April 04, 2020

सैनिकों के गांव में खेती-बाडी

हरीश रसगोत्रा

भारत के मुकुट यानी जम्मू में मेरा एक छोटा-सा गांव है ‘संगवाल’। भारत के अन्य गांवों की तरह यहां का जीवन भी मुख्य रूप से खेती-किसानी पर ही निर्भर है। आधुनिक कृषि के इस दौर में भी मेरे गांव के लोग परंपरागत खेती को ही आधार बनाए हुए हैं। मुख्य रूप से गेहूं, मक्का, बाजरा और दालों की खेती होती हैं। अपनी जरूरत भर हरी सब्जी की खेती भी इधर होने लगी है।

संगवाल पंचायत में सात गांव आते हैं। पूरी पंचायत में लगभग 45 फीसदी आबादी सामान्य वर्ग की है। जबकि 50 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग हैं और लगभग 5 फीसदी अन्य पिछड़ा वर्ग मसलन लोहार, बढ़ई, नाई आदि हैं। आबादी करीब दो हजार है। गांव में तीन साल से छोटे बच्चों के लिए आंगनबाड़ी है। गांव के बच्चे आठवीं कक्षा तक गांव के ही सरकारी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हैं। आगे 10 वीं तक की पढ़ाई के लिए उन्हें विजयपुर शहर या राया में जाना होता है जो सात किलोमीटर की दूरी पर है। लेकिन गांव में निजी स्कूल भी है जो पहली से 10 वीं तक है और गांव के कुछ बच्चे शुरू से और कुछ माध्यमिक विद्यालय के बाद इसमें जाते हैं। गांव के कुछ लोग खेती बाड़ी के साथ-साथ गवर्नमेंट जॉब करते हैं और ज़्यादातर सेना में हैं।

मेरे गांव के लोगों में एकता है। वे सुख-दुख में एक-दूसरे का साथ देते हैं। हर मुश्किल में सभी मिलकर उसका मुक़ाबला करते हैं। यह हमारे गांव की खासियत है। मनोरंजन के लिए कई प्रकार के खेल खेलते हैं खो-खो, गिल्ली डंडा, क्रिकेट, वॉलीबॉल आदि। इसका ही नतीजा है कि 1985 में स्थापित रामलीला क्लब आज भी प्रत्येक साल रामलीला का मंचन करता है और आसपास के गांव के लोग भी उसे देखने आते हैं।

जब मैं छोटा था तो गांव में बैसाखी की खूब धूमधाम होती। हम बच्चों के आकर्षण का केंद्र इस मौके पर निकलने वाली शोभायात्रा होती थी। नाचते-गाते, ढ़ोल बजाते पूरे गांव में घूमना। अब बैसाखी का त्योहार थोड़ा फीका हो गया है। युवा गांव से बाहर रह रहे हैं। शोभायात्रा नहीं निकल पाती।

गांव की चौहद्दी में एक दाती मंदिर है। यह मंदिर दाती शीलावंती से जुड़ा है जो रसगोत्रा बिरादरी की हमारी पूर्वज थीं। वर्षों पहले सती हो गईं थी। वहां हर रविवार को गांव व आसपास के लोग आते हैं। पूजा पाठ करते हैं।

संगवाल

वहां एक तालाब भी हैं जिसे पवित्र माना जाता है। साल में एक बार यहां भव्य आयोजन होता है। बड़ा मेला लगता है। दूर-दूर से लोग आते हैं। गांव के जो भी लोग गांव से बाहर रहते हैं, वे इस दिन किसी न किसी तरह गांव जरूर पहुंचते हैं और इस आयोजन में शिरकत करते हैं।

मेरे गांव को विकसित गांव कह सकते हैं। गांव में पक्की सड़कें, पक्की गलियां, नालियां, कम्युनिटी हॉल, पंचायत घर और एक सरकारी मैरेज हॉल भी हैं जिससे बारिश, तूफ़ान के मौसम में भी कोई व्यक्ति अपना फंक्शन कर सकता है। गांव में कई मंदिर हैं। ज्यादातर लोग सुबह-शाम मंदिरों में जाते हैं। बांके बिहारी मंदिर बहुत बड़ा है। इसमें भगवान राम, सीता, लक्ष्मण और श्री कृष्ण, भगवान शंकर आदि विराजमान हैं।

गांव में दो अस्पताल है, एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और दूसरा उप पशु चिकित्सालय लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों के अभाव में या उनकी नियमित उपस्थिति नहीं होने के कारण ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ता है। कमोबेश यही हाल पशु चिकित्सालय का भी है, लेकिन ख़ुशी की बात यह है की डॉक्टर गांव के ही हैं तो जरूरत पड़ने  पर वे आ जाते हैं। 

मेरे गांव में फिशरीज प्लांट भी है जिसे सार्वजनिक तालाब का अधिग्रहण कर बनाया गया है। यहां काफी बड़ा तालाब था। जिसका अधिग्रहण करते समय सरकार ने लोगों को झांसा दिया कि सरकार इसका रखरखाव करेगी।

संगवाल

लाइट्स लगाई जाएंगी, पर्यटक स्थल बनेगा लेकिन सारी बातें गलत साबित हुईं। आज रखरखाव के अभाव में तालाब मरणासन्न स्थिति में है।

पहले गांव के लोगों ने तालाब की देखभाल के लिए एक व्यक्ति को रखा था। उसे किसान अनाज का हिस्सा देते थे। उसका काम तालाब का रखरखाव, साफ-सफाई करना था ताकि तालाब से पीने के पानी का भी काम हो और जानवरों को पिलाने का भी। खेती वर्षा जल पर ही निर्भर थी। हालांकि 1950 में पहली बार टयूबवेल लगा था लेकिन वह सिंचाई के काम के लिए पर्याप्त नहीं था। ट्यूबवेल के पानी का इस्तेमाल लोग जानवर को पिलाने और सफाई के लिए ही करते थे। आज गांव में दो सरकारी ट्यूबवेल है जिसकी सप्लाई न सिर्फ हमारे गांव में बल्कि पड़ोस के दो गांवों में भी होती है। अब ट्यूबवेल से चौबीस घंटे पानी मिलता है बिजली भी पहले चौबीस घंटे आया करती थी जिसकी वजह से हमारे नाते रिश्तेदार भी गर्मी के दिनों में हमारे गांव का रूख करते थे क्योंकि उनके गांव में बिजली, पानी का अभाव है। लेकिन अब मेरे गांव में भी कभी-कभी बिजली गुल हो जाती है।

मजदूरी करने के लिए गांव के लोग आजादी के पहले लाहौर जाते। भारत के विभाजन के बाद लाहौर से तो नाता टूट गया लेकिन भारत के अन्य शहरों से नाता जुड़ा। अब उनका नया ठिकाना है दिल्ली, अमृतसर आदि महानगर। आज गांव के युवा उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। चाहे पीएचडी हो, डॉक्टर हो, इंजीनियरिंग या फिर कोई अन्य क्षेत्र हर जगह गांव के युवा अपना योगदान दे रहे हैं। हमारे गांव में लड़कियां भी किसी से कम नहीं हैं। अपनी शिक्षा की बदौलत उन्होंने अच्छा मुकाम बनाया है। विशेष तौर पर मैं यहां उल्लेख करना चाहूंगा भानु प्रतिभा, दीक्षा शर्मा, शिवांगी शर्मा और शवि रसगोत्रा का। यह सभी डॉक्टर हैं। भानु डेंटिस्ट हैं तो वहीं शिवांगी और शवि आयुर्वेदिक डॉक्टर है, ये तीनों गांव में अपनी अलग पहचान रखती हैं और साथ में दीक्षा एमबीबीएस की स्टूडेंट है और जल्द ही वो भी एक नई पहचान बनाएगी और सफलता की नई इबारत लिखेगी ओर बाकियों के लिए भी प्रेरक बनेंगी। यहाँ तक की राजनीत में भी युवाओं की सक्रियता देखते बनती हैं। 

वर्तमान पीढ़ी की पढ़ाई के जरिए जीवन में बदलाव लाने की आकांक्षा को इसी से समझा जा सकता है कि अभी हाल ही में नायब तहसीलदार की परीक्षा का अंतिम परिणाम आया है उसमें मेरे भाई सुशील कुमार शर्मा भी चयनित हुए हैं। मनोज शर्मा जो रिश्ते में मेरे भाई है बैंक में मैनेजर हैं। गांव के रिकेश कुमार कृषि विभाग में बड़े पद पर हैं। ग्रामीण सुरेंद्र मोहन प्रोफेसर रहे हैं। गांव के युवाओं में सीमा सुरक्षा का जुनून सा दिखता है। सरकारी सेवा में जो भी हैं उनमें 90 फीसद फ़ौज या पैरा मिलिट्री में है। हमारे गांव के तेजींदर शर्मा फ़ौज में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे और आज कर्नल के पद पर हैं। गांव के ही जोगिंदर राम डोगरा चीफ इंजीनियर थे जो रिटायर हो चुके हैं।

पड़ोस के गांव बगुना के राजेंद्र सिंह की कथा उल्लेखनीय है। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह आजादी के समय जम्मू महाराजा की सेना की ओर से सीमा पर तैनात थे। जब कबाईलियों की सेना ने आक्रमण किया तो वे सेरी पुल के पास दुश्मन की गोलियों का जवाब देते हुए बुरी तरह जख्मी हो गए। 27 अक्टूबर 1947 की दोपहर को सेरी पुल के पास ही उन्होंने दुश्मन से लड़ते हुए वीरगति पाई। ब्रिगेडियर राजेंद्र सिंह को मरणोपरांत देश के पहले महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। फील्ड मार्शल केएम करिअप्पा ने 30 दिसंबर 1949 को जम्मू संभाग में बगूना-सांबा के इस सपूत की वीर पत्नी रामदेई को सम्मानित किया था।

हमारे गांव के योग राज एसएसबी में कांस्टेबल थे। 15 मार्च 1998 को शहीद हो गए। उन्हें असाधारण सुरक्षा सेवा प्रमाण पत्र भी दिया गया है। साथ ही गांव वालों ने अपने गांव के सपूत की याद को सहेजने के लिए राधा कृष्ण मंदिर का निर्माण कराया है। हालाकि शहीद योग राज के नाम पर लिंक रोड का नामकरण किया जाना है। कागजी कार्रवाई में होते विलंब को देख कर गांव वालों में थोड़ी नाराजगी भी है।

बैक टू विलेज एक सरकारी स्किम है जिसके तहत विभाग से जुड़े सरकारी अधिकारी गांव में आते हैं। शिव रसगोत्रा जो रिश्ते में मेरे चाचा है, गांव वालों ने उन्हें पंच चुना है। उनसे जब गांव के विकास की बाबत बात की तो पता चला कि गांवों में गलियों के निर्माण का काम हुआ है। सारी गलियों के पक्कीकरण का काम तेजी से चल रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के उन्नयन के जरिए उसे जन स्वास्थ्य केंद्र बनाया गया है। तालाब पर कोई खुले में शौच न करे या वहां पहुंचने वालों को विशेष तौर पर महिलाओं को सुविधा हो, इसलिए बाथरूम निर्मा+ण का काम भी कराया गया है।

इस तरह से कहूं तो हमारा गांव अपनी पुरातनता को सहेजते हुए विकास की प्रक्रिया में निरंतर आगे बढ़ते हुए यह भरोसा दिलाता है कि एक दिन देश के गांवो से एकाकार होते हुए आदर्श गांव की रूप में अपनी पहचान बनायेगा।

 

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