January 19, 2020

हिंदुस्तान को आबाद रखना है तो उसके गांवों को बचाना होगा

उमेश चतुर्वेदी

हमारी भोजपुरी संस्कृति में शादी-विवाह और जनेऊ के मौके पर माटी-कोड़ की रस्म होती है। इसमें घर की महिलाएं घर के बाहर मिट्टी खोदने जाती हैं। इस दौरान घर के ठीक बाहर निकलते ही महिलाएं चमार लोगों के पारंपरिक बाजा की पूजा करती हैं। यह जानकारी प्रगतिशीलता की चाशनी में डूबे समाज को बहुत अखरेगी, जिन्हें लगता है कि गांवों में सिर्फ छुआछूत, ऊंच-नीच का ही बोध है। शास्त्रजीवी पंडित परिवार हो या ठसक से जीने वाला ठाकुर परिवार, चमरूआ बाजा की पूजा उसे करनी ही है, वह भी दूर से नहीं छूकर, हाथ जोड़कर, फूल, सिंदूर, अक्षत और नेग से। इस दौरान हर खानदान और गांव में महिलाएं पारंपरिक गीत गाती हैं। बचपन से जवानी में कदम रखते वक्त तक यह दृश्य हर साल देखता था।

चौबे परिवारों में (हम चतुर्वेदी लोग चौबे भी कहे जाते हैं) में इस गीत के बोल होते हैं-
कवना बने रहलू ए कोइलरि, कवना बने जाइ
निधि बाबा दुअरिया ए कोइलरि, बघांव बने जाइ

बाद में मैं सोचता था कि यह निधि बाबा कौन थे? बचपन में मुझे बूढ़े और बुजुर्ग लोगों की संगति बहुत अच्छी लगती थी और उनसे उनके जवानी के दिनों की कहानियां खूब सुनता था। अतीत की उन कहानियों से तब रोमांस-सा हो गया था। इन्हीं बुजुर्गों की संगति में मुझे पता चला कि हमारे गांव के चौबे खानदान के संस्थापक निधि चौबे थे जो कहीं सुदूर फैजाबाद जिले के सरयूपारीय ब्राह्मण थे। उनका रोपा चैबे खानदान का बिरवा आज इतना बड़ा हो गया है कि चौबे लोगों के ही करीब साठ कुनबे हो गए हैं।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश के पूर्वी छोर पर बलिया जिला में मुख्यालय से करीब 16 किलोमीटर पूरब है मेरा गांव बघांव। गांव के लोग कहते थे कि करीब पांच सौ साल पहले यहां घना जंगल था। इस जंगल में बाघ रहा करते थे। इसलिए इस गांव का नाम बघांव पड़ा, बघांव यानी बाघ का ठांव…गांव के मूल निवासी किनवार क्षत्रिय लोग माने जाते हैं। हालांकि अब उनके कुछ ही परिवार है। कहा जाता है कि निधि चौबे इस गांव के करीब से गुजर रहे थे। मुख्य सड़क पर किसी क्षत्रिय परिवार के किसी बुजुर्ग का दशगात्र वाला श्राद्ध हो रहा था। यह श्राद्ध महापात्र ब्राह्मण कराते हैं, लेकिन बारहवीं या तेरहवीं का श्राद्ध पुरोहित कराते हैं। मुख्य सड़क के किनारे एक तालाब है। कहा जाता है कि निधि चौबे वहां पानी पीने के लिए रूके तो उन्होंने दशगात्र का श्राद्ध होते देखा। आज भी पूरे गांव के मृतकों का दशगात्र का श्राद्ध या सत नहयना की रस्म इसी जगह पूरी की जाती है। बहरहाल, तीन दिन बाद जब निधि चौबे अपना काम करके लौटे तो उस क्षत्रिय मृतक की तेरहवीं का श्राद्ध था। हमारे यहां श्राद्ध का भोज बड़ा होता है। अगर बुजुर्गावस्था में सामान्य निधन हुआ हो तो श्राद्ध का ब्रह्मभोज प्रतिष्ठा का प्रश्न होता है। श्राद्ध वाले घर के लोग प्यार और सम्मान से लोगों को बुलाते हैं और खिलाते हैं। इस दौरान पंडितों और डोम राजा को खासतौर पर दान-दक्षिणा भी दी जाती है। समाज के सबसे निचले पायदान पर बैठे डोम समाज के व्यक्ति अगर संतुष्ट नहीं हुए तो श्राद्ध को नाकाम माना जाता है। इसलिए क्या ब्राह्मण या क्या क्षत्रिय, डोम राजा के हाथ जोड़ते हैं, पैर पड़ते हैं, अपनी हैसियत के मुताबिक दक्षिणा देते हैं और डोम परिवार को खुश करके अपने दरवाजे से भेजने का सारा जोग जतन करते हैं। हिंदू समाज की ये रस्में दरअसल सामाजिक संतुलन की प्रतीक रही हैं। गांवों में अब भी ये जिंदा हैं। यह बात और है कि हमारी मौजूदा शिक्षा पद्धति और कथित प्रगतिशील वैचारिकता ने गांवों और भारतीय समाज का सिर्फ विद्रूप चेहरा ही प्रस्तुत किया है।

बहरहाल, तेरहवीं के श्राद्ध के दिन उधर से गुजर रहे निधि चौबे को भी क्षत्रिय परिवार ने भोजन के लिए आमंत्रित किया। वे क्षत्रिय परिवार के दरवाजे पर पहुंचे तो वहां श्राद्ध कर्म की रस्म पूरा कराते महापात्र ब्राह्मणों को देखकर चैंक गए। उन्होंने इस कर्म पर सवाल उठाया। उनका तर्क था कि श्राद्धकर्म कराने का हक पुरोहित को है। यहां यह बता देना उचित है कि महापात्र ब्राह्मणों के साथ खान-पान से हमारे समाज में परहेज रहा है। तब निधि चौबे के सम्मुख लोगों ने अपनी समस्या रखी कि उनके यहां पुरोहिताई कराने वाले ब्राह्मण नहीं हैं। बात आगे बढ़ी तो गांव के क्षत्रियों ने निधि चैबे को ही बसने और पुरोहिताई करने का आमंत्रण दे दिया। उन्हें कुछ सौ एकड़ जमीन भी दे दी और इस तरह करीब पांच सौ साल पहले बघांव में चैबे परिवार की नींव पड़ी। यहां बता देना जरूरी है कि पौरोहित्य कर्म के लिए स्थापित हमारे गांव के चौबे परिवारों में पुरोहिताई कराने का अब कोई चलन ही नहीं है। हमारे गांव के चौबे परिवार लड़ाका माने जाते हैं, वक्त पर कितनी भी बड़ी हस्ती से उलझ जाना और उसके वारे-न्यारे कर देना।

हमारी पढ़ाई गांव के प्राइमरी और बगल के मिडिल स्कूल में आठवीं तक जमीन पर बैठकर पूरी हुई है। तब हमारे साथ विधायक बच्चा पाठक का भतीजा, हमारे कस्बे के जमींदार परिवार के सभी बच्चे, थानेदार का बेटा, कस्बे के अस्पताल के डॉक्टर का बेटा, सभी पढ़ते थे। बचपन की प्रतिद्वंद्विता को छोड़ दें तो हमारे बीच आर्थिक या सामाजिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। लेकिन अब सब कुछ बदल गया है। हमारे कई साथी छोटी जातियों के परिवारों के हैं। कुछ जिंदगी की दौड़ में आर्थिक तौर पर पीछे रह गए। रिक्शा चलाकर अपनी जीविका चलाते हैं। मैं जब भी गांव जाता हूं तो उनसे उसी स्तर पर व्यवहार करता हूं, वे भी वैसा ही व्यहार करते हैं, जैसा हम स्कूली दिनों में करते थे। मैं ही क्यों, हमारे गांव के कमलाकर चैबे इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रहे। रिटायर होने के बाद भले ही वे वाराणसी में बस गए थे, लेकिन साल में दो-तीन बार गांव जरूर आते थे और अपने बचपन के साथियों जिनमें धोबी, दुसाध जाति के लोग भी थे, से वैसा ही व्यवहार करते थे जैसा बचपन में करते थे। यहां यह बता देना जरूरी है कि यह कमलाकर चौबे वही थे जिनकी अध्यक्षता में मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जन सिंह के चुरहट लाटरी कांड की जांच के लिए सुंदरलाल पटवा सरकार ने चुरहट जांच आयोग बनाया था।

हमारे गांव में दुसाध, धोबी, राजभर और नोनिया और कोइरी लोग भी हैं। लेकिन हमने गांवों में जिस तरह की पंचायती व्यवस्था स्वीकार की है, उसने गांवों के माहौल को बहुत खराब किया है। संविधान के 73 वें और 74वें संशोधन के बाद पंचायती राज व्यवस्था ने ऊंच-नीच की भावना को खासतौर पर बढ़ाया है। लेकिन यह सिर्फ अधिकार जताने की राजनीति तक सीमित रहता है। किसी के घर शादी-विवाह हुआ तो सभी कंधा से कंधा मिलाकर सहयोग करते हैं। हमारे गांव में दुश्मनियां तो ब्राह्मण-ब्राह्मण और क्षत्रिय-क्षत्रिय परिवारों के बीच भी है। वैसी दुश्मनियां जातियों के खास-खास परिवारों के बीच है भी। एक दौर में गांव में दुसाध बनाम ब्राह्मण की लंबी जंग चली। हालांकि दोनों समूहों की लड़ाइयों के पीछे अगड़ी जाति के लोग ही थे खासकर ब्राह्मण या ठाकुर। इसमें गांव की एक पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई। उस पीढ़ी के जो लोग अब बुढ़ा रहे हैं, उन दिनों को कोसते हैं और उस लड़ाई को भी।

हमारे गांव की सबसे बड़ी समस्या बढ़िया शिक्षा का अभाव और बेरोजगारी है। हमारे गांव के कुछ लोग बहुत अच्छी पोजीशन में हैं। लेकिन गांव के विकास में उनका योगदान नहीं रहा। बलिया के मुख्तार रहे पंडित परशुराम चतुर्वेदी ने नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन के नाना आचार्य क्षितिमोहन सेन की प्रेरणा से एक बहुत ही महत्वपूर्ण किताब लिखी है-उत्तर भारत की संत परंपरा। मध्यकाल में उत्तर भारत की गंगा-घाघरा की मिट्टी में संतों की ऋंखला पैदा हुई थी। उनमें से हमारे गांव और हमारी ही खानदान के चैनराम बाबा भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने जीवित समाधि ली थी। उनकी समाधि स्थल हमारे यहां पवित्र स्थल के रूप में विख्यात है। पंद्रहवीं सदी के इस संत के पराक्रम को पूरा इलाका मानता है। महान घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन बिहार के छपरा जिले के परसा मठ में साधु बनकर रहे थे, उसी परसा मठ के चैनराम बाबा शिष्य थे। हमारे इलाके में जब भी कोई विवाद होता है, लोग आपसी पंचायत के जरिए चैनराम बाबा के मठ पर उसे सुलझाते हैं। वहां जाकर कोई व्यक्ति झूठ नहीं बोल पाता। इसका फायदा अब इलाके की पुलिस भी उठाती है। हमारे इलाके में शादियां काफी खर्चीली और दहेज वाली हो चुकी हैं। लेकिन जिनके पास पैसे नहीं हैं, उनके लिए भी यहां राह खुल गई है। हर साल सैकड़ों शादियां चैनराम बाबा के मठ पर होने लगी हैं, बिना दहेज, बिना तामझाम और बिना बड़े भोज की। कुछ सामाजिक लोग, संस्थाएं गरीबों की शादियों में अपनी तरफ से दहेज या भोज दे देते हैं।

बेरोजगारी की हालत ऐसी है कि गांव के कुछ लोग थाने की दलाली में ही अपनी कामयाबी देखते हैं। कुछ लोगों को स्थानीय पुलिस के सिपाहियों को खिला-पिलाकर अपनी धमक दिखाने में आनंद आता रहा है। गांव के बगल से रेलवे लाइन गुजरती है, जहां से गुजरने वाली गाड़ियां पूरब में रक्सौल, दरभंगा, गुवाहाटी, कोलकाता और पश्चिम में मुंबई, अहमदाबाद, दक्षिण में चेन्नई तक जाती हैं। लेकिन उसका खास असर हमारे यहां के विकास पर नहीं दिख रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि गांव के लोग अब भी पारंपरिक दकियानुसी तरीके से नौकरी और पढ़ाई को देखते हैं। लेकिन गांव में एक बदलाव भी आया है। अब गांव की लड़कियां दूर के शहरों में भी जाकर पढ़ रही हैं और कैरियर बनाने की राह पर बढ़ रही हैं।

नौकरी लगवाए, वही बड़ा
जिस गांव की धूल-माटी और धूप-पानी में मैंने 22 साल तक की उम्र गुजारी है, गाय चराई है, खेतों से घास लाकर अपनी गाय को खिलाया हूं, खलिहान से अनाज ढोकर लाया हूं, अपने बगीचे से महुआ के फूल और कोइना के बीज बीने हैं, आम तोड़े हैं, जलेबी को पेड़ से तोड़ कर खाया है, हाबुस और होरहा लगाया है, आलू और मकई के खेत की रखवाली की है, वह रोमांटिक अतीत मेरी शख्सियत से कहीं गहरे तक जुड़ा हुआ है। वह बार-बार अपने गांव की ओर बुलाता है। लेकिन मैं क्या अब लौट पाऊंगा। मायावी दौर में यह संभव भी नहीं। लेकिन गांव तो ठहरा गांव, उसकी खुशबू ही हमारी जिंदगी का जरिया है। अपने गांव के लिए मैं नाकाम ही हूं। गांव वालों की नजर में राष्ट्रीय अखबारों में लिखना, टेलीविजन चैनलों पर दिखने का मतलब बड़ा आदमी होना नहीं है। बड़े आदमी की परिभाषा में हमारे गांव के मुताबिक जो गांव के दस-बीस लोगों की नौकरियां लगवा दे, कुछ विकास कार्य करा दे। लेकिन मैं इन अर्थों में नाकाम हूं।

गांव की चर्चा के साथ यह जरूर कहना चाहूंगा कि हिंदुस्तान को खुश रखना है तो उसके गांवों को बचाना होगा। गांव यानी स्वालंबन की संस्कृति जो कपड़ा और नमक के अलावा अपनी जरूरत का सबकुछ खुद उगाए, खुद उपभोग करे। मैं तो आर्थिक उदारीकरण के दौर में ऐसे ही गांव का सपना देखता हूं। चाहे वह मेरा गांव हो या किसी और का, जहां सावन की बरसात में भगवान शिव के जयकारे के साथ रामचरित मानस का सस्वर पाठ गूंजे, कार्तिक महीने में सुबह के स्नान के वक्त विष्णु का पाठ हो, दीवाली पर मिट्टी के दीए जलें, होली पर गांव के टेसू के फूलों के रंग बिखरें, गांव के हर तीज-त्यौहार चमकें…

भारत में ग्रामीण पर्यटन अब जरूरी कर देना चाहिए। राजस्थान में हवेलियों के बहाने ग्राम्य पर्यटन की शुरूआत हो चुकी है। लेकिन जरूरत इस बात की है कि इसे और बढ़ावा दिया जाय। इसके दो फायदे होंगे, पहला यह कि ग्रामीण भारत को स्वच्छ बनाने के लिए ग्रामीण इकाइयां मजबूर हो जाएंगी। जो गांव गंदा होगा, उसके यहां पर्यटक नहीं जाएगा। पर्यटन से स्थानीय स्तर पर कमाई भी होगी और ग्रामीण भारत में अगर शहरी भारत से पर्यटन के बहाने पैसे आएंगे तो वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गतिमान बनाएंगे। इसकी वजह से गांवों का विकास भी होगा।
गांव में अब भी बची हुई हैं मानवीय संवेदनाएं
करीब बीस साल बाद दो-तीन दिनों के अंतराल पर अपने गांव में बीस दिन रहने का मौका मिला। पच्चीस साल से महानगर में रहते हुए जिंदगी को देखने का एक ढर्रा बन गया है। यह कि समाज एक दम विखंडित हो गया है कि लोगों के पास किसी के लिए वक्त नहीं है कि हम मशीनी समाज में ढलते जा रहे हैं। हम सोशल मीडिया के गुलाम होते जा रहे हैं और हमारे रिश्ते सिर्फ फोन, सोशल मीडिया और इंटरनेट पर सीमित हो गए हैं। यह हम मानने लगे हैं और अहर्निश अपना राग सुनाने में मसरूफ मीडिया के तमाम मंच भी यही बताते रहे हैं।
लेकिन सच मानिए गांव में रहकर ऐसा नहीं लगा। लगा कि आधुनिक भारतीय समाज के बदलने, मशीनी होने, सोशल मीडिया केंद्रित होने आदि की जो अवधारणाएं हैं, वे गलत हैं। पितृ बिछोह के दर्द को मैंने दिल्ली में जिस तरह महसूस किया, वैसा गांव जाकर नहीं लगा। दिल्ली में लोगों ने सोशल मीडिया पर अपनी भावनाएं व्यक्त कर दीं। बहुत नजदीकी हुए तो फोन कर दिया। दफ्तरी संगी-साथी भी रस्मी प्रतिक्रियाओं तक ही सीमित रहे। इन रस्मों में भी सोशल मीडिया का असर ज्यादा रहा।
लेकिन गांव में ऐसा नहीं लगा। मेरे गांव से बलिया रेलवे स्टेशन करीब साढ़े अठारह किलोमीटर दूर है। लेकिन जैसे ही पिता के निधन के बाद मैं वहां रेल से उतरा, कई लोग मेरे साथ संवेदनाएं जताने आ गए। गांव में शायद ही कोई दिन रहा, जब हमारे घर दूर-दूर से संवेदनाएं जताने लोग नहीं आते रहे। वे लोग भी चाहते तो शहरी लोगों की तरह फोन पर संवेदना जता सकते थे।

गांव में अब भी संवेदनाएं जिंदा हैं..वहां दूसरों के सुख से सुखी भले ही कम लोग होते हों, दुख से दुखी जरूर होते हैं…अपवाद को छोड़ दें तो बेटी की विदाई और किसी की आखिरी विदाई के लिए पूरा समाज उमड़ आता है। जिस अर्थव्यवस्था को हमने अपनाया, जिस मशीनी सभ्यता के हम पिछलग्गू बने, उसने हमारे गांवों को भी जरूर बदला है। रही-सही कसर पंचायतीराज व्यवस्था के जरिए गांवों में घुसी राजनीति ने पूरी कर दी है। गांवों में जाति का दंश अब भी दिखता है। लेकिन वह सिर्फ वोट और राजनीति के लिए। मेरे पिता के श्राद्ध में दलित और पिछड़ा कही जाने वाली जातियों के काफी संख्या में लोगों ने भोजन किया। पहले की तरह उन्होंने अपना पत्तल नहीं उठाया। लेकिन हमारे घरों के उच्च कोटि-कुल के ब्राह्मण परिवारों के नौजवानों को उन पत्तलों को उठाने और फेंकने में कोई कचोट नहीं थी। और ना ही कोई छूआछूत या दर्द या गुस्सा।

यह ठीक है कि हमारे पहले की पीढी ने इस ऊंच-नीच को खूब माना, लेकिन अब की पीढ़ी राजनीति को छोड़ दें तो जातीय वैमनस्यता और दर्द के खेल से काफी दूर है। तो क्या यह मान लिया जाय कि राजनीति ही गांवों की दुश्मन है, अन्यथा संवेदनाओं के भरपूर झोंकों से अब भी गांव लबरेज हैं। इस सवाल का जवाब मैं तो हां ही में दूंगा…
आज की सभ्यता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि मनुष्य से मनुष्य दूर हुआ है। लेकिन यह शहरी समाज की समस्या है। कुछ एक अपवादों को छोड़ दें तो कम से कम गांव में तो एक का दर्द पूरे गांव का भले ही दर्द ना हो, मोहल्ले का दर्द जरूर है। सामूहिकता अब भी गांव में बची हुई है। यह सामूहिकता ही गांव की पहचान है और उसका सहज गुण भी। इसीलिए मैं कहता हूं कि गांवों की तरफ लौटना जरूरी है। गांवों को बचाना जरूरी है। गांवों को देखना जरूरी है। मनुष्यता, सामूहिकता और संवेदना को बचाए रखने के लिए संभवत: यह आज के दौर का सबसे जरूरी कदम होगा।
(मीडिया कंसल्टेंट, समाचार सेवा प्रभाग, आकाशवाणी, दिल्ली।)

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