April 04, 2020

जहां भी रहे, गांववाला बने रहे

डाॅ संध्या सिंह
मेरे पिता डाॅ केदार नाथ सिंह की दो शादियां थी। पहली शादी चंपारण में हुई थी जो मात्र सवा महीने ही जीवित रही। मेरे पिता को दादी की संपत्ति के साथ ही अन्य तरह की बहुत सारी सपत्ति मिलती चली गई। परिवार में सिर्फ दो ही वारिश थे। मेरे पिता और एक बुआ। पिता का बुआ से बहुत लगाव था। मेरी बुआ पढ़ना चाहती थी लेकिन वह सिर्फ आठवीं कक्षा तक ही पढ़ पाई। मेरे पिता जब भी गांव जाते तो कई तरह की पत्रिकाएं लेते जाते। जिसके जरिए बुआ काफी कुछ पढ़ पाई और विभिन्न तरह के साहित्य में उनकी अच्छी रुचि थी। मेरे पिताजी को पढ़ाने में बुआ का बहुत योगदान था। वे पिता के घर में ही रहती थी।

गांव का अपना आनंद होता है। पिता के साथ हमलोग बचपन से ही छुट्टी में गांव जाते रहे हैं। गांव जाने पर बड़े-बुजुर्ग पूछते गांव कईसन लागल। हम जवाब देते नीमन लागल। लोग कहते, हां काहे न नीमन लागी अपन गांव। गांव में बायन बांटा जाता है। इस बार हम खुद बांटने गए। तभी गांव की किसी महिला ने कहा शहर में रहतारीस लेकिन अपने बायन बांट तारीस। लालटेन लेकर गए थे। लालटेन जलाके चेहरा देखते। बिजली की व्यवस्था नहीं थी। गांव की कई बातें याद आती है। एक भाभी थीं, तिरहुत क्षेत्र की। गरीब परिवार की थीं। उनको मैनें इतने साल बाद देखा। एकदम बदल गयी हैं। बूढ़ी सी हो गई हैं। पहले काफी सुंदर थीं। लोगों से जब पूछा तो बताया गया भूत लग गया है। उनको चुड़ैल पकड़ लिया। चुड़ैल कैसे पकड़ लिया। गंदा लपेट लेती थीं। कई-कई दिनों तक दूसरों से बात नहीं करती थीं। बाद में समझ में आया कि वो अच्छी जिंदगी जी कर आई थीं। जिस पति के विषय में सोच कर आयी थीं, वह बौड़म सा निकला।


पहले गांव में महिलाएं विशेष रूप से नई बहुएं आसपास के घरों में भी नहीं जाती थीं। लेकिन सखी रखने का प्रचलन था। मेरी मां की भी एक सखी थी। मेरे पिताजी की शादी के दिन ही गांव के बाला बाबा की शादी हुई थी। वे गणित के अच्छे शिक्षक थे। कोलकाता में ट्यूशन पढ़ाते थे। बुआ ने उनकी पत्नी को मां का सखी बनवा दिया। लेकिन मां दिन में अपनी सखी से भी नहीं मिल सकती थीं जबकि उनका घर दो-चार घर के बाद ही था। गांव पहले की तुलना में काफी बदल गया है। खपरैल के मकान पक्के मकान हो गए हैं। अब युवा पीढ़ी गांव में नहीं रह गई है। पहले गांव में मिडिल स्कूल हुआ करता था। बांस का पुल पार करके स्कूल जाते थे। पिताजी ने भी इस स्कूल में पढ़ा था। अब हाई स्कूल हो गया है। परीक्षा के दिनों में जब गई थी तो चीट-पुर्जे बिखरे हुए मिले। उस स्कूल से अच्छे-अच्छे लड़के निकले। अब गांव में एक उदासी-सी दिखाई देती है। पहले गांव में मिट्टी का बड़ा सा घर होता था, बड़ा-सा आंगन। चचेरे भाई किस्सा कहानी सुनाते थे। पुआल का बिस्तर बिछाया जाता। कौरा लगता था। वो चीजें नहीं दिखाई देतीं। 1985 में शादी के काफी दिनों बाद जब 2009 में दादी की मृत्यु हुई तो गांव गए थे। अब पक्का मकान बन गया है। पहले गांव तक पहुंचना कठिन था। सुरेमनपुर स्टेशन के बाद रानीगंज तक रिक्सा से जाना होता। उसके बाद पैदल। इसबार जब गांव जाना हुआ तो स्टेशन पर कोई मोटरसाइकल से लेने आया।

हमारा बचपन पडरौना में गुजरा है। पिताजी उदित नारायण डिग्री काॅलेज में प्रिंसिपल थे। पंडित रमाशंकर तिवारी और मेरे पिताजी साथ ही थे। दोनों साथ-साथ बीएचयू में पढ़ते थे। पिताजी जब हमें लेकर गांव जाते तो रास्ते में उन्हें अपने मित्र रामकिशोर सिंह रानीगंज बाजार पर मिल जाते थेे। गांव जाने के रास्ते के किनारे-किनारे नदी जाती थी और हमलोग उनके साथ चलते जाते। उनके अंदर गजब की किस्सागोई थी। रास्ते भर कोई न कोई बनावटी किस्से सुनाते जाते। कभी भूत की कहानिया ंतो कभी चुड़ैल की कहानियां। 5-7 किलोमीटर का सफर यूं ही कट जाता। जब बनारस में पढ़ते थे तो टेलीफोन नहीं होता था, पाईप लगाकर बात करते थे। इस तरह से बात बतकही होते सफर कट जाता था।
मेरे पिताजी का ईया से ज्यादा अच्छा संबंध था। किताब, अखबार, ट्रांजिस्टर तो होता ही था लेकिन वो घर-परिवार के बिना नहीं रह पाते थे। गांव बड़ा परिवार और देश उससे बड़ा। वे भोजपुरी में सांस लेते थे और हिंदी की रोजी रोटी खाते थे। वे गांव में किसी से भी हिंदी बोलने के बजाय भोजपुरी में ही बात करते थे। यहां तक कि दादी जब जेएनयू आईं तो विदेशियों से भी भोजपुरी में ही बात करती थीं। उनके संप्रेषण में भाषा कभी बाधा नहीं बनी।

हमारे पिताजी अकेले थे। एक बहन थी वे भी बाद में कोलकत्ता में रहती थीं। पिता का संबंध बुआ से चिढ़ाने वाला था। कहतीं इतनी उम्र के बाद भी बचपना नहीं गया। ज्यादा उम्र होने के बावजूद बुखार होगा तो दादी के कमरे में आकर बैठ जाते थे। दादी तेल लगाती थीं। उनके पिताजी डोमन सिंह कांग्रेस के समर्थक थे। जबकि मेरे पिताजी को इससे कोई लेना देना नहीं था। दादाजी काफी पत्र-पत्रिकाएं पढ़ा करते थे। बिस्तर के नीचे किताब और कान में रेडियो। पिताजी को जब कोई बात जाननी होती थी, तो दादा जी अपडेट करते थे। कुल मिलाकर राजनीतिक बात उन्हीं से जानते थे। कविता के लिए कच्चा माल भी मिलता था। दादा कम सुनते थे, इसका फायदा होता था, प्रपंच से दूर रहते थे। .बचपन में गांव की बोली अच्छी लगती थी। बलिया की, छपऱा की भोजपुरी अलग होती थी। जब कि बनारस की बोली कठोर थी। पिताजी कहते थे पश्चिम की भाषा खड़ी भाषा। पूर्व की भाषा पड़ी भाषा। वे दिल्ली में रहकर भी गांव को ही जीते थे। रोजाना गांव के लोगों से बात करते थे।

खान-पान में दही चूड़ा काफी पसंद था। जेएनयू के वातावरण में पेड़, पौधा, गिलहरी के करीब खुद को रखते थे। खाना खाने से पहले गिलहरी को देते थे। पहनावा भी साधारण था। पाजामा कुर्ता पहनते थे। उनका आम आदमी, सब्जीवाला, दुकानवाला, रिक्सावाला से सीधा संपर्क था। यह भी गांव के प्रति एक खिंचाव था। उनका यहां एक आॅटो वाले से ऐसा संबंध था कि जब चाहते बुला लेते थे। उससे बात करके उनको अच्छा लगता था। बीबी कहां है, बेटी कहां है। उसकी शादी कहां हुई। हालचाल लेते, बोलते, बतियाते चले आते थे। यह उनकी सरलता थी, निश्छलता थी। ड्राईवर उनके विषय में, वे ड्राईवर के घर का सारा हाल चाल जानते। मेरे पिता भले ही दिल्ली में रहते थे लेकिन गांव से उनका गहरा नाता था। साथ ही अपने संगी- साथियों से भी गहरा जुड़ाव था। कुछ लोगों को अपने साथ रखकर पढ़ाया और कुछ लोगों को पढ़ने-पढ़ाने में मदद की। हालांकि पिताजी कहा करते थे कि वे अपने क्षेत्र के लिए वह काम नहीं कर पाए जो टाॅलस्टाय कर पाए। वे कहा करते थे कि जो गांव के साथी थे उनके लिए कुछ नहीं कर पाया। यह मेरे मन में मलाल है।
पिताजी अकेले ही गांव की यात्रा पर निकल जाते थे। किसी को लेकर कोई दबाव नहीं, न ही गांव को लेकर हमपर कोई दबाव। चाहे वे कहीं जाएं, किसी के घर जाएं, चार-पांच लोगों को साथ लेकर चले आते थे। सूचना आती थीश्अचानक कि शाम को आंउगा। शाम को आते थे तो चार पांच लोगों के साथ। चाहे जहां जाएं, चार-पांच लोग होते ही थे। भीड़ में रहना, लोगों से घिरा रहना। कहते देख, हम जईसे रहल बानी ओईसहीं रहेम। देख, हमरा ईहे नीमन लागेला। बड़े दबंगई से अपनी बात पर दृढ़ रहते-मैं जो कर रहा हूं वो ठीक है। वे बच्चों के बीच बच्चे बन जाते। खुश भी होते, मानते भी थे। बाजारीकरण और दिखावेपन का उनपर असर नहीं था।
आज गांव का युवा शहर की ओर भागता है, वह कमतर काम कर लेता है। खेती को लेकर जो आग्रह होनी चाहिए वह हमारे यहां के गांवों में नहीं है। पंजाब में खेती काफी वैज्ञानिक ढंग से हो रही है। लोग गांव छोड़कर दिल्ली, दिल्ली छोड़कर अमेरिका जा रहे हैं। इस तरह गांव खाली हो रहा है, पलायन लगातार बढ़ रहा है। गांव नीति निर्माताओं की प्राथमिकता में रह नहीं गया है। खेती किसानी के लिए कितना बजट होता है। हमलोग कौशल विकास की बात करते हैं, लेकिन उस स्किल्ड में खेती नहीं है। गंवई कला लुप्त हो रही है। इस कला कौशल पर बहुत ध्यान देने की जरूरत है।
मेरे पिताजी कहीं भी रहे गांववाला बनकर ही रहे। शुरू शुरू में आए तो ग्रीन पार्क में चाहते तो घर ले सकते थे। कहते, हमरा कौनो दिल्ली में रहे के बा। लेकिन दिल्ली जैसे जकड़ लेती है। गांव में उनके उम्र के लोग साथ छोड़ते गए या बाहर बस गए। वे दिल्ली में गांव बनाना चाहते थे। मकान लिया लेकिन मकान के एक कमरे तक सिमटे रहे। एक गिलास, एक स्टील का प्लेट, बाबा दादी का फोटो, मां की यादें। किसी का फोन आता। पूछता कहां हैं, कहते, बेटी के यहां बैठें हैं, बेटी खाना वाना बनाई है। हमारी बेटी एनसीईआरटी में हैं न। पिताजी को खेती से कोई लेना देना नहीं था लेकिन हमारे पास खेत था। दो बड़े खेत थे सराड़ी और गोथरा। गांव से सटा हुआ था। अपनी कविता मांझी के पुल में लाल मोहर मांझी का नाम लेते हैं। वो दुसाध थे। किसान, मजदूरों के नाम उनके कविताओं में आते हैं। भरदुल लोहार कविताओं में आते हैं। वे जब गांव में जाते थे-खुटकी मिलती थी। बाजार जाते थे तो ठोंगे में लाते थे। जैसे वापस आते हमलोग हांथ फैला देते थे। उनकी कविताओं में ग्राम्य जीवन की ये सारी खूबियां मिलती हैं। खेलते हुए बच्चे, हांथ फैलाये हुए बच्चे। निशाद जी यानी कैलाशपति निशाद पडरौना के सामान्य से स्कूल में मास्टर थे। वे निशाद जी के साथ पडरौना के बाजार जाते थे। पडरौना का बाजार, निशाद जी का जिक्र कविताओं में आता है।


19 नवंबर को इसी घर में जन्मदिन मनाया। कुछ कविताएं पढ़वाईं। लग रहा था कि जाने की बेला में पहली बार जन्मदिन मना लिया। जनवरी के पहले सप्ताह में वे कोलकाता चले गए। हावड़ा में भी उनके लिए गांव जैसा ही माहौल होता। साल में दो बार जाते थे। नवंबर में गांव गए थे। 15 दिन रहे थे। उसके बाद पटना गए। बहन के बेटे की शादी थी। अभी हाल ही एक साल पहले उन्होंने गांव में गाय बांधने के लिए जो कमरा होता था, उसे तुड़वाकर कमरा बनवाया। उसमें रहे भी। गंगा और सरयू की पतली लकीर गांव के पास से गुजरती थी। बाढ़ आती है लेकिन गांव में नहीं। आज भी गांव में रिक्साा नहीं जाता था। हमें याद है कि चाची बीमार हो गई थीं तो डोली में लेकर गए थे हाॅस्पीटल। डोली में दुल्हन आती थी लेकिन डोली में बीमार को ले जाते देख हमें आश्चर्य होता था।
मेरी मां का नाम शिवकली था। उन्हीं के नाम पर दो लड़कियों को 10 हजार का स्काॅलरशीप देते थे। हमारा विचार है कि लड़कियों के नाम पर एक स्कूल खोलें। मेरा भाई सुनील ने उनका कमरा सुरक्षित रखा है। उनकी किताबों को समेट रहे हैं। साल में एक बार संभव हुआ तो 19 नवंबर को गांव में बड़ा कार्यक्रम करेंगे। महिलाओं को लेकर काम करने की योजना है। विधवा महिलाएं है उनको सहायता राशि देने की योजना है।
प्राध्यापक, एनसीईआरटी , दिल्ली।

केदारनाथ सिंह की कुछ कविता…

‘देखना
रहेगा सब जस का तस
सिर्फ मेरी दिनचर्या बदल जाएगी
साँझ को जब लौटेंगे पक्षी
लौट आऊँगा मैं भी
सुबह जब उड़ेंगे
उड़ जाऊंगा उनके संग…’

शहर में रात
केदारनाथ सिंह

बिजली चमकी, पानी गिरने का डर है
वे क्यों भागे जाते हैं जिनके घर है
वे क्यों चुप हैं जिनको आती है भाषा
वह क्या है जो दिखता है धुँआ-धुआँ-सा
वह क्या है हरा-हरा-सा जिसके आगे
हैं उलझ गए जीने के सारे धागे
यह शहर कि जिसमें रहती है इच्छाएँ
कुत्ते भुनगे आदमी गिलहरी गाएँ
यह शहर कि जिसकी ज़िद है सीधी-सादी
ज्यादा-से-ज्यादा सुख सुविधा आज़ादी
तुम कभी देखना इसे सुलगते क्षण में
यह अलग-अलग दिखता है हर दर्पण में
साथियों, रात आई, अब मैं जाता हूँ
इस आने-जाने का वेतन पाता हूँ
जब आँख लगे तो सुनना धीरे-धीरे
किस तरह रात-भर बजती हैं ज़ंजीरें


बुद्ध के बारे में सोचना

सर्दियों की एक रात में
बुद्ध के बारे में सोचते हुए
मुझे लगा, यह करुणा नहीं
अपने कम्बल के बारे में सोचना है
बार-बार कम्बल के बाहर निकलते
और मुड़ते हुए अपने घुटनों के बारे में
अपने पहले प्रेम
और हिमपात के बारे में सोचना है
बुद्ध के बारे में सोचना
हिमपात में बुखार के बारे में

पृथ्वी पर
पानी के भविष्य के बारे में सोचना है
बुद्ध के बारे में सोचना…

 

 

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