
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांवों के विकास के लिए सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की लेकिन इसे लेकर सांसदों ने कोई उत्सुकता नहीं दिखाई जिससे इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं
सांसद आदर्श ग्राम योजना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी योजना के रूप में सामने आई, लेकिन धीरे-धीरे यह योजना सरकार और सांसदों की प्राथमिकताओं से कोसों दूर होने लगी। शुरू से ही यह योजना सांसदों की उपेक्षा का शिकार तो रहा ही है, लेकिन अब केंद्र सरकार भी इस योजना पर चर्चा करने की जहमत नहीं कर रही है। पहले चरण में जहां 795 सांसदों में से 701 ने गांवों को गोद लिया, वहीं दूसरे चरण में केवल 298 सदस्यों ने ही गांवों का चयन किया है। अगर इसे फीसद में तब्दील करें तो यह सिर्फ 37.48 फीसद ही होता है। एक रिपोर्ट बताती है कि पश्चिम बंगाल के कुल 58 में से केवल पांच सांसदों ने पहले चरण में गांवों का चयन किया, वहीं दूसरे चरण में केवल दो सांसदो ने। यह आंकड़े एक तरफ सांसदों की निष्क्रियता पर सवाल खड़े करते हैं तो दूसरी तरफ सांसद आदर्श ग्राम के भविष्य पर।
सांसदों ने जिन गांवों को गोद लिया है वहां अब तक सिर्फ एक से दो बार गए हैं या कभी गए ही नहीं। पूर्व रक्षा मंत्री मोहन र्पीकर अपने गांव बरौलिया (अमेठी) में तो एक बार भी ग्रामीणों को दर्शन नहीं दे सके थे। यहां के 90 फीसदी ग्रामीणों को तो यह भी पता नहीं था कि उनके गांव को किस सांसद ने गोद लिया है। इसे विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जिस गांव को विकसित करने का बीड़ा सांसदों ने उठाया है उसी से वह नजरें चुराते फिर रहे हैं।1प्रधानमंत्री मोदी ने 2019 तक 2,200 गांवों का विकास करने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने इस देश को सपनों का भारत बनाने के उद्देश्य से इस योजना की शुरुआत की थी। उनकी सोच थी कि धीरे- धीरे जब गांवों का विकास होगा तो एक दिन भारत समग्र रूप से विकसित देशों की श्रेणी में आ जाएगा। लेकिन विपक्ष तो दूर भाजपा के सांसदों द्वारा ही उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है और यह चिंता का विषय है। भारत सरकार के ही आंकड़ों की बात करें तो दूसरे चरण में विभिन्न राज्यों के भाजपा के सांसदों में से गुजरात के 26 में से 8, बिहार के 22 में से तीन, दिल्ली के सात में से दो, कर्नाटक के 17 में से केवल चार जबकि उतराखंड के पांच में से शून्य सांसदों ने गांवों का चयन किया है। सवाल है सत्ताधारी सांसदों की जब यह हालत है तो विपक्षी सांसदों की खबर कौन ले? नेशनल सैंपल सर्वे की एक रिपोर्ट बताती है कि सांसदों द्वारा चयनित गांवों में अब तक तीन से चार फीसद ही विकास दिख रहा है। यह आंकड़े हमारे सांसदों की काबिलियत और उनकी नियत पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हम अपने जनप्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र के विकास के लिए चुनते हैं, लेकिन ये ही हमारी समस्याओं और आवश्यकताओं को नजरअंदाज करते हैं। ये सिर्फ अपने राजनीतिक भविष्य के प्रति ही महत्वाकांक्षी होते हैं, सामाजिक जीवन के प्रति नहीं। बुनियादी सुविधाओं को हासिल करना लोगों का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन प्रधानमंत्री की पहल को अपेक्षित सहयोग नहीं मिल रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस महत्वाकांक्षी योजना का उद्देश्य गांवों को सड़क, बिजली, शिक्षा, चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाओं से लैस करना था, लेकिन सच्चाई यह है कि सांसदों द्वारा गोद लिए गांव अभी भी आदर्श वाली छवि से कोसों दूर हैं। कुछ दिग्गज नेताओं द्वारा गोद लिए गए गांवों की समीक्षा करें तो स्थिति उनके कद के अनुरूप कतई नहीं है। इस योजना के माध्यम से स्वच्छ भारत अभियान के उद्देश्यों को भी भूनाने की कल्पना की गई थी, लेकिन चयन के लगभग तीन वर्ष बाद भी स्वच्छता की स्थिति जस की तस बनी हुई है। एक सर्वे के अनुसार महिला एवं बाल कल्याण विकास मंत्री मेनका गांधी के गुलड़िया (पीलीभित) गांव में 640 में से 630 परिवार खुले में शौच करते हैं तो विदेश राज्यमंत्री वी.के. सिंह के मीरपुर (गाजियाबाद) में 50 फीसद परिवार खुले में शौच करने को विवश हैं। सड़क, बिजली, चिकित्सा की हालत भी बदतर है। बिजली की तो यह हालत है कि कहीं खंभे तो हैं लेकिन उसमें बिजली नहीं आती। 1कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तो दूसरे चरण के लिए अभी तक गांव का चयन भी नहीं किया है। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ,लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामविलास पासवान आदि जैसे कद्दावर नेताओं के आदर्श ग्राम में लगभग यही सूरत-ए-हाल है। इन गांवों में लोगों में निराशा का माहौल है। न रोजगार प्रशिक्षण की व्यवस्था हुई, न पेयजल की कोई व्यवस्था है और न ही तालाबों का सौंदर्यीकरण हुआ है।
सांसदों को भी कई दुविधाओं का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ी दुविधा है कि इस योजना के लिए अलग से धन का कोई प्रावधान नहीं है। बल्कि सांसदों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी संसदीय क्षेत्र विकास निधि (एमपीलौड) का उपयोग करें। अब त भारत सरकार के विभिन्न मंत्रलयों, विभागों ने सांसद आदर्श ग्राम योजना की परियोजनाओं को वरीयता देने के लिए 23 योजनाओं को संशोधित किया है। साथ ही सांसद ग्रामीण विकास से जुड़ी अन्य केंद्रीय योजनाओं और ग्राम पंचायतों को उपलब्ध कोष को समन्वित करें। 1इसमें अगर आवश्यकता हो तो कॉरपोरेट सोशल रिजपांसिबिलिटी के तहत कंपनियों ने सामाजिक विकास के लिए जो धन रखा है, उसे जुटाने की कोशिश करें या फिर सांसद सामाजिक संस्थाओं की सहायता भी ले सकते हैं। लेकिन क्या ऐसा करना इतना आसान है? योजना को लेकर सांसदों के सामने एक और चुनौती है जो उनके अपने राजनीतिक भविष्य से जुड़ी है। सांसद आशंकित हैं कि अपनी कोशिशों से से वह एक गांव को आदर्श बना देंगे तो इससे उनके चुनाव क्षेत्र के दूसरे गांवों में ईष्र्या का भाव पैदा होगा, जिसकी कीमत उन्हें आने वाले चुनाव में चुकानी पड़ सकती है। एक लोकसभा क्षेत्र में 700 से 800 गांव आते हैं और यदि पांच साल में पांच गांव आदर्श बन भी जाएं तो बाकी गांव के लोगों द्वारा सवाल खड़े करना स्वाभाविक है। आदर्श ग्राम जैसी योजना प्रधानमंत्री मोदी की एक सार्थक पहल है, लेकिन जिस प्रकार से सांसदों द्वारा गोद लिए गए गांवों में विकास का ग्राफ ऊपर चढ़ने का नाम नहीं ले रहा है, इससे प्रधानमंत्री मोदी की आशाएं धूमिल होती हुई प्रतीत हो रही हैं। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं..दैनिक जागरण से साभार)
