बढता जा रहा है किसान आंदोलन का दायरा,तेजस्वी सहित समर्थकों पर हुआ एफआईआर

अमरनाथ झा

पटना: नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन के समर्थन में बिहार के किसान भी गोलबंद हो रहे हैं। विधानसभा चुनाव और फिर दिवाली-छठ जैसे पर्वों की वजह से किसान संगठन ‘दिल्ली चलो अभियान’ की तैयारी नहीं कर सके, पर दो दिवसीय आम-हड़ताल के साथ एकजुटता जताने के लिए जगह-जगह धरना-प्रदर्शन हुआ।
वामपंथी पार्टियों के बाद प्रमुख विपक्षी दल राजद भी किसानों के समर्थन में सड़क पर उतर गई है। राजद ने शनिवार को किसान आंदोलन के समर्थन में धरना दिया। इसमें विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव और राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगतानंद सिंह समेत विधायक, विधान पार्षद और दूसरे बड़े नेता बड़ी संख्या में शामिल हुए। हालांकि ऐतिहासिक गांधी मैदान में धरना देने की इजाजत प्रशासन ने नहीं दी और गांधी मैदान के गेट बंद कर दिए गए। पर बाद में प्रमुख नेताओं को गांधी प्रतिमा तक जाकर माल्यार्पण करने की इजाजत दी गई।

धरना स्थल पर हुई सभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि नए कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन को दबाने के लिए केन्द्र पुलिस का गैरवाजिब इस्तेमाल कर रही है और आंदोलन को भटकाने के प्रयास में लगी है। नए कृषि कानूनों को काला कानून करार देते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि हमारी पार्टी ने 25 सितंबर को भी इन कानूनों का विरोध किया था जब इसे राज्य सभा में पारित कराया गया। उन्होंने कहा केन्द्र सरकार इन कानूनों के जरीए किसानों को ठगने का प्रयास कर रही है। इस कड़ाके की ठंड में जब लाखों किसान इन कानूनों का विरोध कर रहे हैं, तब भी प्रधानमंत्री उनकी बातों को सूनने और समझने का बजाए कानूनों के फायदे बताने में लगे हैं। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। दरअसल केन्द्र सरकार खेती-किसानी का काम भी बड़े कारपोरेट घराने को सौंपने के फेर में है। यह एक बड़ी साजिश है जिससे किसान अपनी उपज बड़े घरानों को बेचें और अगली फसल के लिए बीज भी उन्हीं से खरीदें। इस अवसर पर यादव ने एयर इंडिया, रेलवे, भारत पेट्रोलियम, बीएसएनएल और जीवन बीमा की हिस्सेदारी बेचने का मामला भी उठाया। उन्होंने कहा कि केन्द्र सरकार किसानों के प्रति पूरी तरह असंवेदनशील है। अगर नए कृषि कानून किसानों के लिए फायदेमंद है तो केन्द्र सरकार में हिस्सेदार अकाली दल भी इसका विरोध क्यों कर रही है।


बिहार के किसानों की स्थिति कहीं अधिक खराब है। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ भी नहीं मिल पाता। यही कारण है कि बिहार के अधिकतर किसानों को आजीविका के लिए राज्य से बाहर जाना पड़ता है। अगर यहां की खेती और किसानों की सहायता करने का प्रयास नहीं किया गया तो मजदूर, किसानों का पलायन इसीतरह जारी रहने वाला है।
राजद के प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह ने कहा कि नीतीश सरकार ने 2006 में ही कृषि उत्पाद विपणन समिति अधिनियम (एपीएमसीए) को निरस्त कर दिया था जिससे कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री में बिचौलियों की बड़े पैमाने पर घुसपैठ हो गई और किसानों को अपनी उपज का लागत मूल्य मिलना भी कठिन होता गया। इस साल बिहार में गेहूं की सरकारी खरीद काफी कम हुई। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 में केवल 50 हजार टन गेहूं खरीद हो सकी जबकि लक्ष्य सात लाख टन निर्धारित था। पिछले वर्ष 2019-20 में तो केवल 30 हजार टन गेहूं खरीदी जा सकी थी। राज्य की एक प्रमुख फसल मक्का की सरकारी खरीद ही नहीं हुई जबकि इसके लिए कोशी क्षेत्र के किसानों ने आंदोलन भी किया।


विधानसभा की बैठक के दौरान वामपंथी विधायकों ने नए कृषि कानून और श्रम कानूनों को वापस लेने की मांग लेकर प्रदर्शन किया। नए कृषि कानूनों के बारे में आम-लोगों को जागरुक करने के लिए बकायदा अभियान चलाने का निर्णय किया गया। इसी क्रम में दो दिसंबर को जगह-जगह धरना, प्रदर्शन और छोटी-छोटी सभाएं की जा रही हैं।
हालांकि बिहार में कृषि उपज की खरीद-बिक्री के लिए मंडी प्रणाली बाध्यताकारी नहीं है। इसे नीतीश सरकार ने 2006 में ही समाप्त कर दिया था। न्यूनतम समर्थन मूल्य भी यहां के किसानों को आम तौर पर नहीं मिल पाता। धान और गेहू की सरकारी खरीद प्राथमिक सहकारी साख समितियों( पैक्स) के माध्यम से होती जरूर है। पर इसमें कई तरह की घपले बाजी है और सरकारी खरीद काफी देर से शुरु होती है, तब तक किसान अपनी उपज को बिचौलियों के हाथों बेच चुके होते हैं। दूसरे मोटे अनाज खासकर मक्का की सरकारी खरीद तो होती नहीं जबकि मक्का बिहार के बड़े इलाके की मुख्य फसल है।
बिहार के किसान संगठनों के आंदोलन की रूपरेखा के बारे में सीपीआई की किसान महासभा के अशोक जी ने बताया कि वामपंथी किसान संगठनों ने तय किया है कि 8 दिसंबर से 10 दिसंबर के बीच राज्य भर में प्रखंड मुख्यालयों का घेराव किया जाएगा और आमलोगों को नए कृषि कानूनों के बारे में बताया जाएगा। उन्होंने कहा कि मामला केवल कृषि कानूनों का ही नहीं है, सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 के दायरे से खाद्यान्य को बाहर कर दिया है। इससे अनाजों की जमाखोरी बढ़ेगी। यह कानून ही अनाज की जमाखोरी को रोकने के लिए आजादी के फौरन बाद बना था क्योंकि तब गोदामं अनाज भरे होने के बादजूद भूखमरी से लाखों लोग मारे गए थे।
सीपीएम नेता गणेश शंकर सिंह ने बताया कि वर्तमान किसान आंदोलन में देश के विभिन्न हिस्सों में सक्रिय 242 संगठनों की हिस्सेदारी है। इसे केवल पंजाब और हरियाणा के किसानों का आंदोलन कहना गलत है। हालांकि आवागमन की असुविधाओं की वजह से दूसरे जगहों के किसान अभी दिल्ली के आसपास नहीं पहुंच पाए हैं, पर जो जहां है वहीं आदोलन में हिस्सेदार है।
सीपीआई माले के राजाराम सिंह ने बताया कि किसान आदोलन की रणनीति ही तीन स्तरीय बनाई गई है। दिल्ली के आसपास के किसान दिल्ली पहुंचेगे और संसद भवन को घेरना का प्रयास करेंगे। दूसरे स्तर पर किसान दिल्ली के रास्तों को जाम करेगे। दिल्ली में प्रवेश करने के पांच मुख्य मार्ग हैं। उन सबों को घेरा जाएगा। जो किसान वहां भी नहीं पहुंच पाएंगे, वे प्रदेश मुख्यालय जिला व प्रखंड मुख्यालय पर घेराव करेंगे और स्थानीय अधिकारियों के माध्यम से अपनी बातों को केन्द्र के पास भेजेगे। राजाराम सिंह किसान आंदोलन का संयोजन कर रहे समन्वय समिति के भी सदस्य हैं।

नेताओं पर मुकद्दमे से भड़के तेजस्वी
केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों के समर्थन में ने महागठबंधन के सभी दलों के नेताओं के साथ पटना के गांधी मैदान में प्रदर्शन किया। लेकिन राज्य सरकार ने कोविड 19 को लेकर लागू दिशा-निर्देशों के तहत प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी। साथ ही विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई। कृषि कानून के विरोध में बिना अनुमति के धरना देने पर तेजस्वी यादव समेत 18 नामजद और 500 अज्ञात के खिलाफ एफआईआर की गई है। जिस पर तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर हमला करते हुए कहा कि दम है तो गिरफ्तार करो, नहीं करोगे तो अपनी गिरफ्तारी खुद दे दूंगा। नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि किसानों के लिए एफआईआर क्या अगर फांसी भी देना है तो दी जाए।एफआईआर को लेकर तेजस्वी यादव ने सरकार को चुनौती दी है. तेजस्वी ने ट्वीट करते हुए लिखा है, ‘डरपोक और बंधक मुख्यमंत्री की अगुवाई में चल रही बिहार की कायर और निक्कमी सरकार ने किसानों के पक्ष में आवाज उठाने के जुर्म में हम पर एफआईआर दर्ज की है। दम है तो गिरफ़्तार करो,अगर नहीं करोगे तो इंतज़ार बाद स्वयं गिरफ़्तारी दूंगा। किसानों के लिए एफआईआर क्या अगर फांसी भी देना है तो दे दीजिए।’

पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने गांधी मैदान में किसान आंदोलन के समर्थन में जनसभा को संबोधित किया था। इस मामले में बिना अनुमति गांधी मैदान में घुसकर भीड़ को संबोधित करने और कोविड नियम तोड़ने के आरोप में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव और कांग्रेस नेता मदन मोहन झा समेत 18 प्रमुख नेताओं के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज कराई गई है। आईपीसी की धारा 188, 145, 269, 279 और 3 एपेडेमिक डिजीज एक्ट के तहत केस दर्ज किया गया है।

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