October 14, 2019

पहले गांव के गोद में थे शहर,अब शहर के शिकंजे में फंसा गांव

बासवराज पाटिल
आजादी के पहले गांव लगभग स्वावलंबी थे। घर की आवश्यकताएं, गांव की आवश्यकताएं, कृषि की आवश्यकताएं, सारी चीजों की पूर्ति उसी गांव से या आसपास के गांव से हो जाती थी। उस समय पैसा और मेहनत दोनों का बड़ा कीमत था। बिना शहर गए भी गांव वाले कई महीनों तक आराम से अपनी सारी जरुरतें पूरी कर लेते थे। यह गांव गांधी जी कल्पना और प्राचीन भारत का बोध कराता था। परंतु आज गांव व्यापक तौर पर परावलंबी हो गए है। ऐसा प्रतीत होता है कि शहर के बिना गांव रह ही नहीं सकते। पहले गांव के बलबूते और गांव की गोद में शहर होता था। अब शहर के शिकंजे में गांव फंसा है। शिकंजा और गोद में बड़ा अंतर है। वोट और राजनीति के कारण गांव के आपसी संबंध टूट गए हैं। पैसा प्रचूर हो गया है, मेहनत की प्रवृति खत्म हो गई है। आपसी संबंध दिखावे के बने हैं। परिवार के संबंधों में एक प्रकार के बिखराव का दयनीय दृश्य बना है। सारी कमाई झगड़ा और कोर्ट-कचहरी में जा रही है। आधुनिकता और वैज्ञानिक औजार के सहारे थोड़े समय के लिए आदमी किसी प्रकार जी सकता है, लेकिन जो स्थिति दिखती है, आने वाले 30 से 40 साल के भीतर भारत के 80 फीसदी नागरिकों को एक समय के भोजन के लिए बंधुआ मजदूर की तरह देश और विदेश में गुलाम बनकर काम करना पड़ेेगा।


जीवन से असंपर्कित शिक्षा नीति के प्रभाव में इंसान असहाय, निकम्मा, बेरोजगार और एक प्रकार की दयनीय चिंताग्रस्त स्थिति में फंस गया है। उसके पास डिग्री है, अच्छे अंक हैं, लेकिन न उसके पास आत्मविश्वास है, न कुछ कर गुजरने का हिम्मत है। आज का इंसान एक स्वाभिमान विहिन एवं आवश्यकता से अधिक सुविधा मिलने के कारण कर्मठता से दूर चला गया है। एक बहुत बड़े कृषि वैज्ञानिक एस ए पाटिल ने कहा है कि आज जो गांव में बसा है, वह वहां मजबूरी में रह रहा है। मौका पाते ही वह भी शहर में भागना चाहता है। यह भारत जैसे कृषि प्रधान देश में, जहां 36 फीसदी भूमि उपजाऊ है जो 400 करोड़ लोगों को अन्न दे सकता है, वह आज भी आत्मनिर्भर नहीं है। दुनिया के कुछ आंकड़े बताते हैं कि आने वाले 8-10 साल के अंदर गांव की जनसंख्या 30 फीसदी ही रह जाएगी, बाकी 70 फीसदी लोगों का वास शहरों में होगा। विश्व के सबसे अधिक जवानों लोगों के इस देश में ‘हर हाथ को काम’ नहीं मिल सकेगा, फिर तो उनके अंदर की राक्षसी-शक्ति इस देश की सारी व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर देगी और एक अराजकता की स्थिति उत्पन्न होगी। मानव की आवश्यकताएं, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, फल, अनाज, तरकारी इन सब को तो गांव ही पूरा करता है।

मेरा गांव…

मेरा जन्म कर्नाटक के गुलबर्गा जिले के तरनल्ली गांव में हुआ था। उस वक्त उस गांव की जनसंख्या लगभग 250 थी। मैं 8 साल का लड़का था। मेरे गांव का मोची जूता बनाकर देता था, कपड़ा धोने वाला धोबी, तेल निकालने वाला तेली, गांव की पहरेदारी करने वाला तरवार थे। ये सब गांव में होते थे। गांव में न कोई चारा बेचता था, न कोई दूध बेचता था। जिस किसी को जरूरत होती थी, वह दूसरे से बिना पैसे के पाता था। गांव में ही पढ़ाने के लिए एक शिक्षक थे। घर की आवश्यकता की सारी चीजें- पापड़-अचार, मिठाई, कपड़ा आदि, गांव में ही बनती थी। किसान अपने साल भर की आवश्यकताएं गांव के मंदिर में बैठकर चर्चा करके आपसी सहयोग से पूरा कर लेता था। हर घर की महिलाएं शाम को चार बजे घंटे-दो घंटे के लिए अपने खेत में जाकर तरकारी आदि का देखभाल करती और तरकारी ले आती थीं। खेत में काम करने वाले गर्मी के दिनों में खेत को साफ करने के लिए या खेत में हल चलाने के लिए तीन-साढ़े तीन बजे जाते थे। गांव के सामने बहती कमलावती नदी में 12 माह स्वच्छ जल बहता था। हाथ से रेत को हटाकर वही पानी अजुंरी में भरकर लोग पीते थे। हर गांव में अन्य स्थान पर जाने के लिए कुछ बैल गाड़ियां और घोड़े होते थे। उस गांव को कैसे भूल जाऊ समझ नहीं पाता।

आज मेरे गांव की जनसंख्या लगभग 800 है। गांव के लोग रोज 8000 रूपया गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, शराब में खर्च करते हैं। खेत में काम करने वाला मजदूर भी बिना शराब के बोतल और गुटखे के काम पर आने को तैयार नहीं। गांव में न भैस है न दूध है। एक प्रकार से वीरान स्थिति दिखती है। गांव में जाते ही चेहरा मायूस हो जाता है। गांव में जो एकजुटता थी, सामाजिक जीवन था, वो चुनाव के कारण खत्म हो गया है। घर, परिवार का सामाजिक वातावरण भी खत्म हो रहा है और अब जाति-पाति के आधार पर पूरा गांव गुटों में बंट गया है। गांव में न धोबी की कीमत है, न टेलर का महत्व रह गया है। तेली भी नहीं है। बढ़ई और लोहार की कारीगरी करने वाला भी भूखा पड़ा है। पशु धन लगभग समाप्ति की ओर है। बाहरी दिखावा बहुत है, लेकिन आत्मा मरी हुई है। और भी कई प्रकार की विकृतियां गांव में प्रवेश कर गई है, जिनका यहां चर्चा करना भी मुश्किल है।
गांधी जी के सपने के भारत में हम आज भी 10 करोड़ लोगों को स्वरोजगार से छोटे-बड़े मालिक तैयार कर सकते हैं। सरकारी व्यवस्था के झूठे आंकड़े इस देश को एक दिन बहुत बुरी हालत में ले जाएगे। इन 800 प्रकार के उद्योगों के मामले में सरकार को बड़े उद्योगों को अनुमति देना बंद करना होगा। अनावश्यक लंबी शिक्षा को ताला लगाना होगा। फिर जो बड़े उद्योग इन चीजों में काम कर रहे हैं, उनके उत्पादन को बढ़ाने की अनुमति खत्म करना, साथ ही साथ कुछ उत्पादनों को आने वाले 5 या 10 साल में बंद करना होगा। तभी भारत विश्व का श्रेष्ठ देश बन सकता है। हमें परंपरगात ग्रामीण व्यवस्था को लेकर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। हम फिर से घरेलू उद्योग, कृषि उद्योग, खानपान के सामान, रोज की आवश्यकताएं, रोज की सेवाओं पर ध्यान दें तो लगभग 800 प्रकार के उद्योग खड़े हो सकते हैं जैसा पहले था। इन उद्योगों को लेकर माहौल बनाने की जरूरत है। बनने वाला सामने हैं, बेचने वाला भी वहीं पर है, खरीदने वाला भी वहीं पर। हमें स्थानीय और स्थानीयता को संरक्षित करने वाला बाजार-व्यवस्था बनाने की जरूरत है।
आज हमने ऐसी शिक्षा व्यवस्था अपना रखा है कि लगभग 70 लाख इंजीनियर रोड पर खड़े हैं। उन्हें 5000 रूपया तनख्वाह की नौकरी देने वाला कोई नहीं है। सरकारी नौकरी का विज्ञापन आने पर 62 पोस्ट के लिए 3800 पीएचडी, 35 हजार मास्टर डिग्री वाले फार्म भरते हैं। क्या ज्ञानपरक शिक्षा इंसान को इतना नादान बना सकता है? यह सच्ची पढ़ाई नहीं है। जिस पढ़ाई से व्यक्ति का आत्मविश्वास नहीं बढ़ता, जीवन जीने की संस्कृति भी नहीं बनती, वो कैसी शिक्षा हो सकती है। इसलिए मुझे एक कन्नड़ की एक कविता याद आती है। 14 साल के वनवास के बाद सीता मां तो घर लौट आई, लेकिन 70 साल की आजादी के बाद स्वतंत्रता नहीं, स्वेच्छाचार से हम विनाश के कगार पर पहुंच गए हैं। हमें ऐसी शिक्षा की दिशा में बढ़ना होगा जो दुनिया को देने वाले मालिक को तैयार करे।


गांव का स्वाभिमान, गांव की जिंदगी इस तरीके की हो कि शहर वाले उसे देखकर रस्क करें। गांव का किसान इस जीव-जगत का दूसरा भगवान बने। अनावश्यक राजनीति की चर्चा के बिना गांव अच्छे विचारों की चर्चा के केंद्र बने। महात्मा गांधी की 150 वी जयंती वर्ष में उनके बताए ग्राम स्वराज के रास्ते पर चलने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं। हम सब जल्दी से जल्दी इस सच्चाई के नजदीक जाएं तभी भारत का कल्याण और उत्कर्ष संभव है। श्रद्धा से मेहनत कर सभी मानव अपने-अपने वृत्ति से भगवान के नजदीक पहुंचे।
(कर्नाटक के गुलबर्गा जिले के रहने वाले बासवराज पाटिल भारत विकास संगम के अध्यक्ष होने के साथ ही जानेमाने शिक्षा विशेषज्ञ, चिंतक व पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)

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