तीन हफ्ते लंबी बाढ़ को भी मात दे रही है धान की यह नयी वेराइटी

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पुष्यमित्र, वरिष्ट पत्रकार

  • सीतामढ़ी और पश्चिमी चंपारण के इलाकों में सफल साबित हुआ है इनका परीक्षण। हर साल बाढ़ से प्रभावित होने वाले 40 गांवों के किसान उगा रहे हैं यह धान। बिहार के बाढ़ प्रभावित 34 हजार से अधिक गांवों के लिए वरदान साबित हो सकता है
  • इरास और कृषि विश्वविद्यालयों ने तैयारी की है स्वर्णा सब वन वेराइटी। फिलीपींस की सब वन वेराइटी के जीन को किया गया है स्वर्णा धान के साथ मिक्स

सीतामढ़ी :  जिले के रुन्नीसैदपुर प्रखंड के तिलक ताजपुर गांव में रहते हैं रामचंद्र पासवान. उम्र साठ के करीब हो गयी है, पिछले तीन-चार साल से दूसरे लोगों से जमीन लीज पर लेकर धान की खेती करते हैं. वे कहते हैं, महज चार-पांच साल पहले इस इलाके में कोई सावन-भादों में धान की बुआई करता था तो लोग पागल कहते थे. बागमती के किनारे बसे इस गांव में हर साल 15 से 20 दिन बाढ़ आना तय होता है, ऐसे में धान लगाने का मतलब होता था बीज का पैसा भी गंवाना. कुछ हौसलामंद लोग आश्विन महीने में धान की बुआई यह रिस्क लेकर करते थे कि अब बाढ़ का पानी नहीं आयेगा और खाने भर को धान तो हो ही जायेगा. मगर कई साल ऐसा भी होता कि दशहरा के समय में भी बाढ़ का पानी खेतों में घुस जाता और नये पौधों का सर्वनाश कर जाता.

मगर पिछले दो-तीन सालों से गांव में जोरशोर से धान की खेती होने लगी है. ऐसा धान की नयी किस्म स्वर्णा सब वन की वजह से मुमकिन हुआ है, जो 17-18 दिन तक बाढ़ के पानी को झेलने में सक्षम है. रामचंद्र पासवान कहते हैं कि गांव में खेती का रकबा लगभग 4500 एकड़ का है और इसमें तीन हजार एकड़ पर तो जरूर धान की खेती होने लगी है. बाढ़ आये न आये, दो मन से एक क्विंटल प्रति कट्ठा की दर से उपज होती ही है. वे कहते हैं, पहले आसिन का धान अगर बच भी जाता था तो एक कट्ठा में 50 किलो से अधिक धान कभी नहीं होता था.

दरअसल पिछले चार-पांच सालों से बिहार के सीतामढ़ी और पश्चिमी चंपारण जिले के तिलक ताजपुर जैसे 40 गांवों में अंतरराष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान(इरास) बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र में धान की सुरक्षित खेती को लेकर प्रयोग कर रहा है और उसके बेहतर नतीजे सामने आये हैं. सालाना बाढ़ से प्रभावित उत्तर बिहार के कई जिलों में खास कर नदियों के करीब और तटबंधों के बीच फंसे गांव के लोगों के लिए इस प्रयोग की सफलता एक बड़ी खुशखबरी है. क्योंकि लगभग हर साल बाढ़ झेलने वाले ये इलाके खरीफ के मौसम में खेती करने की हिम्मत अमूमन नहीं करते थे. जो करते भी थे, वे पूरे मौसम में भयभीत रहते थे कि कहीं बाढ़ उनके फसल को बरबाद न कर दे.

ऐसे ही किसानों की मदद के लिए इरास ने राजेंद्र कृषि विवि, पूसा, बिहार कृषि विवि, सबौर, आइसीएआर, पटना और केवीके की मदद से धान की एक ऐसी किस्म को तैयार किया जो 18 से 20 दिन तक बाढ़ के प्रकोप को झेल सके और इसके बाद भी किसानों को अच्छी पैदावार दे सके. इरास के राष्ट्रीय सलाहकार डॉ, वीरेंद्र कुमार कहते हैं कि इसके लिए हमने अपने देश की धान की किस्म स्वर्णा में फिलीपींस के सब वन वेराइटी के जीन को मिक्स किया है. फिलीपींस भी इस तरह की परेशानियों को झेलता रहा है, इसलिए उसने सब वन वेराइटी को अपने देश की ऐसी ही परिस्थितियों के लिए तैयार किया था. सवर्णा और सब वन के संयोग से इस नयी वेराइटी स्वर्णा सब वन का जन्म हुआ. पहले इसे कृषि विवि में उगाया गया. अब एक अन्य एजेंसी सीआरएस की मदद से बिहार के गांवों में इसे उगाया जा रहा है.

 

 

सीआरएस के क्षेत्रीय प्रमुख अजीत सिंह कहते हैं कि हमारे साथी गांव वालों को हर तरह का तकनीकी सहयोग दे रहे हैं, क्योंकि अगर यह प्रयोग सफल रहा तो बिहार के ऐसे 34 हजार गांवों के लिए यह वरदान साबित होगा. ये गांव अक्सर बाढ़ की समस्या से पीड़ित रहते हैं. तीन-चार साल से पश्चिमी चंपारण और सीतामढ़ी के 40 गांवों में हो रही इसकी खेती के काफी बेहतर नतीजे सामने आये हैं. तिलक ताजपुर गांव की आशा सिंह कहती हैं कि हालांकि अब एक-दो साल से बाढ़ का प्रकोप थोडा़ कम है, मगर उन्हें याद है कि एक बार 20 दिन तक पानी खेतों में ठहर गया, फिर भी धान की फसल को कोई नुकसान नहीं हुआ.

उसी प्रखंड के रमनगरा गांव के लोग भी इस धान की खेती से काफी प्रसन्न हैं. गांव में सीआरएस की तरफ से एक ट्रैक्टर वाले किसान को सीड ड्रिल कम जीरो टिल मशीन उपलब्ध कराया गया है. इसके जरिये बिना जुताई के धान की सीधी बुआई की जाती है, जिससे किसानों को काफी बचत होती है. इसके अलावा कम नुकसानदेह खरपतवार नाशक के इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी उन्हें दिया जा रहा है. सीआरएस के राज्य प्रमुख अजीत कहते हैं कि सफल परीक्षण के बाद सरकार द्वारा हर बाढ़ ग्रस्त इलाके में ब्लॉक स्तर पर स्वर्णा सब वन धान का बीज उपलब्ध कराया जा रहा है.

अपने यहां भी हुआ करती थी एक ऐसी वेराइटी

उत्तर बिहार के इलाके में पहले भी धान की ऐसी किस्में हुआ करती थीं, जो बाढ़ का मुकाबला करती थीं. तिलक ताजपुर के एक वृद्ध किसान कहते हैं, पहले कदरगौड़ नाम की एक धान की किस्म हुआ करती थी. उसे हमलोग बाढ़ के दौरान ही लगाते थे. धान के बिचड़े के नीचे मिट्टी को गोल आकार में लगा देते थे और अगर खेत में दो फीट पानी भी हुआ तो उसे ऊपर से गिरा देते थे. जैसे ही वह जमीन छूता उसका लगना तय हो जाता. वे कहते हैं, वह धान पानी के भीतर ही बढ़ता और बहुत जल्द उपर आ जाता. अगर इस दौरान पानी बढ़े भी तो भी वह ऊपर बढ़ता रहता. उस धान के पौधे छह फीट लंबे तक हुआ करते थे. मगर उस खेती में पैदावार उतनी नहीं होती थी. इसलिए धीरे-धीरे वह बीज इलाके से गायब हो गया. यह भी तीस-चालीस साल से पहले की बात है.(प्रभात खबर से साभार)

 

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