हरिवंश
फिर धीरे-धीरे राजनीति ने आहट दी. तब कांग्रेस का जोर था, सोशलिस्ट पार्टी भी थी, कहीं-कहीं वामपंथियों की आवाज भी सुनाई देती थी. चुनाव तब एक साथ होते थे. कुछ वर्षों बाद बार-बार चुनाव की स्थिति बनने लगी. फिर विकास योजनाओं की चर्चा, ठेकेदारी की चर्चा, रिश्वत की बातें हवा में तैरने लगीं.
गांव का वह माहौल जब भी याद करता हूं, तो कह सकता हूं कि जो भी अच्छे संस्कार मिले, वह उसी गांव की मिट्टी, आबोहवा और बुर्जुगों की देन थी. हमारे घर जो बुजुर्ग खेती का काम संभालते थे, वे भिखारी भाई या ओस्ताद बाबा या अन्य वस्तुतः हमारे अभिभावक भी थे. हमने कभी नहीं जाना कि वे किस जाति के थे. अगर शाम को खेलकर समय से घर नहीं लौटे, लालटेन जलाकर पढ़ने नहीं बैठे, तो पता था कि उनकी फटकार मिलेगी. वह पिता के लौटते ही शिकायत करेंगे. यह मेरी ही स्थिति नहीं थी. गांव का कोई भी बुजुर्ग गलत काम करते बच्चे को मना कर सकता था. घोर जाड़े में लोग आग जलाकर बैठते. उसे अलाव या कौरा कहते. उसमें गोबर से बना गोईठा, लकड़ी वगैरह जलाई जाती. वह एक तरह से गांव का यह सबसे जीवंत ड्राइंग रूम होता, खुले आसमान तले, जहां पूरे गांव-घर की समस्या, कभी-कभार देश की राजनीति या राज्य की राजनीति या नेताओं के कामकाज पर चर्चा होती. रेडियो किसी-किसी घर होता. अखबार नहीं आते थे. यह सार्वजनिक मिलन स्थल एक तरह से गांव सभा का छोटा रूप होता. इसी गांव सभा में बचपन में ऐसी जगहों पर सुनी कुछ चीजें स्मृति में अटक गयी, हमेशा के लिए दर्ज हो गई. उस अपढ़ समाज से समझ मिली कि भारत की परंपराएं क्या हैं? यह हजारों साल पहले से आती हमारी सनातन संस्कृति का ही विस्तार था. लिच्छवी के ग्राम गणराज्य की बात बहुत बाद में पढ़ी. वह यही था कि गांव में एक आचारसंहिता थी. बुर्जुगों का आपस में भरोसा था. महत्वपूर्ण बात यह थी कि समाज चलाने के श्रेष्ठ मूल्यों पर एक अलिखित आपसी समझौता था. यह नैतिक व्यवस्था थी.
ऐसा नहीं था कि सब कुछ ठीक था.अनेक घटनाएं होतीं. पर, कोई गलत को सही कहने पर आमादा नहीं होता था.अनैतिक ढंग से महत्वपूर्ण बन जानेवालों या धनी हो जानेवालों के प्रति समाज का सम्मान या स्वीकृति नहीं थी.गरीबी भयावह रूप में थी. चिकित्सा की बातें, तो सपना थी. न बिजली, न पढ़ाई की समुचित व्यवस्था.तब आवागमन के दो ही साधन थे. बिहार की तरफ घाघरा नदी पार कर पैदल 8-10 किलोमीटर चलना और आरा की तरफ से गंगा पार कर इतनी ही दूरी तय करना. उत्तर प्रदेश की तरफ से नजदीक के रेलवे स्टेशन उतरकर लगभग 20 किलोमीटर चलना. लोग बिहार की ओर से दोनों घाटों से ही गांव आते थे. नाव चलाने वाले नाविकों और घाट के घटवार के पास पूरे 27 टोलों के घर-घर की खबर होती, क्योंकि इन्हीं दो जलमार्गों से छपरा और आरा जाना आसान था. बलिया काफी दूर था. आज यह गांव तीन सांसदों और तीन विधायकों का चुनाव क्षेत्र है.
पर धीरे-धीरे गांव के सामाजिक परिवेश में बदलाव की बाढ़ आ गयी. अब घर-घर वही हाल. स्वार्थ का रिश्ता अहम. संयुक्त परिवार अतीत की व्यवस्था हो गयी है. हर आदमी की अलग दुनिया. पहले गांवों में परिवार के मालिक-मुख्तार होते थे. पूरे परिवार की देखभाल, उनके जिम्मे होता. वह अपने बाल-बच्चों से अधिक दूसरों का ध्यान रखते. पिता का महत्व परिवार में अलग होता था. अब आज उसी गांव की हालत देखता हूं, घर में पिता निर्णय लेते हैं, पुत्र नहीं सुनता. गांवों में भी मोबाइल, ह्वाटशप पर चिपकी पीढ़ी की दुनिया बदल चुकी है. श्रम के प्रति भी वह सम्मान व समर्पण नहीं रहा. चीजें आसानी से मिलें, यही आकांक्षा-चाहत है. कोलतार (अलकतरा) की काली सड़क भी गांव में पहुंच गयी है, जो तब अनहोनी बात थी. स्कूल भी बन गये हैं. बिजली आई, जो बचपन में 13-14 साल की उम्र होने पर पहली बार देखने को मिली थी. पर कभी नियमित नहीं रही.
जयप्रकाश जी के कारण टेलीफोन की लाइन आई थी. सबसे बड़ी बात वह गरीबी नहीं रही और अब विनाशकारी बाढ़ भी नहीं आती. पर, उस गांव ने संवेदना, आपसी सदभाव, मर्यादा, बड़ों का सम्मान, स्त्रियों के प्रति आदर जैसे जो दुर्लभ मूल्य हमारी पीढी़ को दिया, अब वह नहीं दिखता. यह सिर्फ स्मृतियों में है, जो बार-बार कुरेदता है, खींचता है, तो गांव की प्रायः यात्रा करता हूं, पर वे पुराने लोग, स्मृतियों में ही अब बचे हैं. सिर्फ वह पीढ़ी ही नहीं गयी, अपने साथ गांवों के उन पुराने आत्मीय रिश्तों को भी लेती गयीं.
बहुत बाद में अखबार का संपादन करते हुए बिहार के पूर्व वित्तमंत्री और प्रतिभावान नेता डॉ. प्रभुनाथ सिंह के दो लेख छापे, ‘कहां गईल मोर गांव रे’ और अपनी मां को केंद्र मे रखकर लिखा संस्मरण. उनकी दोनों रचनाएं आज भी जेहन में चुभती हैं. कैसे बूढ़े मां-बाप भी हमारे गांव में पराए हो गए. जिन बुर्जुगों को सबसे ज्यादा सम्मान हमारे गांवों में मिलता था, उनका जीवन कैसे अकेलापन की ठोकरें खा रहा है. तब गांव में पैसा भगवान नहीं था.
इसी तरह जेपी के बारे में गांव के बुर्जुगों से सुनी दो बातों से बाद की राजनीति को समझने में मदद मिली. जेपी बड़े मशहूर हो चुके थे. प्रायः गांव आते, पूरे टोले और गांव के सभी लोग उनके यहां जाते. वे सबसे मिलते. गांव उनकी कमजोरी थी.अपनी भोजपुरी भाषा में ही बात करते थे. एक बार गांव के लोगों ने उनसे कहा कि हमलोगों की दो समस्याएं हैं, जिसे बड़े संकोच के साथ आपके सामने रखने आए हैं. जेपी ने कहा, ‘आप सब बताएं. लोगों ने कहा कि हमारा गांव एक है, पर यह दो राज्यों और तीन जिलों में बंटा है, कटाव यहां की नियति है. घर यहां (बलिया) है, तो खेत बिहार में है. बिहार के भी दो जिलों में यानी आरा और सारण. अगर आप कह दें या प्रयास करें, तो यह पूरा गांव एक राज्य, एक जिले के मातहत हो जाए. उससे बड़ी राहत मिलेगी. इस उत्तर प्रदेश-बिहार सीमा रेखा पर तब काम करने के लिए त्रिवेणी कमीशन सरकार ने गठित किया था. खासकर प्रशासनिक कामों में. सबसे नजदीक तो छपरा जिला है, इसके बाद आरा है. गांव से इन दोनों जिलों की दूरी जोड़ दें, तो भी उस संयुक्त दूरी से बलिया अधिक दूर है. बेहतर होता कि छपरा जिले में यह पूरा गांव शामिल हो जाये. आप एक ही प्रांत और एक ही जिले में इसको करा दें. दूसरी बात कही कि इस गांव में न सड़क है, न बिजली है, न स्कूल. यहां आना-जाना इतना कठिन है कि कोई आना नहीं चाहता. बाढ़ के दिनों में हमारा जीवन पानी में घिरे टापू बन जाता है. नियति के भरोसे रहते हैं. यहां कुछ जरूरी विकास का काम हो जाए तो बड़ी राहत होती.
गांव के बुजुर्ग बताते थे कि जेपी ने धैर्य से दोनों बातें सुनीं. शिष्टता और मर्यादा से कहा, ‘रउआ सभे ठीक कहतानी, कई लोग ईहां बड़-बुजुर्ग भी बईठल बानी. ई बताईं कि ए देश में लगभग 6 लाख गांव बा,आजादी के कुछे दिन भईल बा, हर गांव में कुछ न कुछ समस्या बा. यदि हम कहीं कहके अपना गांव में कुछ काम कराईं, तो पूरा देश में लोग का कही कि जेपी अपने गांव में कुछ काम कराव ताड़े. आजादी के लड़ाई लड़ल गयल की पूरा देश हमार ह, छ लाख गांव हमार ह, आज हम अपना गांव लागी बात करीं तो लोग का कही.’ गांव के बुजुर्ग भांप गए और कहा कि बिल्कुल मत करिए. आपकी नैतिक मर्यादा, पूरे देश के प्रति आपकी सोच, हमें बड़ा बनाते हैं. यह प्रकरण पहले बुजुर्गों से सुना, तब समझा कि लोक व्यवहार में मर्यादा व नैतिकता की क्या परंपरा रही है.
बाद में गांधी जी का यह भाव पढ़ाः कि ‘लोग अपने खिलाफ कोई बात कहना-सुनना नहीं चाहते हैं, इसलिए उन्हें यह अहसास ही नहीं होता कि जिसे वे सभ्यता का विकास कहते हैं, वह वास्तव में रोग है.उन्होंने लिखा कि लोग बाहरी दुनिया की खोजों और शरीर के सुख में सार्थकता और पुरुषार्थ मानते हैं.सौ साल पहले यूरोप के लोग जैसे घरों में रहते थे,उनसे ज्यादा अच्छे घरों में आज वे रहते हैं, यह सभ्यता की निशानी है. पहले लोग चमड़े के कपड़े पहनते थे और भालों का इस्तेमाल करते थे, अब वे लंबे पतलून पहनते हैं और भाले के बदले एक साथ पांच गोलियां छोड़ने वाली बंदूक का इस्तेमाल करते हैं । पहले मामूली हल से मेहनत करके जमीन जोतते थे, उसकी जगह भाप के यंत्रों से हल चलाकर एक आदमी बहुत सारी जमीन जोत लेता था और बहुत सारा पैसा कमा लेता है. यह सभ्यता की निशानी है. पहले लोग बैलगाड़ी से बारह कोस मंजिल तय करते थे, अब रेलगाड़ी से चार सौ कोस की मंजिल तय करते हैं.यह सभ्यता की चोट मानी गई. फिर लोग सोचते हैं कि हवाई जहाज से चंद घंटों में दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच सकेंगे. हाथ-पैर हिलाने की जरूरत नहीं रहेगी.एक बटन दबाया, सामने पहनने की पोशाक हाजिर, दूसरा बटन दबाया और अखबार हाजिर, तीसरा बटन दबाया गाड़ी चलने के लिए तैयार.उसे हमेशा नए भोजन मिलेंगे, हाथ पैरों का काम नहीं करना पड़ेगा, सारा काम यंत्रों से ही हो जाएगा.आज तोप के एक गोले से हजारों जानें ली जा सकती हैं.यह सभ्यता की निशानी है.पहले लोग खुली हवा में अपने को ठीक लगे, उतना काम स्वतंत्रता से करते थे.अब हजारों आदमी कारखानों में या खानों में इकट्ठा होकर काम करते हैं, उनकी हालत जानवर से भी बदतर है.पहले लोगों को मार-पीटकर गुलाम बनाया जाता था, अब पैसों और भोग का लालच देकर गुलाम बनाया जाता है.पहले ऐसे रोग नहीं थे, जैसे आज लोगों में पैदा कर दिए गए हैं.डॉक्टर इलाज खोज रहे हैं कि इन्हें कैसे मिटाएं, ऐसे में अस्पताल बढ़े हैं, यह सभ्यता की निशानी है. सभ्यता के इन अनुभवों में नीति या धर्म की बात ही नहीं है.’
गांधी जी ने यह स्पष्ट किया कि ‘नीति से हटकर हासिल किया गया आविष्कार आखिर में संकट को ही जन्म देगा. समाज अपनी आकांक्षाओं का गुलाम तो है ही, ऐसे में हमारी व्यवस्था और बाजार उस कमजोरी का भरसक लाभ उठाता है.हम देख रहे हैं कि जिसे गांधी जी ने सभ्यता कहा, उसे आज हम बोलचाल की भाषा में ‘विकास’ कहने लगे हैं. अपने लाभ और लोभ के लिए जिस तरह से धरती का शोषण किया गया, जिस तरह से नदियों, पहाड़ों, ग्लेशियर्स और मिट्टी के साथ बुरा बर्ताव किया गया, उसने दुनिया और मानव समाज के अस्तित्व पर संकट बिछा दिया है’.
‘यह सभ्यता ऐसी है कि अगर हम धीरज धरकर बैठे रहेंगे, तो सभ्यता की चपेट में आये हुए लोग खुद की जलाई हुई आग में जल मरेंगे’.
अब बार-बार गांव आने-जाने के क्रम में लगता है कि उस मेरे पुराने गांव की वह भयावह गरीबी तो गयी, आधुनिकता ने उस सुदूर जगह पर भी दस्तक दी, पर क्या यही असल प्रगति है?
(राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश जी के गांव सिताबदियारा के कहानी की दूसरी कड़ी।)
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क्रमश: जारी…



