पटना जिले के परसा गांव के कुओं और पानी की व्यवस्था ने यूं बदला ग्रामीण जीवन

प्रतिमा कुमारी पासवान
पानी रे पानी,तेरी भी ऐसी कहानी,तुझसे है जीवनधारा,लेकिन मानवों ने ही किया तेरा भी वारा न्यारा,
सारे पाप भी तुझमें धोए,सभी अनुष्ठानो में भी लेते तेरा सहारा,जिससे पूरा जीवन से मरण तक बिना पानी बिन जीवन शून्य है।
तब भी पानी को पूंजीपतियों के हाथों बेच दिया जाता है,
पानी ही जीवन की है जननी और जननी को केवल पूजते हैं,उसकी इज्जत नहीं करते जैसे नारी को पूजते है, दुष्कर्म उसी का करते हैं,
पानी भी जननी है इसका भी दोहन,शोषन करते हैं,
सरकारें भी कर डालती हैं पूंजीपतियों के हाथों इसे बेचती हैं
पानी री पानी तेरी भी,ऐसी कहानी,तू है जीवन की जननी,
तू नदियों की कलकल धारा,तू कुएं की गहराई से भी देती रही
जीवन की तरुनाई,
मनुष्यों फिर हर डेग,छेद–छेड़ निकालते रहे पंपों से
मनुष्य दिशाहीन हो चला,खुद से ही अपना जीवन छीन चला… पानी से पानी तेरी ऐसी कहानी।

 

हम पानी की सिमटती हुई जीवनधारा के साथ-साथ मानव के सामाजिक जीवन के बदलते रूप एवं प्रभाव से रूबरू कराने के लिए चले चलते हैं पटना जिले के परसा बाजार रेलवे स्टेशन के निकट के अंजनी गांव  की ओर। पटना गया रेलवे लाइन का पटना स्टेशन से पहला स्टेशन परसा बाजार है। स्टेशन से सटे गांव की 65 वर्षीया देवंती देवी ने बातचीत में पानी की पूरी कथा ही सुना डाली। देवंती कहती हैं.. जब वह शादी के बाद यहां रहने लगी तब बड़े से घूंघट में बगल के कुएं से पानी लाने जाया करती थी। बिल्कुल मेरे घर के पास बहुत बड़ा कुआं था। लोग बताते थे की यह कुआं अंगेजों द्वारा बनवाया गया था। यह कुआं दलित बस्ती में थी। इस कुएं को लगभग दस साल पहले भर दिया गया लेकिन उस कुएं ने सौ साल से अधिक लोगों को जीवन दिया। बहुत दूर—दूर से लोग पानी भरने आते थे। गुजरने वाले राहगीर से लेकर कई टोले के लोगों का जमावड़ा इस कुएं पर होता था। सुनने में अतिशयोक्ति लग सकता है लेकिन यह हकीकत है कि एक ही कुएं में कई तरह का पानी था। एक तरफ के पानी से खाना बनाने पर चावल पीला—पीला दीखता था और दाल अच्छे से नहीं घुल पाता था। वहीं दूसरी तरफ से खाना न सिर्फ अच्छा पकता था बल्कि सुपाच्य भी था। वहीं दूसरी तरफ के पानी कपडे अच्छे से साफ़ होते थे। उस समय मिट्टी से नहाना और कपड़े धोने का काम होता था। दिन में बड़ी—बूढी औरतों का मजमा कुएं पर देखा जा सकता था। लेकिन मेरी उम्र की औरतें यानी नई नवेली बहू वहां रात को या सुबह-सुबह जाती थीं। कुएं से पानी निकाल कर गागर में भर लेती थी। गागर मिट्टी या लोहे का होता था। मेरे घर में लोहे का गागर था। उस समय आमतौर पर लोगों घर में घड़ी नहीं होती थी। सूरज ढ़लने के बाद लोग सोने लगते थे जैसे आज के सात बजे तक लोग सो जाते थे। दिया जलता था, किरासन तेल का इस लिए जल्दी खाना बना खा कर दिया बुझा कर सो जाते थे। उस समय बैल गाड़ी चला करती थी तो लोग दो बजे रात से ही बैल गाडी चलाना शुरू करते थे उसी समय सब सभी के घरों की नई,नवेली कनिया सब निकलती थी और शौच के लिए खेतों में साथ जाती और एक दूसरे से मन की व्यथा,पीड़ा अपने–अपने घर की समस्या, दर्द भी एक दूसरे को सुनातीं। पांच जातियों के लोग थे। खेतों में तो बातचीत हो जाती लेकिन पानी भरने के लिए कभी-कभी आपस में जाति को लेकर फुसर-फुसर होती या कहा सुनी भी हो जाती थी विशेष कर डोम,रविदास जातियों के साथ अधिक भेद–भाव होता थोडा दूरी बना कर खड़ा रहना पड़ता था,अगर उनके पास बाल्टी या रस्सी नहीं होती तब वह किसी मांग नही सकते थे बल्कि जिनका भी रस्सी बाल्टी होता वही पानी कुएं से निकाल कर उनके बर्तन में दूर से डाल देते। आप आसानी से इस में गवंई संस्कार महसूस कर सकते हैं कि एक ही व्यक्ति के साथ जाती के स्तर पर भेदभाव भी था लेकिन सहयोग भी था। यानी पानी जोड़ता भी था और पानी पर सब का अधिकार है, सबकी जरूरते हैं इसकी स्वीकार्यता भी थी। बहिस्कार नहीं था, पानी लेने के लिए  होता।

एक घर मुस्लिम भी थे वो लोग बहुत सारा मुर्गी पालते थे। कई बार कुएं में मुर्गी गिर के मर जाती थी। लोग उस परिवार को बोलने लगते थे। हमें याद है कि कुएं में एक बार उसी मुस्लिम परिवार की दस साल की बच्ची गिर कर मर गई तब से लोगों ने डर,और घृणा से उस कुएं का पानी पीना बंद कर दिए। बहुत दिनों तक केवल बर्तन धोने और मवेशियों के चारे एवं नहाने,कपड़े धोने के लिए इस्तेमाल किया। सब के घर में कांसे का बर्तन हुआ करता था। सभी औरतें कुएं पर बर्तन धोती थी तब बर्तन की चमक देखते बनती थी। औरतें,ननद, भाभी का रिश्ता लेकर एक दूसरे से हंसी मजाक करते हुए गीत गा कर एक दूसरे पर पानी फेक कर जीवन को खुशनुमा बनाती थी।
पानी भरे गइल हे ननदों पक्कवा ईनरवा हे
आहे तोहरे पीछे लगल हथु
तोहर जेठ भैया हे।
हथवा में लिहले जरुरिया
कमर पर गगरिया हे
कमर लचकइते तोहरो
देखे सब गांव के भैया हे
अहे झुल्फ़ी झरले चलल आथिन हमरो नन्दोईया हे।।
मर्द सब ज्यादातर नहाने के लिए कुएं पर आते थे जो जेठ लगते थे उनको देख कर ही कुएं से औरतें उतर जाती थी और देवर लगे तो पानी फेंक कर भींगा देती।
देवर हो अंगना में तुत रोपवा द
पक्कवा ईनरवा से
पनिया लिया द
देवर हो अंगना में तूत रोपवा द
गोरकी पतरकी जीभ बिरवा द
देवर हमरा के जलेबिया दिला द।
गांव घर के किसी भी जात बिरादरी का मर्द हो यह हंसी ठिठोली और बड़े के साथ का व्यवहार करना ही होता था। उस समय भी पुरुष हिंसक थे। कई बार इन सब बातों के लिए उन्हें मर्दों की नाराजगी का सामना करना पड़ता था। पिटाई भी औरतों की हो जाती थी। सभी समुदाय के सदियों में लोग यहां विधि करने आते थे। कुएं सामाजिक जीवन का सबसे बड़ा महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। हालाकि पिछड़ा बहुल इलाका होने की वजह से जातीय भेद–भाव कम था। छिटपुट आपसी भेदभाव दिखता था। जब से एक लड़की की मौत हुई तब गांव के अलग-अलग टोले में निजी कुआं लोगों ने बनाया।
गांव के अन्य कुएं
इस दौरान लगभग छह कुएं बनाये गए। लगभग हर जाति के लोगों में से किसी न किसी के दरवाजे पर कुआं बना लिया था किसी को कुएं से पानी भरने की मनाही कभी नहीं रही। नाही पानी के लिए कोई विशेष झगड़ा या तनाव हुआ। बल्कि आग और पानी सभी को देने की परम्परा रही है।

इन कुओं पर यदि नजर डालें तो सबसे पहले जेहन में आता है देवेन्द्र जी का कुआं। पहले लोग यहां से पानी पीते। राहगिरों के लिए यह कुआं सबसे उपयोगी था क्योंकि यह ऐसे रास्ते पर था जहां से लोग पैदल कोसों सफर करते थे। कुएं का पानी भी इतना मीठा था की गले तो तर करने के साथ–साथ मुंह में भी मिठास भर देता था। शादी व्याह में लोग पंनकटती रस्म करने आते थे। कुएं से 100 मीटर दूरी पर एक और आम का पेड़ और शीतला मन्दिर और बगल में महुआ का पेड़ था। इस लिए यह रस्म के लिए उचित स्थान माना जाता था। यह रस्म वर या कन्या दोनों पक्षों में होता है तो लड़का या लड़की दोनों में से कोई हो और उस घर की महिलाऐं सज सवंर के पीतल की थाली में खेसाड़ी का दाल लेकर और बांस की डलिया में कच्चा लडुआ और चना लेकर मंदिर में पूजा करते हैं। आम महुआ होता है फिर कुएं पर आकर पानी भरती हैं और दाल को ननद से मिलवाया जाता है। ननद को इसके एवज में नेग में पैसे मिलते हैं और गालियों वाली गीत गाए जाते है। आज भी यह कुआं है।

इसके अलावा रामानन्द पासवान का कुआं पश्चिम टोले के दुसाध परिवारों में एकलौता कुआं था जहां से सभी लोग पानी पीते थे और नजदीक का खेती भी इस कुएं पर निर्भर था लेकिन समय के बदलते ही आज रूम में तब्दील हो गया।
रहीमपुर में मालिक के दरवाजे पर पक्का का कुआं है जो आज भी उनके दरवाजे की शान मानी जाती थी। सब लोग मालिक कहकर ही उस परिवार को आज भी बुलाते हैं। इसके साथ ही दसरथ यादव के दरवाजे पर बेहद छोटा कुआं था लेकिन कई लोग यहां से पानी लेने आते थे लेकिन एक बार विवाद होने के कारण लोगो ने आना बंद किया। आज भी उस कुएं में पानी है लेकिन उपयोगिता नहीं होने के कारण उसे उपर से बंद कर दिया है ताकि कोई हादसा न हो।
गांव के सामाजिक जीवन में कुएं का महत्व
गांव घर में पहले उपले पर खाना बनता था। तब गांव में जिसके घर आसपास में पहले चूल्हा जला उसी के घर से उपले पर आग ले जाते थे लोग। ऐसे में आगे चलकर इस बड़े वाले कुएं का धीरे—धीरे इस्तेमाल कम हो गया। हम सब भी पीने का पानी का इंतजाम दूसरे कुएं से करने लगे। तकरीबन पच्चीस साल पहले गांव में एक सरकारी चपाकल लगा फिर सब लोग वहीं से अपना अपना काम करने लगे। सुविधा बढ़ी लेकिन पहले की तरह यहां प्रेम न रहा। थोड़े से देर होने पर आपस में झगड़ जाना। कुछ खराब होने पर सहयोग न करना। आगे चलकर गांव में धीरे—धीरे कुछ सालों में चार चपाकल लगे। फिर इसी गाँव ले लोग बोरिंग करते थे इस लिए धीरे-धीरे कुछ लोगों अपने घरों में चपाकल लगाया दस साल पहले सक्षम परिवारी ने अपने-अपने घरो में बोरिंग बनवाना शुरू किया तब से चपाकलों से पानी सूखना शुरू हो गया गर्मी के दिनों में कुएं का पानी दूर चला जाता था। लेकिन कभी कुआं सूखा नहीं। पुराना चपाकल भी नहीं सूखता था? लेकिन बोरिंग जब से शुरू हुआ तब से जलस्तर नीचे जाने लगा। चपाकल का पानी गर्मियों में सूख जाता है। आज एक भी कुआं नहीं है सब भर के घर या शौचालय बना दिए गये। अब नल—जल योजना की दुर्दशा देखना बाकी है। सभी के घरों में पानी की बर्बादी होती है और टंकी के पानी में अभी से ही कीड़ा आता है। पता नहीं आगे क्या-क्या देखना है।
ग्रामीण पिंकू कुमार ने बताया की जब वह किशोर था और क्रिकेट खेलने जाता था तब प्यास लगने पर कुआं का पानी पीते थे। लेकिन वह स्वाद अब पानी में नहीं मिलता। उस कुएं का पानी बहुत मीठा और ठंढा रहता था। हमेंशा याद करता हूं वे दिन।
62 वर्षीय सरयुग यादव बताते है की उस समय खेती पर आधारित जीवन था। हर खेत तक पानी पहुंचने के लिए बहुत दिनों से नाहर पैन की व्यवस्था थी। लेकिन नहरें दूर से आती थी तो कभी पानी आया न आया। वर्षा के पानी पर खेती निर्भर थी। जब की हमारा गांव के उत्तर में गंगा और दक्षिण में पुनपुन है। दोनों की दूरी भी सात से दस किलोमीटर की होगी। इसके बावजूद एक फसल ही होता। कुछ बड़े किसान थे जिनके खेतों में कुआं था तो उनके आस पड़ोस के लोगों का पटमन आसानी से हो जाता था लेकिन सभी के खेतों तक पानी की व्यवस्था होने के कारण एक फसल पर धान की पैदावार बढ़ी।

बोरिंग आने से सुधरी सिंचाई व्यवस्था
सन 1973 में मार्च के महीने में एक बिहार सरकार की लघु जलाशय योजना से बोरिंग बनाने का काम शुरू हुआ तो लोगों में उत्साह भर गया। दूर-दूर से लोग देखने आते और बहुत तेजी से काम किया गया जिससे जून में रोहन के समय बोरिंग का चालू होने से सभी छोटे—बड़े किसानो में खुशी की लहर दौर गई। तीन पंचायत के कई गांव के खेतों तक पानी पहुंचने लगा जिससे गेहूं ,प्याज की खेती एवं पैदावार बढ़े और किसानो को खेती से व्यवसायिक लाभ हुआ। इसकी वजह से कई गांव के खेतों में हरियाली आई और तीनो फसलों का पैदावार अच्छे से होने लगा। यहां के किसानों के लिए यह जलाशय योजना वरदान की तरह साबित हुआ। बहुत गहरी-गहरी नहरें थीं और उससे लगे क्यारियों से लाठा,कुंडी लोग पानी खेतों तक पहुंचाते पुरुषों का काम था लाठा चलाना,लेकिन जिन परिवारों में पुरुष की संख्या नहीं होती वैसे परिवारों में महिलाऐं भी लाठा चलाती है।

परायी बिटिया को सारा प्यार उड़ेल देना चाहते हैं ग्रामवासी

दरियापुर की कमली देवी कहती है की वह तो नहर पर ही रही हैं। उनका माइका तेलपा की तरफ है जहां जातिय भेदभाव बहुत है। वहां भूमिहार औरतें जब कुएं पर पानी भर रही होती थी तब हम सब को कुएं के मुंडेर पर चढने नहीं देती थी, बोलती थी पानी छुआ जायेगा। लेकिन यहां पानी तो लेने देते थे लेकिन बहुत दूर से लाना पड़ता था। इसलिए अधिकांश दलित समाज की औरतों के लिए,आहर पैन वरदान जैसा था। जब तक पानी भरा रहता बहुत सारे काम आहरों के पानी से करतीं,मवेशियों को धोना, उसे चारे देना,घर के कपड़े धोना विशेष कर गरीब एवं दलित बस्तियों के लिए। पीने एवं खाना बनाने को छोड़ कर बाकी सारे काम आहर के पानी पर ही निर्भर करता था।
लेकिन जैसे जैसे बसावट होता गया आहर भर के लोग घर बनाने लगे। रास्ते निकलने लगे जिससे आज पानी की निकासी वाली व्यवस्था भी समाप्त हो गई। अब बंद नाले में तब्दील यह आहर बदबू के सिवा कुछ नहीं देती।

बिहार में जन वितरण प्रणाली-चुनौतियाँ और सुधार की ज़रूरतें

 

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