बाढ़ और अगलगी की विपदा को अब भी नहीं भूल पाते हरिवंश

पंचायत खबर टोली
आज प्रभात खबर के पूर्व संपादक हरिवंश दूसरी बार राज्यसभा के उपसभापति चुने गये.
इस मौके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में उनका जीवन परिचय देते हुए दो प्रसंगों की चर्चा की; एक- जूते की, दूसरा उनके गांव की. दोनों बड़े रोचक व प्रेरक प्रसंग हैं.

हरिवंश जी का गांव सिताबदियारा में बाढ़

ये प्रसंग डॉ आर‌ के नीरद की सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘जनसरोकार के पत्रकार हरिवंश’ में इस प्रकार आये हैं :

जब पहली बार जूता देखा
उन दिनों गांवों में बच्चों के पास जूते नहीं होते थे. हरिवंश जी के पास भी जूते नहीं थे. कपड़े के भी जूते होते हैं, यह उनकी कल्पना में भी नहीं था. दूसरे गांव के स्कूल में होने वाले वार्षिक समारोहों में जा कर उन्होंने जाना कि कपड़े के भी जूते होते हैं. एक बार गांव के एक व्यक्ति ने कहीं से देख-सीख कर खुद से जूता बनाया. हरिवंश जी और उनके जैसे दूसरे बच्चों के लिए यह कौतूहल से कम नहीं था. वे रोज उस व्यक्ति के घर उन जूतों को देखने जाते थे.

​जयप्रकाश नारायण का घर

गांव का संघर्षपूर्ण जीवन
सिताबदियारा दो राज्यों, बिहार और उत्तर प्रदेश तथा तीन जिलों छपरा, आरा और बलिया में बंटा हुआ है. गांव में 27 टोले हैं. इस गांव की बसावट और बनावट विचित्र है. दोनों तरफ से नदियों से घिरा हुआ. एक ओर गंगा, तो दूसरी ओर घाघरा. बाजार और शहर से पूर्णत: कटा हुआ. तब न तो बाजार जाना इतना आसान था, न एक दिन में शहर जा कर लौट पाना. कसबानुमा बाजार भी 10 से 12 किलोमीटर दूर. आने-जाने का कोई साधन नहीं. पैदल कच्चे रास्तों और पगडंडियों से हो कर लोग वहां तक पहुंच पाते थे. वह भी सूखे के दिनों में. बरसात के दिनों में गांव का जीवन और भी दुरूह हो जाता था. दूसरे बड़े इलाकों और कसबों से गांव का संपंर्क टूट जाता था. हर साल बाढ़ आती. भयंकर बाढ़. उन दिनों को याद कर हरिवंश जी आज भी विचलित हो उठते हैं. उनके चेहरे पर पीड़ा की गहरी लकीर उभर आती है. शब्दों में अथाह दर्द उतर आता है. बाढ़ होती ही ऐसी थी. प्रलयंकारी. चारों ओर जल ही जल. दूर-दूर तक मटमैले पानी का प्रसार. चारों ओर भय और जान-माल की चिंता. कई-कई दिनों तक तांडव करती जलराशि के बीच जीवन के बच जाने की उम्मीद. बाढ़ का पानी जब लौटता था, तब अपने पीछे, बस्तियों, खेतों, मैदानों और नदियों के कछारों पर विनाश की कहानी लिख जाता था. हरिवंश जी बाढ़ के उस दृश्य को अब भी भूल नहीं पाये. कहते हैं, समुद्र तो हमने बाद में देखा, उस समय वही दृश्य हमारे लिए समुद्र जैसा होता था.

गांव में बाढ़

गांव से शहर जाने का रास्ता नहीं था. आरा या छपरा प्राय: 20 से 30 किलोमीटर से कम दूर नहीं था. उत्तर प्रदेश का भी बड़ा शहर 25-30 किलोमीटर दूर था. गांव या आस-पास अस्पताल नहीं था. बीमार पड़ने पर व्यक्ति को खाट पर लाद कर ले जाना पड़ता था. उन्हीं दिनों गांव की एक महिला आग से जल गयी. रात का समय था. उसी समय लोगों ने उसे खाट पर डाला और टांग कर शहर की ओर ले गये. उस महिला की चित्कार अब भी हरिवंश जी भूल नहीं पाये हैं. वह चीख अब भी उनके कानों में गूंजती है.

गांव पर केवल बाढ़ का ही संकट नहीं था. अगलगी का भी संकट था. बिजली की तो कल्पना ही नहीं की गयी थी. दीया और ढिबरी, यही रोशनी के साधन थे. जो थोड़े संपन्न थे, उनके घरों में लालटेन होता था. गरमी में तेज हवा चलती थी और अक्सर दीया या ढिबरी से किसी-न-किसी के घर में आग लग जाती थी. यह स्थिति गांव के लोगों के जीवन को और भी संकटपूर्ण बना देती थी. बहुत बाद में, तब हरिवंश जी गांव से निकल कर बंबई पहुंच चुके थे, चंद्रशेखर जी ने अपने प्रयासों से इस गांव में सड़क बनवायी. चंद्रशेखर भी बलिया जिले के ही थे. उसी जिले के इब्राहिमपट्टी गांव में उनका जन्म हुआ था और बलिया लोकसभा क्षेत्र से आठ बार सांसद रहे थे. सिताबदियारा उसके संसदीय क्षेत्र की परिधि में आता था. चंद्रशेखर ने जयप्रकाश नारायण की स्मृति में इस गांव में कई बड़े काम भी कराये.

         बाढ़ के कारण गांव में एक ही फसल हो पाती थी. बाकी समय खेत गंगा और कोसी के पानी में डूबे रहते थे, किंतु उपज अच्छी होती थी. बाढ़ के अभिशाप के बीच यह एक वरदान था, किंतु लोगों की आवश्यकताओं और जीवन के संघर्षो की तुलना में वरदान की यह चादर बहुत छोटी थी. जीवन-यापन, जन्म-मरणी, पढ़ाई-बीमारी, शादी-ब्याह, न्योता-रिश्तेदारी यह सब जरूरतें एक फसल से ही पूरी करनी होती थी. हरिवंश जी उन दिनों को अब तक भूले नहीं हैं. उस जीवन के अनुभव और कठिनाई की अनुभूतियां अमिट हैं. वह कहते हैं, ‘जीवन बहुत कठिन था.’ किंतु अभाव में भी खुशियां थीं. वह जोड़ते हैं, ‘हम खुशी से जीते थे. गांव का वह माहौल अब कहां? अब तो मेरा पुत्र, मेरी पत्नी और उससे भी आगे ‘स्वयं’ तक बात जा पहुंची है.’

हरिवंश का पूरा बचपन सिताबदियारा में बीता. दसवीं तक की पढ़ाई उन्होंने इसी गांव में रह कर की. उन्होंने इसी गांव में रहते हुए वहां के लोगों के संघर्ष को देखा. प्रकृति के विनाश और भाग्य के बीच की अंतररेखा देखी. लोगों के कठिन जीवन और उनकी जिजीविषा देखी. इन सब का उनके मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा. उनके संघर्षपूर्ण स्वभाव, दृढ़ व्यक्तित्व और कठोर निर्णय की प्रकृति की बुनियाद यहीं पड़ी. उन्होंने हार न मानने की कला यहीं से सीखी.

जनसरोकार के पत्रकार

गांव की अर्थव्यवस्था और जीवन-चक्र कृषि पर निर्भर थे. कृषि कमजोर थी. एक फसला खेती. बाढ़ जब भी आती, अपने साथ विनाश सौगात के तौर पर साथ लाती. किसी का घर गिरता, तो किसी की खड़ी फसल चौपट होती. किसी के खेत में बालू भर जाता, तो किसी के माल-मवेशी को बाढ़ का पानी लील जाता. खुद हरिवंश जी के जन्म के पहले तक उनके परिवार के पांच घर गिर चुके थे. गांव में एक भी ऐसा परिवार न था, जिसके नाम बाढ़ ने यह पीड़ा न लिखी हो. कटाव और भसान, बाढ़ के दो सौगात हर घर की कहानी थी.

(जनसरोकार के पत्रकार हरिवंश : डॉ आर के नीरद, प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली) से साभार।

हरिवंश जी के गांव सिताबदियारा की कहानी
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हरिवंश जी का गांव सिताब दियारा

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