स्वतंत्रता सेनानी, संगीतकार एवं कवियों को बिसराते लोग…

प्रतीक अनुज

सोनपुर अनुमंडल के लोग अब अपनी सामाजिक विरासतों को संजोने में ध्यान देना मुनासिब नही समझ रहे है जिसके चलते इलाके के लोगो को अपने क्षेत्र में जन्मे कई प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी, संगीतकार, कथाकार भक्त कवि की रचनाओं का भी ख्याल नहीं है । गंगा, गंडक- सरयू से घिरा यह इलाका सिर्फ खेती के लिये ही योग्य नही बल्कि कई अन्य विधाओं की जन्मदात्री भी रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय हो या उसके बाद के काल खण्ड में इस ग्रामीण परिवेश के कई लेखकों, भक्त कवियों ने अपनी लेखनी के जरिये उंचा मुकाम हासिल किया था।

अगर हम इलाके के पूरब से शुरू करते है तो हमे सोनपुर नगर पंचायत के उस राष्ट्रवादी जमींदार परिवार की याद आती है जिस परिवार ने अपने परिवार से तीन तीन  स्वतंत्रता सेनानी को देश को समर्पित किया था। उस महान क्रन्तिकारी शुक्ल बंधुओ को पकड़वाने वाले पुलिस इंस्पेक्टर को मात्र 15 साल के उम्र के लड़के ने नंगी तलवार से वार कर मारने की कोशिश किया था। उन तीनों में स्वतंत्रता सेनानी क्रमशः शिवबचन सिंह, बड़े भाई शिवपूजन सिंह तथा हरी प्रसाद सिंह थे । वही उनके पिता स्व लक्ष्मी प्रसाद सिंह का नाम दूर दूर तक राष्ट्रवादी जमींदारों की गिनती में होता था। उस वक्त देश के सभी बड़े क्रांतिकारियों का आना जाना एवं क्षेत्र का कार्यक्रम उनके सहयोग तथा देख रेख में हुआ करता था । वही अगस्त क्रांति के दौरान भी यहाँ केस्वतंत्रता सेनानी शहीद महेश्वर सिंह समेत तीन अन्य की कुर्बानी हम भूल नही सकते ।

उसके बाद हमारे जेहन में सोनपुर प्रखण्ड के नयागांव में जन्मे और प्रसिद्ध कवि रघुबीर नरायण का आता है जिन्होंने परतंत्र भारत के लोगो में आजादी की हुंकार भरने के लिये भोजपुरी ईलाके में राष्ट्रगान का पर्याय माने जाने वाला ‘सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोरे प्रान बसे हिम खोह रे बटोहिया..।’  गीत  की रचना की थी।

1857 की क्रांति के असफल होने के बाद भारतीयों की स्वतंत्रता-प्राप्ति की उम्मीद मद्धिम होने लगी तो राष्ट्रकवियों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाया। डा. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से, अंग्रेजी कविताओं की रचना में सिद्ध रघुवीर नारायण के हाथों ने लेखनी उठाई और मातृ भाषा भोजपुरी में अमर कृति ‘बटोहिया’ की रचना की। राष्ट्र प्रेम और भक्ति से ओत-प्रोत कर देने वाली इस रचना की ख्याति एक ही वर्ष में 1912 में बंगलाभाषाई क्षेत्र कोलकाता की गलियों तक फैल गयी। सर यदुनाथ सरकार ने रघुवीर बाबू को लिखा- ‘आई कैन नॉट थिंक आफ यू विदाउट रिमेम्बरिंग योर बटोहिया।’ स्वतंत्रता संग्राम के समय यह गीत स्वतंत्रता सेनानी का कंठहार बन चुका था। इसकी तुलना बंकिमचन्द्र के ‘वंदेमातरम’ तथा इकबाल के ‘सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा’ से हुई। बिहार प्रवास के दौरान कई कंठों से बटोहिया का सस्वर पाठ सुन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बोल पड़े थे- ‘अरे, यह तो भोजपुरी का वंदे मातरम है।’

वही उसी क्षेत्र में महान स्वतंत्रता सेनानी और 1942 में पटना समाहरणालय में आजादी के झंडे को फहराने के दौरान शहीद हुए शहीद राजेंद्र सिंह का नाम आता है। वही से जब हम अपना ध्यान थोड़ा पश्चिम यानि मलखाचक की और करते है तो यह धरती भी आजादी के आंदोलन के समय क्रांतिकारियों के स्वर्ग के उपनाम से जाना जाता है इसका मुख्य कारण की आजादी के आंदोलन में जिले में पहले शहीद राम देनी थे जिन्हें जिले में सबसे पहले फांसी दी गई थी। वही इस जगह पर खुद महात्मा गांधी भी क्षेत्र भ्रमण कर अपने कुटीर की स्थापना किए थे। मलखाचक की विशेषता यही समाप्त नही होती और पुराने लेखक और कवि डॉ के के दत्ता की लिखित पुस्तक फ्रीडम मूवमेंट ऑफ़ बिहार में इस गांव के योगदान का उन्होंने बखूबी चित्रण है । उन्होंने यहाँ का जिक्र करते हुए इस बात का भी जिक्र किया कि आजादी के समय महान क्रांतिकारी और आजादी के समय अंग्रेजो के लिये सिरदर्द बने योगेंद्र शुक्ल को कनाडाई पुलिस की मदद से उस वक्त मलखाचक गांव से अंग्रेजो ने गिरफ्तार किया था। यही नही महात्मा गांधी के आध्यात्मिक गुरु एव महान संत गार्बो दा मलखाचक में लगभग 7 माह तक रहकर क्रांतिकारियों को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किये थे ।

वही जिस वक्त गांधी जी ने भारतीयों को सूत काट कर स्वदेशी वस्त्र पहनने का आह्वाण किया था थे उस वक्त यह गांधी कुटीर सूती वस्त्र उत्पादन का मुख्य केंद्र बन गया था और इसके चलते यहां के पुरुष जहां दिन रात एक कर क्रान्तिकारी गतिविधियों को अंजाम देते थे वही यहाँ की महिलाये सूत काट कर वस्त्र उत्पादन में लगी रहती थी।इस लिये यह कहना लगभग ठीक रहेगा की स्वतंत्रता संग्राम में अपने-अपने तरीके से योगदान दे रहे दोनो प्रमुख धरो के मिलन एव समन्वय का महत्वपूर्ण केंद्र मलखाचक तक और लगभग 4से 5 शहीदों का गांव भी मगर दुर्भाग्य है कि हम उन शहीदों के लिये किसी तरह का कोई कार्य नहीं कर पा रहे है। विशेष रूप से उस वक्त भी जब देश हाल ही में महात्मा गांधी के 150 वीं जयंती वर्ष के दौरान देशव्यापी स्तर पर चलाये गये विभिन्न कार्यक्रमों का ग्वाह बना हो।

इस कड़ी में एक नाम जमींदार बसन्त लाल एव हीरालाल सराफ का भी आता है जिन पर आंदोलन में धन व संसाधनों के जरिए स्वतंत्रता सेनानी, क्रांतिकारियों को सहयोग देने के आरोप लगे थे। जिसके कारण उन्हें आर्थिक एवं पारिवारिक क्षति तक उठानी पड़ी थी ।सन 1942 के आंदोलन के वक्त फिरंगी सिपाहियों ने दिघवारा थाना के ऊपर क्रान्तिकारियो के कब्जे की सूचना पर जगह जगह छापेमारी शुरू किया जिस दौरान हीरालाल सर्राफ के सूत गोदाम को अंग्रेजो ने आग के हवाले कर दिया था वही बसन्त लाल जी को अपने एक पुत्र को भी खोना पड़ा था ।जो अंग्रेजो से लोहा लेते लेते अंग्रेजो की गोली से देश की खातिर अपना जीवन बलिदान किया था। रेल लाइन को उखाड़ कर गोरे सैनिकों के मूवमेंट में रुकावट बनने वाले स्वतंत्रता सेनानी में रामविनोद सिह की पुत्री शारदा एव सरस्वती के अलावे राम लखन भगत, सरयुग सिह समेत दर्जनों नाम शामिल है। वही उस वक्त सांस्कृतिक एवं कला के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बनाने वालों में भी इलाके में कलाकांरों की कोई कमी नही थी ।यहाँ तक की उस वक्त कला की पराकाष्ठा जहाँ फिल्मों को माना जाता था। इस लिहाज से भी देखें तो उसमें भी महत्वपूर्ण योगदान दिघवारा के प्रसिद्ध पेंटर स्व रामानंद जी का भी नाम शीर्ष में गिना जा सकता है। उस वक्त जब रंग मंच एव अन्य विद्याओं के जरिये लोग स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ा रहे थे उसी समय पेंटर साहब की ख्याति बहुत दूर दूर तक थी उन्होंने कई हिंदी फिल्मों के लिये पर्दो की पेंटिंग की।
दिघवारा में कला के जरिये भी फिरंगियों को कड़ी टक्कर दी जा रही थी और उस वक्त की महत्वपूर्ण घटना का चित्रण यहां आवश्यक हो जाता है जब दिघवारा प्रखण्ड के कलाकारों द्वारा जन जागृति हेतु ड्रामेटिक क्लब पर बरबादी हिन्द शीर्षक नामक नाटक का मंचन करके अंग्रेजो को जुल्म का सचित्र सजीव मंचन कर लोगो को जागरूक करने और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय करने का बीड़ा उठाया था। वही उस वक्त जब इसकी जानकारी फिरंगियों को मिली तब उन्होंने कलाकरो को पकड़ने हेतु पुरे मंच को घेर लिया था मगर किसी भी कलाकार को वे गिरफ्तार नही कर सके।

विंध्यवासिनी देवी का पैतृक मकान
विंध्यवासिनी देवी

उससे आगे बढ़ने पर दिघवारा के जमींदार राम प्रसाद श्रीवास्तव एवं शामा लाल की पुत्रवधू एवं राइपट्टी की चाची उपनाम से प्रसिद्ध भोजपुरी लोक गायन की भक्ति शैली की जनक स्व विंध्यवासिनी देवी का नाम भी लोगो की जुबान पर रहता है जिन्होंने उस वक्त जब देस पर पूर्ण रूपेण अंग्रेजी शासन कायम था और ग्रामीण परिवेश में महिलाओं पर कई तरह की बंदीश थी अपनी भक्ति शैली की भोजपुरी लोक गायकी के माध्ययम से ग्रामीणों को स्वतंत्र होने के लिये जागरूक करने का प्रयास की थी। उन्होंने दिघवारा के कई लोगो को लोक गायकी के लिये उत्साहित करते हुए अपने साथ कई देशों की यात्रा करवाई थी। पूर्व प्रधानमंत्री स्व इंदिरा गांधी जी ने उनकी इसी कृति और लोक गायन से प्रभावित होकर उनको स्वर कोकिला की उपाधी भी दी थी।

मेरा गांव आमी अर्थात अम्बिका स्थान

 

क्षेत्र के आमी और फकुली हराजी में भी कई भक्त कवियों ने रचना एवं भक्ति लेखन के जरिये स्वयं भगवान को भी इतना प्रभावित कर डाला था कि इनकी रचना में कही विघ्न उतपन्न नही हो का  ध्यान  रखते हुए कवियो की जगह स्वयं भगवान ने इनकी डियूटी निभाई थी।
इन कवि में फकुली के निवासी महाकवि बाबु वशु नायक सिह का नाम सबसे पहले लेना श्रेयस्कर होगा। ऐसा कहा जाता है कि जब वसु नायक रामायण की रचना शुरू की थी और उसी वक्त उनकी ड्यूटी कलकत्ता के किसी चौराहे पर लगा दी गई थी ।
वही वे इस ग्रन्थ की रचना में इतना मग्न हो गए थे की इन्हें ड्यूटी का तनिक भी भान न था रचना में विघ्न उत्पन्न हो इसके चलते खुद इनके आराध्य देव ने इनकी जगह ड्यूटी निभाई थी और इसका पता तब चला जब निरीक्षण में निकले पदाधिकारी को वे दोनों जगह एक समय पर दिखाई देने लगे।
इस कड़ी में दूसरा नाम हराजी निवासी और कवि हिमांशु श्रीवास्तव की आती है जिन्होंने नदी बह चली और लोहे के पंख सदृश्य काल जयी रचना के माध्यम से तत्कालीन समाज में लागू कुरीतियों पर कड़ा प्रहार किया था ।  कला और साहित्य के क्षेत्र में अर्जुन सिंह अशान्त का नाम स्मरणीय है। भोजपुरी गीतों के राजकुमार के रूप में अशान्त ने कवि सम्मेलनों में काफी ख्याति अजित की। पुलिस की नौकरी मे रहते हुए उन्होंने निरंतर साहित्य सेवा की। भोजपुरी गायन के क्षेत्र में अशान्त के दो शिष्यों ने अपने को शीर्ष पर स्थापित किया। उनके नाम हैं – संतराज सिंह राजेश और सुरेश कुमार सिंह। इस कड़ी में अन्य कवि में कचहरी भगत, जनार्दन द्विवेदी, वसिष्ठ नरायन सिह का है। कृतन कार वसिष्ठ बाबू की कृतन आज भी कई कीर्तन कारियों के जुबान पर रहती है।
स्वतंत्रता सेनानी, संगीतकार एवं कवियो के इतनी विरासतों के बावजूद हम उन लोगो को न तो आज उचित सम्मान ही दे पा रहे है और न ही उनकी कृतियो को संभालने में समर्थ हो पा रहे है।उपरोक्त कई व्यक्तियों के तो अब जन्म स्थान को भी ढूढने में असमर्थ हो सकते है कारण की जिनकी कृतिया कभी द्वितीय राष्ट्र गान बनने जा रहा था यानि डॉ रघुबीर की रचना सुंदर सुभमी भैया उनके जन्म जन्मतिथि और जन्म स्थान को तो हम नयागांव की किसी टोले को बता देते है मगर आज उनके उस गांव में स्मृति ढूढने में हमारे पसीने छूट रहे है। हा ये जरूर है कि हम उसी गांव में जन्मे शहीद राजेंद्र सिंह के जन्म पुण्यतिथि को बखूबी याद करके और उनकी स्मारक बना अपने समाज में उनकी यादो को सजोने का प्रयास कर रहे है।

छ लाख गांव हमार ह,अपना गांव लागी बात करीं तो लोग का कही..जयप्रकाश नारायण


आजादी के समय या उसके पहले जहा मलखाचक स्वतंत्रता सेनानी, शहीदो के गांव की पहली पंक्ति में शामिल था मगर आज उन शहीदो के स्मारक जयंती और पुण्य तिथि के नाम पर कुछ भी नही कर पाए और इसके कारण हमारी अगली पीढ़ी उन शहीदो की कृत्यों को जान पायेगी या नही उस पर भी अब संशय ही है। यही हाल लगभग भोजपुरी भक्ति गीतकार और राइ पट्टी की चाची उपनाम से प्रसिद्ध कवियत्री स्व विंध्यवासिनी देवी का है जिनके मृत्यु के पश्चात कभी न तो  जयंती मनाई गई और ना ही कभी पुण्य तिथि। लेकीन इस मामले में हमसे हमारे प्रखण्ड के पश्चिम का इलाका कुछ जागरूक नजर आता है जिन्होंने अपने तथा सामाजिक सहयोग के माध्यम से भक्त कवियों की रचनाओं को छपवाने उनकी पुण्य एव जन्म तिथि मनाने में लगी हुई है।हमे भी इनके उक्त कार्यो से सबक लेकर इस महत्वपूर्ण कार्य को अंजाम देना चाहिये जिससे हमारे समाज को उन छुपे स्वर्णिम इतिहास को जानने समझने और गुनने का सीख मिल सके। इसके लिये आवश्यक है एक प्रखर एव सामाजिक सोच के साथ खड़े समाज के प्रबुद्ध लोगो की जो यह बीड़ा उठा सके ।

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