“नक्सलगढ बस्तर का एक गांव : ककनार “

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राजाराम त्रिपाठी

देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है बस्तर और बस्तर में भी सबसे पिछड़े विकास खंडों में गिनती होती है दरभा विकासखंड की। इसी दरभा विकासखंड मुख्यालय के से कुछ ही दूर है कुख्यात झीरम-घाटी जहां कुछ वर्षों पूर्व कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के 32 नेता, एक साथ नक्सलाइटों के हमले में मारे दिए गए थे। इसी दरभा विकासखंड में मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर एक छोटा सा गांव है “ककनार”।

इसी गांव ककनार में तीन पीढ़ियों पहले उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ के एक छोटे से गांव बारघाट से आकर बसे थे मेरे दादाजी शंभू दत्त तिवारी जिन्हें हम सब बाबा कहते थे। गांव में एकमात्र गैर आदिवासी परिवार था हमारा। पिताजी तथा चाचा जी सरकारी शिक्षक थे, पर दूरस्थ दुर्गम इलाकों में पदस्थ थे। कभी कभार ही घर आ पाते थे। परिवार का मुख्य कार्य खेती था। खेती का ज्ञान तो हमें बचपन से ही एक तरह से घुट्टी के रूप में मिला था। वैसे तो मेरे पिता जी व चाचा जी शिक्षक थे लेकिन वह साथ में किसान भी थे। घर में अम्मा, चाची सभी महिलाएं ,बच्चे सभी खेती में उनका पूरा हाथ बंटाते थे। तब भी हमारा संयुक्त परिवार था और आज भी हम उसी गांव में रहते हैं।

आज हमारा 45 लोगों का संयुक्त परिवार है, और आज भी हमारे परिवार का मुख्य कार्य खेती है। तब आर्थिक अवस्था कुछ खास अच्छी नहीं थी। हम छोटे बड़े सभी मिलाकर लगभग सोलह भाई बहन थे। सभी भाई बहनों में मैं सबसे बड़ा था। परिवार काफी बड़ा था शिक्षकों की तब की तनख्वाह भी बहुत कम थी। दादाजी बहुत मेहनती थे, खेती करते थे। किसी तरह गुजारा चल जाता था। गांव के अलग-अलग मोहल्ले में अलग-अलग जनजातीय समुदाय रहते थे।

मेरा बचपन इन्हीं आदिवासी परिवारों के हमउम्र बच्चों के साथ बीता। सर्व सुविधा विहीन ककनार गांव जगदलपुर शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर था। ना कोई सड़क,ना बिजली,ना पानी। पानी की तो यहां बड़ी भीषण किल्लत थी। गर्मियों में सुबह 3:00 बजे उठकर काफी दूर पैदल जा कर छिंदबहार के सूखे तालाबों की जमीन में गड्ढे खोदकर, वहां से पसीजने वाले पानी को इकट्ठा करके लाइन लगाकर बारी बारी से भरते थे। कई बार तो तड़के सुबह पारी लगाने पर भी 10:00 से 11:00 बजे या दोपहरी में पानी मिल पाता था। क्योंकि आसपास के 2-3 गांव के लोग भी आकर अपनी अपनी पारी लगाते थे, इसलिए काफी भीड़ हो जाती थी।

आज जब मैं याद करता हूं तो मुझे आश्चर्य होता है कि इतनी भीड़ होने के बावजूद भी कभी भी पानी को लेकर आपस में कोई झगड़ा नहीं होता था। जबरदस्त अनुशासन तथा ईमानदारी थी जनजातीय समुदायों में। जो पहले आया है उसे ही पहले पानी मिलेगा, जो बाद में आया है उसे बाद में मिलेगा। चाहे कोई गांव का मुखिया हो,सेठ साहूकार हो या सबसे गरीब आदमी ही क्यों ना हो। कोई वास्तविक जरूरतमंद अथवा परिवार अगर लाइन में आ गया है अथवा किसी के मेहमान आए हैं, तो उसकी तात्कालिक जरूरत की अनिवार्यता पर चर्चा कर, उसे सर्वसम्मति से पहले पानी भर लेने दिया जाता था। जिन जनजातीय समुदायों को हम पिछला और असभ्य मानते आए हैं, उनकी सुगठित इमानदार व न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था का यह एक छोटा उदाहरण मात्र है। तो बस इसी अनुशासन बद्ध जनजातीय समाज में मेरा बचपन बीता। मेरी संस्कारों को गढ़ने में इन जनजातीय समुदायों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

मेरे गांव ककनार की इस‌ साल की रंगारंग होली गांव के बच्चों के साथ,,,,,। लेकिन,जब मैं बच्चा था‌, हम तब भी घर में होली खेलते थे, लेकिन तब इस गांव के लोग रंगों के इस त्यौहार से बिल्कुल परिचित नहीं थे। अगर किसी भी गांव वाले को हम गलती से भी रंग अथवा गुलाल लगा देते तो वह नाराज होकर कुल्हाड़ी लेकर मारने दौड़ता था।

ककनार गांव में एकमात्र प्राइमरी स्कूल था जहां आसपास के कई गांवों के बच्चे पढ़ने आते थे। स्कूल खपरैल वाला था दीवारें मिट्टी की थीं। एक बरामदा तथा दो कमरे थे। एक कमरे की मिट्टी की दीवारें बरसात में पानी टपकने के कारण तथा मरम्मत न होने के कारण ढह गई थी। बाकी बचे एक कमरे और आधे बरामदे में हमारा स्कूल लगता था। स्कूल प्रायः इकलौते शिक्षक के हवाले रहता था, जो ज्यादातर पास के कस्बे जगदलपुर से कभी कभार पढ़ाने आते थे। गुरुजी आएं अथवा ना आएं उससे स्कूल की दिनचर्या पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। हम सभी छात्र अपने घरों से सुबह सुबह दिन भर के लिए भोजन गले गले तक ठूंस कर, बिल्कुल सही समय पर स्कूल पहुंच जाते थे। शिक्षक कभी भी समय पर स्कूल नहीं आते थे, पर उनकी व्यवस्था ऐसी गजब की कसी हुई होती थी कि, मजाल है कि एक भी बच्चा स्कूल पर समय पर ना पहुंचे। स्कूल पहली से पांचवी तक का था। पांचवी की परीक्षा बोर्ड परीक्षा होती थी, जिसका शिक्षक तथा छात्रों दोनों पर बड़ा खौफ था। मुझसे पहले हमारे स्कूल के इतिहास में पांचवी पास करने वाले बच्चों का अकाल था। कई छात्र तो चार-चार बार 5 वीं की बोर्ड परीक्षा में फेल हो चुके थे। शिक्षा शिक्षक तथा स्कूल के प्रति समर्पित ये चार-चार बार फेल हो चुके 14-15 साल के मजबूत किशोर वॉलिंटियर छात्र गुरुजी के निर्देशानुसार स्कूल की व्यवस्था तथा अनुशासन को बड़ी मजबूती और सख्ती से संभालते थे। गुरुजी के इन विश्वासपात्र छात्रों को गुरुजी स्कूल की चाबी सौंप कर जाते थे। ये छात्र 10:00 बजे से कुछ वक्त पहले ही स्कूल पहुंच कर स्कूल खोल देते थे और 10:00 बजे के 15:20 मिनट पहले ही,पहली घंटी जोरो से बजाई जाती थी,जो आसपास के 2-3 गांवों तक सुनाई देती थी। पहली घंटी सुनाई देते ही जो बच्चा जिस हाल में भी हो फटाक से अपना स्लेट पट्टी पेंसिल,किताब वाला अपना झोला पकड़कर स्कूल की ओर दौड़ पड़ता था,और दूसरी घंटी तक स्कूल पहुंच स्कूल के मिट्टी के फर्श नीचे बिछी फटी पुरानी बोरियों, टाट पट्टी पर दौड़ कर अपनी जगह पर काबिज हो जाता था। जो छात्र देर से पहुंचता था उसे सीनियर छात्रों द्वारा सजा दी जाती थी।

गुरुजी के अभाव में ये सीनियर छात्र उसी तरह से सर्वाधिकार प्राप्त होते थे जिस तरह से वास्ते गवर्नर लिखकर शासन का पूरा राजकाज नेता और नौकरशाह चलाते हैं। इन सीनियर छात्रों को, देर से स्कूल पहुंचने वाले तथा स्कूल का अनुशासन तोड़ने वाले बच्चों को कान मरोड़ने, घुटने पर बैठाने,हाथ पर बेंत मारने से लेकर गुरु जी के द्वारा प्रदान की जाने वाली सारी प्रचलित सजाएं देने का पूर्णअधिकार प्राप्त होता था। छात्र ज्यादा थे ,बैठने के लिए स्कूल की टाट पट्टियां सर्वथा अपर्याप्त थी। इसलिए मेरे जैसे परिवारों के छात्र अपने बैठने के लिए अपने घर से रोज टाट लेकर आते थे। गुरुजी जब भी आते तो पढ़ाई लिखाई शुरू करवाने के पहले उनकी अनुपस्थिति में छात्रों की सभी बदमाशियों का सीनियर छात्रों से लेखा-जोखा लेकर, गलतियों की गंभीरता के अनुसार पुनः सजा का प्रावधान करते थे। इसे आप राज्य सरकार तथा केंद्र सरकार दोनों के द्वारा दोहरे कराधान के तरीके से समझ सकते हैं।
उन दिनों दुनिया के हालात ऐसे थे कि हमारे जैसे छात्र का दुनिया में सबसे ज्यादा किसी से डरते थे, तो वह हमारे गुरुजी ही होते थे। हम नींद में भी कई बार, नहीं गुरु जी मैंने कुछ नहीं किया.., हाय मार डाला, अब आगे से ऐसा नहीं करूंगा वगैरह चिल्लाते हुए बिस्तर पर उठ बैठते थे।

ककनार गांव‌ की देवगुड़ी में देवी परदेशिन माता के साथ

मनोरंजन के नाम पर हम सभी स्कूली साथी कभी कबार कबड्डी खेलते थे,पर ज्यादातर पास के जंगल का रुख करते थे। जंगल बहुत ही मजे की जगह होती थी तरह-तरह के स्वादिष्ट कंद,मूल फलों से भरपूर थे ये जंगल। जबरदस्त रोमांच की जगह। सुबह से कब शाम हो जाए पता ही नहीं चलता था। मेरे लिए ये जंगल दुनिया की सबसे आकर्षक जगह थी । इन जंगलों से और उसे पाए जाने वाले कंदमूल, फल, जड़ी बूटियों पेड़ पौधों से परिचय कराने में मेरे आदिवासी बाल सखाओं का मुख्य योगदान था। तब जंगलों में तरह-तरह के पेड़ पौधों के साथ ही जंगली जानवर भी पर्याप्त मात्रा में थे। दादा जी, बाबूजी जी वगैरह घर के सभी मर्द घर के खुले बरामदे में खटिया पर सोते थे। गर्मियों को छोड़कर बाकी समय चौबीसों घंटे बरामदे में आग जलती-सुलगती रहती थी।

मैं जब छोटा था तो दादा जी के साथ ही सोता था। दादाजी के पास पौराणिक कथाओं का कभी खत्म ना होने वाला भंडार था। रोज रोज एक से बढ़कर नई रोमांचक गाथा। आज कौरवों ने भीष्म पितामह को सेनापति बना दिया है, अर्जुन और भीष्म पितामह का भीषण युद्ध हो रहा है, दोनों ओर से मंत्रपूत बाण दनादन चल रहे हैं, घोड़े हिनहिना रहे हैं हाथी चिंघाड़ रहे हैं,अब धीरे धीरे पितामह के सामने अर्जुन कमजोर पड़ रहे हैं, कृष्ण भगवान चिंतित हैं कि भीष्म के बाणों से अर्जुन पस्त हो रहे हैं । इधर कृष्ण ने युद्ध में शस्त्र न उठाने का प्रण लिया हुआ है, तो कृष्ण अब अर्जुन की जान कैसे बचाएं…। सब कुछ जीवंत उठता था। रजाई में दुबके हुए मैं सीधा टाइम मशीन के जरिए महाभारत के युद्ध स्थल पर सुरक्षित जगह से 18 दिन की पूरे महाभारत का युद्ध नजदीक से , एकदम साफ… संजय से भी ज्यादा स्पष्ट देख पाता था। इन कथा कहानियों के जरिए मैं बचपन में ही रामायण, महाभारत, श्रीमद् भागवत, सुख सागर, शिव पुराण,देवी भागवत, लक्ष्मी पुराण आदि लगभग सभी धार्मिक गाथाओं से भलीभांति वाकिफ हो गया था।

एक रात एक भयानक सी आवाज सुनकर अचानक नींद खुल गई। घर के चारदीवारी के बाहर कोई जानवर अजीब सी खून जमा देने वाली डरावनी आवाज में दहाड़ रहा था और हमारा शेरू गेट पर अजीब तरह से भौक रहा था। ऐसी डरावनी आवाज़ जीवन में से पहले कभी नहीं सुनी थी। अचानक शेरू भौंकते हुए दौड़ के हमारी खाट के नीचे आ दुबका। शायद उसकी समझ में उसके लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह दादाजी की खाट के नीचे की जगह ही थी। हम सांस रोके पड़े थे, दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। अपनी खाट के नीचे से कुत्ते शेरू के किंकिंयाने की आवाज आई, मैं कसमसाया ही था कि दादाजी कानों में बहुत ही धीरे फुसफुसाते हुए बोले.ई बाघ है बाघ.. हिलना डुलना मत,बस चुपचाप पड़े रहो। शेरू बड़ा बहादुर,मजबूत व जुझारू कुत्ता था, 2-4 कुत्तों से अकेला भिड़ जाता था। पर जब मुकाबला असली शेर और शेरू का हो तो जाहिर है शेर के सामने शेरू की क्या बिसात। हल्की गुर्राहट के साथ शेर हमारी खाट के नीचे से शेरू को घसीटते ले जा रहा था,शेरू की अजीब सी हौलनाक दर्दनाक आवाज में रोने की आवाज आ रही थी। बिल्कुल साफ लग रहा था कि साक्षात मृत्यु के जबड़े में फंसा शेरू मानो गिड़गिड़ाते हुए शेर से अपने जान बख्शने की भीख मांग रहा था। शेरू अथवा किसी भी कुत्ते की ऐसी दर्दनाक आवाज इससे पहले और इसके बाद भी मैंने कभी नहीं सुनी। शेरू की अपनी जान की भीख मांगती, अंतिम कुंकुंआती, कलेजे को चीर देने वाली दर्द भरी आवाज मानो आज भी मेरे कानों में गूंज रही है।

उन दिनों लगभग हर आदिवासी के कंधे पर कुल्हाड़ी होती थी और वह अगर कहीं दूसरे गांव जा रहा है तो प्रायः उसके हाथ में धनुष तथा कुछ तीर भी होते थे। बच्चे भी स्कूल के अलावा बाकी समय तीर धनुष अथवा छोटी कुल्हाड़ी लेकर ही चलते थे। घर में मुझ पर कुल्हाड़ी,तीर धनुष आदि लेकर चलने, जंगलों में आदिवासी बाल शाखाओं के साथ घूमने पर शुरू में कड़ा प्रतिबंध लगाया गया था। दादाजी और चाचा जी के अनुसार मेरा बड़ी तेजी से आदिवासीकरण हो रहा था, जिससे मुझे बचाया जाना बेहद जरूरी था। पर मुझे तो यह हर हाल में यह सब चाहिए ही चाहिए था। सो मैं छुपकर कुल्हाड़ी व धनुष बनवा लाया और छुपकर तीरंदाजी का अभ्यास भी शुरू कर दिया। बाद में दादाजी को पता भी चला पर उन्होंने अनदेखा कर दिया। 

पांचवी पास करने के बाद नजदीक मिडिल स्कूल हमारे गांव ककनार से लगभग 6 किलोमीटर दूर था। ना कोई सड़क ना कोई यातायात का साधन। बारिश के दिनों में यह 6 किलोमीटर कई घंटे के सफर में बदल जाता था। जिस साल मैंने पांचवीं बोर्ड की परीक्षा दी वो साल मेरे स्कूल के लिए ऐतिहासिक था। इतिहास में पहली बार हमारे ककनार स्कूल से हम 5 बच्चों ने पांचवीं बोर्ड की परीक्षा पास की, और 6 किलोमीटर दूर तेली मारेगा प्राथमिक स्कूल में एक साथ एडमिशन लिया गया। मेरे साथ पांचवी पास कर मिडिल स्कूल तेली मारेगा पढ़ने जाने वाले में मेरे सहपाठी सखा शंभूनाथ चालकी,नरसिंह कश्यप, भक्कूराम बघेल तथा समदू राम बघेल थे। सभी उम्र, कद, काठी सभी में मुझसे बड़े और बेहतर थे। मेरी शुरुआती की पढ़ाई घर पर हुई और 7 साल की उम्र में सीधे पांचवीं बोर्ड में का फार्म भरवा दिया गया था। इसलिए पांचों बच्चों में उम्र में मैं सबसे छोटा था। 7 साल के बच्चे के लिए रोज 12 किलोमीटर पगडंडी वाले रास्ते से पैदल आना-जाना करना और स्कूल में नियमित रूप से पढ़ना तत्कालीन प्रचलित नियम व व्यवस्था के अनुसार नियमित रूप से मार खाना यह सारे कर्तव्य 7 साल की बाली उमरिया में मेरे लिए बड़े कठिन साबित हो रहे थे। स्कूल के रास्ते में एक रेलवे लाइन पड़ती थी। उन्हें दिनों बस्तर के बैलाडीला लोहे की खदान से नियमित रूप से जापान को लोहा भेजे जाने हेतु यह रेल लाइन चालू की गई थी। हर घंटे लगभग 70 डिब्बों की एक रेल बैलाडीला ‌पहाड़ के लोहे से भरी विशाखापट्टनम की ओर दौड़ती थी। यानी कि 24 घंटे में 24 ट्रेन लोहा जापान भेजा जाता था। जो कि आज भी, 50 सालों बाद भी बदस्तूर जारी है।
उन दिनों स्कूल में टिफिन ले जाने की कोई प्रथा हमारे यहां नहीं। दोपहर को भोजन की छुट्टी आधे घंटे की होती थी जिसमें गांव के आसपास के बच्चे दौड़ कर अपने घर जाकर कुछ भोजन नाश्ता आदि करके आ जाते थे। पर हमारा घर तो 7 किलोमीटर दूर था। मुझे घर से 10 पैसे प्रतिदिन मिलते थे। तेली मारेगा की एकमात्र छोटी सी गुमटी अथवा दुकान जो भी कहें, वहां से मैं चना अथवा लाइ खरीद कर खा लेता था । उन दिनों गांवों के स्कूल में पानी की कोई व्यवस्था नहीं होती थी और तब तक प्लास्टिक की बोतल का आविष्कार भी शायद नहीं हुआ था, हुआ भी रहा हो तो उस से भला हमें क्या, और हां, बोतल वाले पानी को लेकर चलने का रिवाज भी हमारे बस्तर देश में नहीं था। तो जहां से लाई चना खरीदा और खाया वही मांग कर पानी भी पी लेते थे । इसे आप हमारा शाही लंच कह सकते हैं। इस 10 पैसे की लाई चने में भी मेरे अन्य सहपाठी अपना हिस्सा चाहते थे, कई बार मैं उन्हें भी दे देता था, क्योंकि ना देने पर बाकी चारों साथी जो उम्र में भी मुझसे बड़े थे और हर तरह से मुझसे कई गुना ज्यादा मजबूत थे। सारे एकजुट होकर मेरी चना लाइ की डकैती कर छीन कर भी खा सकते थे। मेरी दुश्वारियां का अंत ही नहीं था। स्कूल से लौटते वक्त रास्ते में तीन गांव पड़ते थे।

इन गांवों के सजग कर्तव्य परायण कुत्ते हम अजनबी बच्चों को दौड़ा लेते थे। मैं अपने साथियों को सामूहिकता और संगठन में ही शक्ति है, समझाते हुए अपने साथ चलने का अनुरोध करता पर ऐन मौके पर सारे साथी दगा देकर भाग निकलते थे, इनके पीछे पीछे मैं भी इन कुत्तों से बचने के लिए प्राण प्रण से दौड़ता था। ये कुत्ते हमें अपने गांव की सीमा से बाहर खदेड़ कर ही मानते थे। बहरहाल इन कुत्तों ने मुझे ठीक-ठाक तेज धावक बना दिया था, जो आगे जीवन में बहुत काम आया। कई महीनों की इस जद्दोजहद के बाद दादाजी के अथक प्रयासों से हमारे घर से लगभग दो किलोमीटर दूर छिंदबहार गांव में मिडिल स्कूल खोला गया। हम पांचों छात्रों की टीसी कटवा कर इस नए स्कूल में दाखिला कराया गया, पर स्कूल खोलने हेतु अपेक्षित छात्रों की संख्या हम 5 छात्रों से पूरी नहीं हो रही थी। इसलिए अंचल के सभी पांचवी पास कर पढ़ाई छोड़ चुके भूतपूर्व छात्रों को एकत्र करके उन सबको छठवीं में भर्ती कराया गया। अब इस नए स्कूल की छठवीं क्लास के छात्रों का पहला बैच देखने योग्य था। इस बैच में भाई बलराम लगभग 20 साल के युवा थे, एक साथी चिंगड़ू कुछ वर्ष पूर्व पांचवी पास कर चुके थे और घर में हुए झगड़े में अपने पिता को ही कुल्हाड़ी से काट डाला था, कुछ वर्ष जेल में रहे और हाल में ही छूटकर आए थे, इन्हें भी इस ऐतिहासिक बैच में जगह मिली थी। भाई सामधर के पिताजी बड़े तांत्रिक व ओझा थे जिसे यहां ‘सिरहा’ और पंजियार कहा जाता था। सामधर कुछ वर्ष पूर्व पांचवी पास कर अपने पिता की सारी पैतृक गूढ़ विद्याएं सीख रहे थे और ओझा यानि सिरहा बस बनने ही वाले थे, वो भी इस नये स्कूल की छठवीं कक्षा के प्रथम बैच के सम्मानित सदस्य हुए। ऐसे ही हर छात्र की अपनी एक अलग अनूठी कहानी थी। स्कूल की शुरुआत में एक शिक्षक पदस्थ हुए, उनकी भी अपने शिक्षक जीवन की यह पहली पदस्थि थी। स्कूल भी नया शिक्षक भी नए। जाहिर है पढ़ना पढ़ाना सब छात्रों के जिम्मे था। पर ये गुरु जी बड़े अच्छे थे, मारते बहुत कम थे।

गुरुजी यह सुनिश्चित करते थे कि सारे बच्चे गणवेश में आएं, समय पर आएं,‌सभी पूरी किताब खरीदें, और पाठशाला के समय में पाठशाला में ही बैठे रहें। आपस में लड़ाई झगड़ा ना करें। बीच-बीच में गुरुजी पढ़ते रहो, पढ़ते रहो की हांक भी लगाते थे। बाकी समय स्कूल की रिपोर्ट सिपोर्ट बनाते रहते थे। थोड़ा बहुत ऊंघ भी लेते थे। इसके अलावा बेचारे केंद्र, विकासखंड और जिला की अंतहीन बैठकों में भी प्रायः व्यस्त रहते थे। एक बैठक में गुरुजी का शामिल होने का मतलब होता था, एक दिन जाना, एक दिन बैठक में शामिल होना और एक दिन वापस आने में। कुल मिलाकर 4 दिन तो खर्च हो ही जाते थे और रविवार मिलाकर गुरूजी का कर पूरा हफ्ता मीटिंग में निकल जाता था। पर आखिरकार रोते गाते हमारा यह विलक्षण बैच आठवीं तक पहुंच ही गया। अब सामने आठवीं बोर्ड का वाटर-लू मुंह बाए खड़ा था। सहजता से सातवीं पास कर जैसे ही हम आठवीं में पहुंचे पहले दिन से लेकर सारे साल इस कठिन बोर्ड परीक्षा की भयावहता के किस्से सुनते रहे। लोग बताते कि इस बोर्ड परीक्षा के पर्चे इतनी कठिन आते हैं कि छात्रों की तो बात ही छोड़िए शिक्षक भी उन्हें नहीं हल कर पाते हैं। बहरहाल हमारी आठवीं बोर्ड की परीक्षा दरभा विकासखंड के मिडिल स्कूल में होना तय हुआ। हफ्ते भर पहले से घर में हमारे लिए राशन ,साग सब्जी, बर्तन, कंबल बिस्तर आदि की व्यवस्था की गई। सारा सामान कांवर में अपने कंधों पर लेकर छिंदवाड़ा स्कूल से दरभा के स्कूल तक लगभग 20 किलोमीटर लेकर जाना था। गुरुजी का तुगलकी आदेश था कि हर छात्र अपना सामान खुद ढ़ोएगा। पर मामला बराबरी का नहीं था, मैं लगभग 11 साल का था, और मेरी कावड़ का भार लगभग 12 किलो का था। ऐसे कठिन समय में हमारी कक्षा के सबसे सीनियर छात्र भाई बलराम के सचमुच बड़े भाई का फर्ज उठाया और लगभग पूरे रास्ते मेरी कांवर के सामान को भी अपनी कांवर में जोड़ लिया और इसके लिए गुरुजी से डांट भी खाई। वह जब तक जिंदा रहे, मेरे बहुत अच्छे मित्र बने रहे। दरभा विकासखंड मुख्यालय, जगदलपुर से आंध्र प्रदेश को जाने वाली सड़क पर बसा, चारों ओर से घने जंगलों से घिरा लगभग दो दर्जन घरों का एक छोटा सा गांव था। इसके स्कूल को गांव के रिहाईश से काफी दूर, पहाड़ की तलहटी में निर्जन बियाबान में बनाया गया था। हम सबको वहीं स्कूल में ही डेरा दिया गया। अन्य कुछ स्कूलों के छात्र भी परीक्षा देने आए थे,वो सब गांव की बस्ती में अलग-अलग ज्यादा सुरक्षित और सुविधाजनक जगहों पर टिके हुए थे।


मामला लगभग हफ्ता भर टिकने का था। खैर अब सीनियर छात्रों ने मोर्चा संभाला और चंद घंटे में ही काम चलाऊ चूल्हा बना डाला। सभी छात्र अपने घरों से अलग-अलग तरह के मोटे पतले चावल और अलग-अलग प्रकार की दालें सब्जियां लेकर आए थे। सब इकट्ठा किया गया सारे चावल आपस में मिला दिए गए तथा सभी दालें भी एक साथ मिला दी गई और इस तरह विशुद्ध समाजवादी सांझा चूल्हा चालू हुआ। मुझे तब खाना बनाना नहीं आता था, इसलिए मुझे तथा मेरे जैसे ही कुछ अन्य निकम्मों को भोजन बनाने के लिए लकड़ी इकट्ठा करने का काम दिया गया। हम दरभा से लगी हुई उसी कुख्यात झीरम घाटी के जंगलों में लकड़ी बिनने जाते थे, जहां अभी हाल कुछेक वर्षों पूर्व कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के बत्तीस नेताओं को एक साथ नक्सलियों द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया था। तब भूख भी जबरदस्त लगती थी और यह पंचमेल खाना तो बहुत ही स्वादिष्ट होता था। खाने के बाद लालटेन की रोशनी में थोड़ा बहुत पढ़ाई और थोड़ी बहुत गप्पबाजी और किस्सेबाजी के बाद रात को हम स्कूल के एक कमरे में बिछे धान के पुआल के बिस्तर जब हम सोते थे। देर रात इस स्कूल के पिछवाड़े से शेर की दहाड़ने की आवाज में आती थी। हम सब दम साध कर चुपचाप कंबलों कथड़ियों में दुबके पड़े रहते थे।

यह भी देखें…

स्कूल के पीछे एक नाला था, शायद इसीलिए मच्छर भरपूर थे। पर वो उमर ऐसी थी कि नींद इतनी गहरी आती थी कि मच्छरों की सेना के रात के आक्रमणों का पता ही नहीं चलता था। वो तो सुबह एक दूसरे के मच्छरों के काटने से सूजे हुए चेहरों को देखकर पता चलता था, कि सारी रात मच्छरों में हमारे साथ क्या किया। परीक्षक महोदय बाहर से परीक्षा लेने पधारे थे तथा चारों तरफ हवा थी कि परीक्षक महोदय बड़े ही सख्त हाकिम हैं। सारी गुरुजी उनके सामने सहमे—सहमे रहते थे। फिर भी गुरूजन अपने अपने स्कूल के छात्रों को किसी भी प्रकार पास कराने की जुगत में बेचारे लगातार लगे रहते थे। रोते गाते परीक्षा समाप्त हुई मानों बला टली। परीक्षा से लौटने के बाद हममें से हर छात्र गंभीर रूप से बीमार हुआ,बारी बारी से सभी मलेरिया का शिकार हुए, महीनों बीमार पड़े रहे। कईयों की जान जाते-जाते बची। यह तो काफी बाद में पता चला कि दरभा विकासखंड मलेरिया के वैश्विक नक्शे में सबसे ज्यादा खतरनाक फैल्सीफेरम मलेरिया से प्रभावित सघन क्षेत्र माना जाता है, तथा इसे ‘रेड जोन’ में वर्गीकृत किया गया है। जब परीक्षा का परिणाम निकला तो पता चला कि मुझे छोड़कर मेरे सारे साथी आठवीं में ही अटक गए हैं। इनसे बिछुडने का दुख तो बहुत हुआ,बस प्राण ही नहीं निकले। अब मेरे लिए हाई स्कूल की खोज शुरू हुई।

हमारे गांव ककनार से लगभग 20-25 किलोमीटर दूर जगदलपुर कस्बे में तब 3 हाई स्कूल थे। अंग्रेजों द्वारा स्थापित ऐतिहासिक “बस्तर मल्टीपरपज हाई स्कूल” की तब बड़ी ख्याति थी,आज भी है। पहले इसी स्कूल का नाम ग्रिक्सन हाई स्कूल था, जो कि आजादी के बाद नाम बदल दिया गया था। पर यहां दाखिला जरा टेढ़ी खीर था। परीक्षा में मेरे अंक काफी अच्छे थे तो मेरे एडमिशन की तो पूरी आशा थी। तब आठवीं उत्तीर्ण छात्रों के लिए मध्य प्रदेश सरकार द्वारा “ग्रामीण प्रतिभावान परीक्षा” नामक एक प्रदेश स्तरीय प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षा आयोजित की जाती थी। इसमें उत्तीर्ण छात्र को माननीय गवर्नर महोदय द्वारा नवमी से लेकर ग्यारहवीं तक 3 वर्षों तक प्रतिमाह ₹100 की स्कॉलरशिप यानी कि वजीफा दिया जाता था। मैंने भी परीक्षा दी और इस परीक्षा में उत्तीर्ण भी हुआ। इस वजीफे के जरिए तत्कालीन सर्वश्रेष्ठ जनरल हॉस्टल में मुझे रहने के लिए जगह भी मिल गई।

हाई स्कूल के जनरल हॉस्टल का यह तीन साल का जीवन, मेरे जीवन का स्वर्ण काल था। वजीफे के सौ रुपए मिलते थे, तब ₹100 के बड़े मायने होते थे। महीने भर का खाने का मैस चार्ज आ जाता था ₹70 रूपये , बिजली बिल ₹5 रू. स्कूल की फीस थी लगभग ₹ 7 सब कुछ खर्चा करके भी दस रूपए बच जाते थे। तब समोसा अठन्नी में एक प्लेट मिलता था। सिनेमा में अपर क्लास के टिकट एक रूपया सात पैसे थी। यानी कि ₹10 में ढाई रुपए प्रति हफ्ते के हिसाब से महीने में 4 फिल्में और ठीक-ठाक भरपेट या नाश्ता आराम से हो जाता था। बस्तर की राजधानी जगदलपुर के हॉस्टल के इन 3 सालों की कहानी 300 पेज में भी छोटी पड़ेगी इसलिए इस पर विस्तार से फिर कभी।

यह भी देखें…

अभी तो हमारी यात्रा की तैयारी हो रही थी, हमारे गांव 4000 साल पुरानी सभ्यता में जी रहे ‘ककनार’ से बिजली से जगमग जगमग चमचमाने वाली, रंगबिरंगे पक्के मकानों वाली,पींपीं-पोंपों मोटरों वाली, लोहे की नली से भलभल करके पानी देने वाली, बोलती, नाचती-गाती जिंदा तस्वीरों के तिलिस्म वाले माया- महल यानी सिनेमा टॉकीज वाली, स्तरिया लोगों की स्वप्न नगरी जगदलपुर जाने की।
क्रमश: जारी… शेष अगली कड़ी में।

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