वाली महिलाएं यदा- कदा ही बीमार पड़ती। किन्तु जब बीमार पड़ती तो आम तौर पर समुचित इलाज के अभाव में दम तोड़ देतीं।

अन्य गांवों की तरह हमारे गांव में भी अलाव की एक समृद्द संस्कृति थी। मैं अलाव ( कउड़ा ) को सिर्फ जाड़े से निपटने का एक साधन मात्र नही मानता। मैं इसे एक संस्कृति मानता हूँ जिसका अब अन्त हो चुका है। पहले आम तौर पर हर घरों के सामने या बरामदे में अलाव जलता था। इसके लिए जाड़ा आरंभ होते ही नियत स्थान पर अलाव के लिए एक छोटा सा गड्ढा खोद लिया जाता था। अलाव जलाने की एक खास विधि होती थी। सबसे पहले गड्ढे में कुछ उपले (गोइंठा), फिर ऊपर से कूटे हुए धान की भूसी, उसके ऊपर धान का पइया, फिर पुरकेसा और तब उसके ऊपर पुआल, पत्ता आदि कुछ भी जलने वाली चीज। आग लगाते समय बहुत मजा आता। बहुत से लोग उसे घेर कर बैठते और देर तक अलाव तापते। उस अलाव में आग सुबह भी रहती अमूमन दस बजे तक। घर के बुजुर्ग लोग जल्दी ही जग कर अलाव के किनारे बीड़ा( बैठने का आसन जो पुआल से बनाया जाता था ) या मचिया पर बैठ जाते और बतकही शुरू हो जाती। बीड़ा बनाने की कला में ज्यादातर लोग माहिर होते। एक अलाव के किनारे कम से कम पांच –छछ लोगों के बैठने की जगह होती। बतकही का कोई अन्त नहीं होता। यह अलाव उस समय जाड़े से मुक्ति तो दिलाता ही स्वस्थ मनोरंजन भी करता। बड़ी बड़ी समस्याएं अलाव के किनारे बैठे-बैठे हल कर ली जातीं। यह अलाव हमें जोड़ने का बहुत बड़ा साधन था जो अब खत्म हो चुका है। सच है, पूंजीवाद हमें एकाकी बनाता है। अलाव अब संभव नहीं क्योंकि उसमें उपयोग आने वाली वस्तुओं का उत्पादन अब नही होता। गाँवों में अब पशु बहुत कम हैं इसलिए गोइंठा (उपले) दुर्लभ है। धान की कुटाई घरों में नहीं होती इसलिए भूसी अब नही मिलती और खेतों में ही मशीन से धान की कटाई और उसकी ओसाई भी हो जाती है इसलिए पुरकेसा भी अब दुर्लभ है। ऐसी दशा में अपने समाज को जोड़ने वाला एक बहुत बड़ा माध्यम हमेशा के लिए हमने खो दिया है। क्या इसकी भरपायी संभव है?
आज से तीस-पैंतीस साल पहले मेरे गांव में एक भी स्कूल नहीं था। हमारी प्राइमरी शिक्षा पड़ोस के गाँव सोनरा में हुई। वहाँ एक प्राथमिक विद्यालय था। विद्यालय 10 बजे से 4 बजे तक चलता। वहां अमूमन चार से पाँच अध्यापक होते और वे बड़ी ईमानदारी और मेहनत से बच्चों को पढ़ाते। प्रधानाध्यापक के हाथ में छड़ी जरूर रहती और गलतियां करने पर हमें सजाएं भी मिलती।
(लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर रहे हैं।)
शेष अगली कड़ी में।

