कोरोना काल में गांधी की प्रासंगिकता

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अनिल कुमार सिंह

कोविड – 19 के इस दौर में गांधी एक बार फिर प्रासंगिक हो गए हैं । सोशल मीडिया पर चर्चा का दौर चल रहा है , जगह-जगह वेविनार चल रहे हैं। उनके ‘हिंद- स्वराज ‘और विशेषकर ‘ट्रस्टीशिप ‘को लेकर। एक अजीब सा ख्याल आता है। उनके जैसा आदमी या कोई भी मरने के बाद उसे जानने वाले हर व्यक्ति के भीतर अपनी जगह बना लेता है। उसका होना धुंधला पड़ता जाता है,उसका न होना उतना ही उजला होता जाता है। इतना उजला और साफ, लगता है कि वह हम सबके बीच बैठा है,एक जैसा नहीं,बल्कि अलग-अलग। इसीलिए इन चर्चाओं के बीच मुझे उनका न होना ,उनकी शहादत याद आ रही है। अपनी शहादत के कुछ ही पहले गांधी ने लिखा था – ‘अगर मेरी आस्था में चमक बाकी रही और मुझे विश्वास है बाकी रहेगी,यदि मैं अकेला भी खड़ा रहूं तो मैं कब्र में भी खड़ा रहूं,तो मैं कब्र में भी जीवित रहूंगा और इतना ही नहीं,वहां से भी बोलता रहूंगा।’ वे बोल रहे हैं। बात चली थी गांधी की शहादत की। गांधी की शहादत के समकक्ष दो ही नाम मेरे जेहन में उभरते हैं– सुकरात और जीसस। कहीं आसपास दो और नाम भी हैं–अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग की। तो पहले इन्हीं दोनों की चर्चा कर लेते हैं ।
मार्टिन लूथर किंग ने’ स्ट्राइड्स टुवर्ड्स फ्रीडम’ में लिखा –‘ गांधी इतिहास के प्रथम व्यक्ति है जिसने जीसस की प्रेम – नैतिकता को व्यक्तियों के बीच की अंतर क्रिया से ऊपर उठाकर,बड़े स्तर पर प्रभावी सामाजिक शक्ति में रूपांतरित किया। क्राइस्ट ने एक चेतना,एक प्रेरणा दी, गांधी ने तरीका सुझाया।’ यह तरीका था ‘सत्याग्रह’। मार्टिन के लिए सत्याग्रह एक राजनीतिक विवशता थी,क्योंकि अमेरिका जैसी संगठित,समृद्धि और लोक-संपुष्ट गोरी राजसत्ता से सशस्त्र संघर्ष कालों के लिए संभव नहीं हो पाता। जबकि गांधी के लिए यह विवशता से आरंभ होकर जीवन मूल्य के रूप में आत्मसात हो गया था।

अब्राहम लिंकन और मार्टिन लूथर किंग को प्रतिक्रियावादी गोरों ने गोली मार दी थी । मैं नहीं कह सकता कि गोली का सामना होते समय अगर भागने और छिपने का विकल्प होता तो यह दोनों क्या करते? शायद, ये शालीन मुस्कुराहट के साथ मृत्यु का सामना न करते, और ना ही अपने हत्यारों को क्षमा करते। लिंकन ने तो गोली मारे जाने के दिन ही ‘इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी ‘ की स्थापना की थी। यह सही है कि इन दोनों की शहादत ने एक बड़े काॅज को औचित्य प्रदान किया,लेकिन उनकी शहादत में वह सार्वभौम करुणा और औदात्य नहीं है जो गांधी की शहादत या जीसस के क्रूसिफिकेशन में है। कहीं पढ़ा था कि मृत्यु के उपरांत गांधी के चेहरे पर अपूर्व शांति और पारलौकिक मुस्कान थी
जीसस यहूदी धर्म गुरुओं और रोमन अधिकारियों से छुपकर रहते थे। उनके अपने ही शिष्य जुडाज ने लालच में आकर उन्हें पकड़वा दिया। उनका वास्तविक बड़प्पन क्रॉस का बड़प्पन है जब उन्होंने अपने हत्यारों को अज्ञानी बताकर उन्हें न केवल स्वयं क्षमा किया बल्कि ईश्वर से भी प्रार्थना की, कि उन्हें क्षमा कर दें तभी वह सार्वभौम और सर्वकालिक हो गए। गांधी का यह रूप दक्षिण अफ्रीका में ही दिख चुका है। पहला, तब जब डरबन में गोरों ने उन पर हमला कर दिया और ब्रिटिश गृह मंत्री चैंबर्लेन के आदेश के बावजूद वह किसी को भी सजा दिलाने को तैयार नहीं हुए। दूसरी बार जब ट्रांसवाल सरकार द्वारा गिरमिटियों के ‘रजिस्ट्रेशन’ के संबंध में हुए विवाद में मीर आलम द्वारा उनका सर फोड़ दिया गया। तीन दिनों के बाद होश आने पर उन्होंने कहा कि मीर आलम उन्हें अत्यधिक प्रेम करता है और उनके संबंध में उसने अपने हृदय में एक देवता जैसी मूर्ति गढ़ रखी है जिसका विखंडित हो ना वह बर्दाश्त न कर सका।
20 जनवरी 48 को जब वे प्रार्थना-सभा में बोल रहे थे, बाग की दीवार से उन पर बम फेंका गया । अगली सुबह उन्होंने कहा कि जिस भ्रमित युवक ने बम फेंका है उससे किसी को घृणा नहीं होनी चाहिए। इतना ही नहीं पुलिस के इंस्पेक्टर जनरल से उन्होंने कहा कि उस नौजवान को तंग ना करें ।

निश्चित ही वे अपने हत्यारे को भी क्षमा कर देते सुकरात अपने को हेमलॉक से बचा सकते थे। प्लेटो और उनके अन्य शिष्य उन्हें जेल से बाहर निकाल ले जाने के लिए उनके पास पहुंचे थे। लेकिन मृत्यु का वरण करना उन्हें श्रेयस्कर लगा। उनके लिए पार्थिव जीवन से अधिक महत्वपूर्ण थे उनके जीवन मूल्य । ऐसी स्थिति में गांधी भी सुकरात की तरह मृत्यु को ही चुनते ।
गांधी के शहादत में जीसस का संतत्व और सुकरात की मूल्य निष्ठा दोनों हैं ।।
लेख​क, पूर्व प्राचार्य हिन्दू डिग्री कालेज,जमानियां गाज़ीपुर

(लेख​क, पूर्व प्राचार्य हिन्दू डिग्री कालेज,जमानियां गाज़ीपुर)

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