November 16, 2019

सबको अपना मानता है गांव

डॉ गोपाल सिंह
भारतीय ग्रामीण परिवेश को समझने के लिए हमें थोड़ा-सा पीछे जाना पड़ेगा। और इसके लिए मुंशी प्रेमचंद की रचना से थोड़ी जानकारी लेनी होगी। उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए डॉ सुप्रभात सिंह ने अपने उपन्यास-अमर अवध बेतरणी में लिखा कि आज का गांव ग्रामीण परंपराओं को संजोए हुए है। गांव में जो कुछ भी अच्छा है, वह शहरों में चला जाता है। गांव का पढ़ा-लिखा युवा शहर को गया, गांव का अच्छा अन्न शहर को गया, सब्जी, दूध दही सभी शहरों की ओर चला जाता है। सच्चाई यह है कि आप कितना भी ईमानदारी से गांव के विकास की बात कहें, लेकिन हम गांव के साथ नाइंसाफी कर रहे है। गांव में केवल और केवल मजबूर व्यक्ति रहता है, चाहें वह मेरा सगा भाई ही क्यों न हो। मैं यदि पढ़-लिख गया तो शहर की ओर रुख कर लेता है और यदि उससे भी अधिक सक्षम हुआ तो भारत की भूमि छोड़कर विदेश में जा बसता है। यही कारण है कि गांव का विकास आज तक नहीं हुआ है।

हमारे गांवों की स्थिति यह है कि बिजली का ट्रासफार्मर यदि जल जाता है तो 15 दिनों तक बिजली नहीं मिलती है। गांवों में नहरें तो है पर उनका पानी खेतों तक नहीं पहुंचता है। गांव का वह प्राथिमक स्कूल आज भी उपेक्षित है, जहां से निकलकर आज के बड़े लोग चाहें वे राजनेता हो, फिल्म जगत की हस्तियां हो, कलाकार हो, आर्थिक जगत के लोग हो, सभी आए है। हमारे जमाने में 25 गांवो के बीच एक विद्यालय होता था और प्रतिभा संपन्न बच्चा ही उसमें पढ़ने जाता था। आज सरकारों का उद्देश्य-सब पढ़ें, सब बढ़े- हो गया है, जिसमें उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त कराना और नौकरी करना है, जबकि मेरा मानना है कि पढ़ाई का उद्देश्य कभी भी नौकरी नहीं होना चाहिए। गांव में आज भी डॉक्टर नहीं है,कई बुनियादी सुविधाएं गांव में उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन इन सभी कमियों के बाद भी गांव में जो अपनापन है वह शहरों के कतई नहीं मिलने वाला। गांव में हम एक दूसरे को दस-पांच पीढ़ियों से जानते है। गांव में हमारा एक दूसरे से खून का रिश्ता है। हम एक-दूसरे के दुख में, सुख में शामिल होते है। अगर हमारा किसी से मतभेद हो भी गया तब भी सामाजिक दबाव में हम अस्पताल से लेकर श्मशान तक खड़े होते है, शादी ब्याह में हमारे पास वक्त हो या नहीं, हमें सम्मिलत होना होता है। शहरों में सारे संबंध औपचारिक हो गए है। मानवीय स्वभाव है एक-दूसरे की आलोचना करना। गांव में ज्यादा अच्छे लोग नहीं बचे है और यदि कोई व्यक्ति 25-30 साल बाद वापस गांव में आना चाहे तो गांव के लोग ही उसे उसके वर्तमान परिवेश में रहने की इजाजत नहीं देते हैं। इतने लंबे अंतराल के दौरान उसने शहर से जो सीखा, उसे भी वह छोड़ना नहीं चाहता और गांव उस परिवेश को अपनाना नहीं चाहता।

जो वैश्विक बदलाव हमने हाल में देखे है, उससे गांव भी प्रभावित हुआ है-जैसे वाट्सआप, ट्विटर, फेसबुक, टीवी चैनल आदि आदि। आज जो परिवेश शहरों में दिखाई दे रहा है, वैसा ही गांवों में भी दिखाई देगा, लेकिन फर्क इतना है कि शहर के संबंध स्वार्थ पर आधारित है और गांव के ऐसा कतई नहीं है। गांव में सामाजिक डर बना हुआ
है, एक दूसरे से पीढ़ियों का जुड़ाव है, लोगों का खेती-बाड़ी का रिश्ता है, गाय बैल का रिश्ता है। आज भी लोगों का एक-दूसरे से खान-पान का रिश्ता है। गांव में आज भी संबंध जमीन से जुड़े हुए है। हम यह नहीं कह सकते कि गांव जड़वत हो गए हैं, भले परिवेश बदल रहा है। फिर भी शहर की अपेक्षा गांव कल भी बेहतर था और आज भी अच्छा है। शहर का सब कुछ जहरीला हो गया है, खान पान, रिश्ते-नाते, संबंध, पानी, हवा। वहीं गांव में आज भी शुद्ध वायु, शुद्ध पानी और खानपान है। यहां आज भी मौसमी चीजों पर जोर रहता है। इसलिए गांव आज भी नकली चीजों से बचा हुआ है। गांवों में बदलाव आया है, पर रिश्तों में दोहरेपन से गांव आज भी बचा हुआ है।

जहां तक मेरे गांव हिमगुटर गढ़ का प्रश्न है तो उसकी भूमिका स्वतंत्रता की लड़ाई में अहम रही। बताते हैं कि इस गांव के लोगों के पराक्रम के बारे में सूनकर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने कहा कि थाना धानापुर का नाम हिंदुस्तान के नक्शे से मिटा दिया जाए। लेकिन अंग्रेजी हुकुमत को जाना पड़ा, थाना धानापुर हिदुस्तान के नक्शे में वैसे ही बना रहा। इस क्षेत्र के निवासी डॉ मोती सिंह का नाम हिंदी साहित्य में आता है। यह गांव ज्यादा नहीं बदला है। खेतीबाड़ी से लेकर आपसी संबंध सभी परंपरागत तौर पर चल रहे है। जैसे अन्य गांवों को बिजली मिलती है दो-चार घंटे वैसे इस गांव को भी मिलती है। खेती आज भी उपर वाले के भरोसे है, नहर और ट्यूबवेल भी इधर लगे हैं। गांव में बदलाव आया है लेकिन कोई परिवर्तन ऐसा नहीं है कि जिसे आमूलचूल परिवर्तन की संज्ञा दी जा सके। मैं भी इस गांव के प्राथमिक स्कूल में पढ़ा, कुछ शिक्षा केंद्रीय विद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हुई। काशीनाथ सिंह के सान्निध्य में शिक्षा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। इसके बाद से शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ गया और संत दीनानाथ स्नातकोत्तर विद्यालय और पब्लिक स्कूल की स्थापना कर, दलित-वंचित वनवासी बच्चों को शिक्षित करने का काम कर रहा हूं।

चंदौली वह क्षेत्र है जहां से डाॅ राममनोहर लोहिया समाजवादी विचारधारा के साथ चुनाव लड़े और पराजित हुए। डाॅ नामवर सिंह कम्युनिस्ट विचारधारा के साथ लड़े और पराजित हुए। फिर भी आज लोग इन दोनों हस्तियों का सम्मान करते है। यह गांव है जो स्वार्थ से अलग डॉ नामवर सिंह, डॉ गया सिंह, डॉ काशीनाथ सिंह जैसे लोगों को अपना मानता है, भले ही इन्होंने गांव के लिए कुछ नहीं किया।
(शिक्षक, चंदौली इलाके में कई शिक्षा संस्थान खड़े किए।)

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