मजदूरों की महावापसी…लिखी जा सकती है पिछड़े इलाकों में समृद्धि की पटकथा

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प्रो डॉ पवन कुमार सिंह

रोजगार मूलक संसाधनों की कमी और अत्यधिक जनसंख्या-घनत्व के कारण अविभाजित बिहार और उत्तर प्रदेश, खासकर भोजपुरी भाषी क्षेत्र से प्रवास पर निकलकर कमाने के लिए परदेस जाने की परम्परा काफी पुरानी है। चाहे गिरमिटिया मजदूर के रूप में जाकर मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी या त्रिनिदाद को आबाद करना हो अथवा रंगून, ढाका, मेमन सिंह, कोलकाता से लेकर सिलीगुड़ी और कटिहार के जूट मिलों और कॉटन मिलों को चलाना हो, इस क्षेत्र के श्रमिकों ने अपने पसीने से अविस्मरणीय इबारतें लिखकर दुनिया के सामने अतुलनीय प्रतिमान प्रस्तुत किया है। इतना ही नहीं, भारत के सभी महानगरों में चलने वाली फैक्टरियों और निर्माण उद्योग में लगे मानव बल में इस इलाके के लोगों का प्रतिशत काफी अधिक है। बड़े शहरों में मोटिया मजदूर और टैक्सी ड्राइवर का काम करने वाले अधिकांश लोग भी यहीं के हैं। इसके अलावा पिछले तीन दशकों से इस क्षेत्र के कृषि मजदूर पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और गुजरात आदि के खेतों से सोना उपजा रहे हैं। उपर्युक्त कारणों से इस क्षेत्र के डेढ़ करोड़ से अधिक लोग इन दिनों भारत के विभिन्न स्थानों में प्रवास करते हैं।

कोरोना महामारी के कारण हुए देशव्यापी लॉकडाउन में अचानक इन प्रवासी मजदूरों का रोजगार छिन गया है और वे खुद से पैदल चलकर या सरकारी व्यवस्था के माध्यम से अपने घर लौट रहे हैं। उनकी इस वापसी पर कई भिन्न-भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं। किसी की नजर में यह वापसी आत्मघाती है। एक तो इनके साथ कोरोना के फैलाव का खतरा है, दूसरे इन्हें फिर से पुरानी जगहों पर रोजगार मिलना मुश्किल होने वाला है। निराशावादी नजरिए से देखें तो पहले ही से बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे इस क्षेत्र में इन लौटने वाले लोगों के लिए रोजगार का अवसर नहीं है। इसके विपरीत आशावादी दृष्टिकोण इस महावापसी को एक अवसर के रूप में भी देखता है, जिसके सहारे इस पिछड़े इलाके की समृद्धि की पटकथा लिखी जा सकती है।
कतिपय समाजार्थिक कारणों से विगत तीन दशकों के दरम्यान झारखंड, बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में कृषि मजदूरों की लगातार कमी होती गयी है। व्यावसायिक खेती में अधिक संख्या में कुशल मजदूरों की आवश्यकता होती है। देश के महानगरों की ओर पलायन से कृषि क्षेत्र में श्रमशक्ति का अभाव होता गया है। बड़े और मंझोले किसानों ने व्यावसायिक खेती लगभग छोड़ ही दी है। पारंपरिक खेती भी इस असर से अछूती नहीं रही। जो मेहनती लोग थे वे परदेस कमाने निकल गये और कामचोर गाँवों में रह गये। मनरेगा में महीना-दो महीना भी काम मिल गया और बीपीएल कार्ड पर डेढ़-दो रुपये किलो में चावल-गेहूं मिल गया। बुड़बक हैं जो खेतों में दिनभर हाड़तोड़ मजूरी करेंगे! कुल मिलाकर खेती करने के लिए अब गांवों में मजदूर नहीं मिलते। इस कारण अब कास्तकारों ने अपने खेतों में आम, लीची आदि के बगान लगाने का नया चलन चलाया है ताकि मजदूर न भी मिलें तो उनकी जमीन बची रहे।

बड़े पैमाने पर मजदूरों के पलायन वाले क्षेत्रों में सरकारों ने वैकल्पिक रोजगार का अवसर पैदा करने का प्रयास नहीं किया। जो फैक्ट्रियां पहले से थीं, वे एक-एक करके बन्द होती चली गयीं। कुटीर उद्योग को बचाने का जतन नहीं किया गया। लघु उद्योग के लिए कानून व्यवस्था का उचित माहौल नहीं रहा तथा बड़े उद्योगों के लिए कभी कोई सोच ही नहीं रही। आमजन को दरिद्र और अनपढ़ बनाये रखने के सभी जतन किये जाते रहे क्योंकि सभी को जाति, वर्ग और संप्रदाय का झुनझुना बजाते हुए जयकारा लगाने और पीछे चलने वाली भीड़ चाहिए। सरकार चाहे किसी पार्टी की रही हो, सबने गरीबी और मुफलिसी को सत्ता की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल किया।

बड़े ही सुनियोजित तरीके से जनता को मुफ्तखोरी की आदत लगाकर मेहनत से उसका भरोसा छीन लिया गया। राजनेताओं ने जनकल्याण की योजनाओं में घोटाले करके अपना खजाना भरने का उपाय किया। फलतः इस क्षेत्र की श्रमशक्ति में भयंकर असंतुलन पैदा हो गया है। काम करने वाले लोग बाहर चले गये और जो बचे रह गये वे निकम्मे हो गये। बैठे रहेंगे, पर अवसर मिलने के बाद काम पर जाने से इनकार करेंगे।

महानगरों से प्रवासी मजदूरों की वापसी को अवसर के रूप में भुनाने की संभावना तो बहुत अधिक है, किन्तु बिहार की वर्तमान नीतीश सरकार शायद यह नहीं कर पायेगी। एक मोटे आंकड़े के अनुसार अगले एक महीने में लगभग पच्चीस लाख मजदूर घर वापस आ रहे हैं। कोरोना संकट के बाद की बदली हुई दुनिया में इन लोगों का मन फिर से उन महानगरों में लौटने का नहीं होगा, जिन्होंने इन्हें बेआबरू करके अपने यहां रखने से मना कर दिया है। जिन शहरों को इन्होंने अपने पसीने से सींचकर आबाद किया, उन्होंने इन्हें दर-बदर भटकने के लिए भगवान भरोसे छोड़ दिया। ऐसे निराश और हताश माहौल में केवल कृषि क्षेत्र व मनरेगा योजना में रोजगार के भरोसे इतने लोगों को रोककर रख पाना टेढ़ी खीर है। जनता से लेकर सरकार तक की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा गयी है। आनन-फानन में कोई बड़ी फैक्ट्री नहीं लगायी जा सकती है।

हां बन्द पड़े जूट मिलों, चीनी मिलों, खाद कारखाने, हैंडलूम और पावरलूम, विभिन्न कुटीर उद्योगों आदि को चालू करके रोजगार पैदा किया जा सकता है। कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देकर भी इन प्रवासियों को रोका जा सकता है। पशुपालन, मुर्गीपालन और मछलीपालन को बढ़ावा देकर रोजगार के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। इसके अलावा जो प्रशिक्षित हैं उन्हें स्वरोजगार के लिए सहायता देकर और युवा वर्ग को रोजगारपरक प्रशिक्षण देकर इस मानव संसाधन का उत्पादक उपयोग किया जा सकता है।

सुखद आश्चर्य की बात है कि इन प्रवासी मजदूरों की अहमियत को समझते हुए हरियाणा, तेलंगाना जैसे राज्यों की सरकारें चाहती हैं कि ये वहीं रुक जाएँ और स्थिति सामान्य होने पर वहां विकास की गाड़ी को फिर आगे बढ़ाएं। दूसरी ओर अत्यंत खेदजनक दृश्य देखने की विवशता है कि बिहार सरकार इन परदेसियों को वापस लाने के प्रति बिल्कुल उदासीन रवैया अख्तियार किये बैठी हुई है। हालाकि देर से ही इस दिशा में प्रयास किया जाना शुरू हुआ है, बावजूद इसके यह कहना जरूरी है कि शायद बिहार सरकार इसे अवसर मानने के बदले बोझ समझने की ऐतिहासिक भूल कर रही है। सनद रहे कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिल सकता है।

(एसोसिएट प्रोफेसर तिलका मांझी, भागलपुर विश्वविद्यालय)

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