भारत में कोरोना महामारी से कैसे लड़ेंगे गांव

अशोक भगत
भारत में कोरोना महामारी की दूसरी लहर से अभी हम निपट ही रहे थे कि तीसरी लहर की भी आशंका जता दी गई। पहली लहर में भारत के गांव प्रभावित नहीं हुए थे, लेकिन दूसरी लहर में गांवों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। गांवों के स्पष्ट आंकड़े अभी आने बाकी हैं लेकिन उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र,मध्यप्रदेश, बिहार, झारखंड आदि राज्यों में गांवों में कोरोना का व्यापक असर देखने को मिल रहा है। तीसरी लहर की मारक क्षमता के बारे में बताया जा रहा है कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा तबाही मचाएगी।
ग्रामीण स्वास्थ्य के मोर्चे पर चुनौतियां शहरों व कस्बों से बहुत ज्यादा हैं। जब हमारे ग्रामीण इलाके मलेरिया, हैजा, टायफायड जैसे संक्रामक रोगों से लड़ने में अक्षम हैं, तब कोविड-19 जैसी महामारी का सामना कैसे कर सकते हैं? 2018 में राज्यसभा में दी गई जानकारी के अनुसार देश में कुल प्राथमिक स्वास्थ्य केंन्द्रों की संख्या 25,650 है। सरकार द्वारा स्थापित प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में से 15,700 (61.2 प्रतिशत) में केवल एक डॉक्टर उपलब्ध है और 1,974(7.69 प्रतिशत) स्वास्थ्य केन्द्रों पर तो डॉक्टर ही नहीं है। …..कोरोना महामारी
ऐसा नहीं है कि ग्रामीण स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी तौर पर काम नहीं हुआ है। स्वास्थ्य, महिला एवं परिवार कल्याण, जनजातीय विकास, ग्रामीण विकास, जल संसाधन एवं पेयजल, आयुष, खाद्य एवं आपूर् मंत्रालयों के साथ ही सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थय मिशन, एड्स कंट्रोल, आदि के तहत भी काम हुए हैं। लेकिन स्वास्थ्य संरचना सबके सामने है। आज मिल-जुलकर चुनौती का सामना करना ही सर्वोत्तम विकल्प है। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, पंचायती राज संस्थान, महिला एवं बाल विकास विभाग तथा स्वयंसेवी संस्थाओं की पूर्ण भागीदारी प्राप्त करके ही महामारी से निपटने की रणनीति तैयार की जानी चाहिए। …..कोरोना महामारी
प्रत्येक ग्राम स्तर पर पूर्व से गठित ग्रामीण स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण समिति इस कठिन दौर में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। इस समिति को तत्काल सक्रिय एवं मजबूत बनाने की पहल की जानी चाहिए। इस समिति में ग्राम सभा, पंचायती राज संस्थान, अनुसूचित जनजाति तथा अनुसूचित जाति के साथ जनसंख्या बाहुल्य के अनुरूप पिछड़े वर्गों तथा अल्पसंख्यक समुदायों को प्रतिनिधित्व प्रदान किया गया है। महिलाओं की भागीदारी इसमें विशेष रूप से सुनिश्चित की गई है। सरकार के महत्वपूर्ण विभाग, जैसे स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, पेयजल एवं स्वच्छटा विभाग तथा महिला एवं बाल कल्याण विभाग को इसमें मुख्य कार्यकारी भूमिका में रखा गया है। ग्रामीण मोर्चे पर यह समिति कारगर साबित हो सकता है। कोरोना वैक्सीन के प्रति उत्पन्न भ्रांतियों के निवारण में यह समिति विलक्षण भूमिका अदा करने में सहायक सिध्द हो सकती है।                                                                    …..कोरोना महामारी

इस आपदा काल में जांच, निगरानी तथा घर में बंद कोरोना मरीजों तक जरूरी चिकित्सा सुविधा पहुंचाने में वह समिति मददगार साबित हो सकेगी। पंचायत स्तर पर गठित राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण समिति को स्वास्थ्य समन्वय के लिए सरकार प्रतिवर्ष अनुदान भी देती है। समन्वय के प्रयोग पहले भी हुए हैं औऱ सफल भी रहे हैं, लेकिन उन्हें आगे नहीं बढ़ाया गया। डॉक्टर मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती केन्द्र सरकार ने पोषाहार की समस्या से निपटने के लिए एक न्यूट्रिशन कटलिशन बनाई थी। सभी मंत्रालयों को इसके साथ जोड़ा गया था। इसी दौरान एक शब्द सामने आया कनवर्जन। इसके तहत देश की कई सामाजिक और गैर सरकारी संस्थाओं को जोड़ा गया। इस योजना के लिए दलाई लामा ने आर्थिक सहयोग दिया और महान कृषि वैज्ञानिक एम एस स्वामीनाथन के नेतृत्व में इसे प्रारंभ किया गया। ब्लॉक स्तरीय ऑपरेशनल प्लान के नाम से गुमला (झारखंड) प्रखंड में इसे प्रारंभ किया गया। स्थानीय स्तर पर गुमला के उपायुक्त खुद इस योजना की देख-रेख कर रहे थे। योजना बेहद सफल साबित हुई, लेकिन इसे विस्तार नहीं दिया गया। बाद में न जाने क्यों इस योजना को बंद कर दिया गया।                                                                                                …..कोरोना महामारी

सरकार ने एक प्रयोग और किया। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए उसने आशा कार्यकर्ताओं का एक बड़ा नेटवर्क खड़ा किया। साथ ही आंगनबाड़ी व्यवस्था खड़ी की। यही नहीं, सखी मंडलों का भी गठन किया गया। फिलहाल देशभर में आशा कार्यकर्ताओं की संख्या लगभग 10 लाख है और आंगनबाड़ी श्रमिकों की संख्या छह लाख के करीब। इन योजनाओं के उद्देश्य बेहद पवित्र थे, लेकिन ये दोनों योजनाएं सफल होते-होते रह गई क्योंकि इन योजनाओं के कार्यकर्ता के चयन, प्रशिक्षण और नियोजन में सरकारी अधिकारियों का अनावश्यक हस्तक्षेप होने लगा। आशा कार्यकर्ताओं को ग्रामीण क्षेत्र के स्वास्थ्य संरचना को दुरुस्त करना था। फिलहाल आशा कार्यकर्ताओं का उपयोग अन्य सरकारी कार्यों के लिए किया जाने लगा है। सरकार की अन्य कई योजनाओं की तरह ये दोनों योजनाएं भी हाथी के दांत साबित हो रही हैं। यदि आशा कार्यकर्ताओं के पंचायत निकायों के अंदर रखकर काम कराया जाता तो यह योजना सफल रहती।                                                                                                                                                                                           …..कोरोना महामारी
महामारियां तो पहले भी आती रही हैं। केवल बिहार, झारखंड में ही हैजा, मलेरिया, कालाजार, डायरिया, प्लेग, चेचक आदि से प्रतिवर्ष हजारों लोगों की जान चली जाती है। इधर के दिनों में भी चमकी बुखार, चिकनगुनिया, डेंगू आदि से प्रत्येक वर्ष कई हजार लोग मर जाते हैं। आखिर इन महामारियों से निजात कैसे मिली? इसका एक छोटा-सा उदाहरण यहां प्रस्तुत करना ठीक रहेगा। झारखंड के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में कुछ सामाजिक व गैर-सरकारी संगठनों ने मलेरिया बीमारी को चुनौती के रूप में लिया और जन-कल्याण के माध्यम से इस बीमारी की मारक क्षमता को सीमित कर दिया। आज भी साल के तीन महीने, मई से जुलाई तक आदिवासी क्षेत्रों में यह अभियान चलाया जाता है। इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिलता है। अब इन क्षेत्रों में मलेरिया के साथ जीना लोग सीख गए हैं। मत्युदर में भी कमी आई है।
बेशक, देश में गैर-सरकारी संस्थाओं के माध्यम से स्वास्थ्य की आधारभूत संरचना खड़ी की जा सकती है। साथ ही, स्थानीय निकायों, खासकर ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं के माध्यम से स्थानीय युवक-युवतियों को प्रशिक्षित करके स्थानीय समाज में स्वास्थ्य के प्रति पर्याप्त जागरुकता का संचार किया जा सकता है। आज इसके अलावा न तो समाज के पास कोई दूसरा बेहतर विकल्प है और न ही सरकार के पास दूसरी कोई प्रभावशाली योजना।                                                                                                    …..कोरोना महामारी
(हिन्दुस्तान से साभार)

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