गांव बभंडी के यात्रा के बहाने पैतृक गांव श्रीपाल बसंत की यादें

संजय कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

मैं कभी गांव में नहीं रहा। मेरा घर छपरा शहर में है और बचपन में जब कभी गांव (श्रीपाल बसंत) गया तो रात में लौट आया। वह भी तब जब स्टेशन, अवतारनगर कई कोस दूर था और पैदल चलने के अलावा कोई साधन नहीं होता था। आने-जाने के लिए ट्रेन का कोई विकल्प नहीं था। उन दिनों जब किसी स्टेशन का नाम किसी व्यक्ति के नाम पर नहीं होता था तब हमारा स्टेशन राम अवतार सिंह के नाम पर था।
ग्रामीण बताते हैं कि गोराईपुर गांव के निवासी यदुनंदन सिंह ने अपने पिता राम अवतार सिंह के नाम पर अपने जवार के यात्रियों को बडागोपाल व दिघवारा स्टेशन जाने से निजात दिलाकर जमीन दान देकर छपरा सोनपुर रेलखंड पर 1955 ई. में अवतार नगर रेलवे स्टेशन का निर्माण कराया। हालांकि, छपरा से इतना नजदीक था कि हमलोग सुबह जाकर शाम-रात तक लौट आते थे।
छपरा-सोनपुर लाइन पर अवतारनगर स्टेशन से पहले और भी कई स्टेशन थे। कई नाम अब भी याद हैं पर यह नहीं कि सोनपुर की तरफ है या छपरा की तरफ। बचपन में छपरा से बसंत की यात्रा एक दिन में होती थी। बड़ा हुआ तो पता चला जमशेदपुर से लोग कोलकाता जाकर उसी दिन लौट आते थे और दिल्ली आया तो पता चला कि लोग मुंबई से लौट आते हैं। गोवा गया तो पता चला लोग दूधसागर फॉल देखकर शाम में लौट आते हैं। वहां भी फंस गया था। घने अंधेरे जंगल में ट्रेन का इंतजार करना पड़ा और एक मालगाड़ी के इंजन ड्राइवर ने इंजन में लिफ्ट दी थी। यह सब कर चुकने के बाद भी गांव जाने-रहने का कोई मुकाबला नहीं है।

मेरे बाबा श्री प्रसिद्ध नारायण सिंह, राजपूत उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, छपरा और जगदम कॉलेज के साथ क्षत्रिय छात्र निवास के संस्थापकों में थे। कोई 30 साल तक राजपूत स्कूल, छपरा के प्राचार्य रहे। बाद में उन्होंने छपरा कोर्ट में प्रैक्टिस भी की। उनकी पढ़ाई कलकत्ता में हुई थी। कानून की पढ़ाई के साथ वे अंग्रेजी में एमए थे और एक अनुशासित प्राचार्य के रूप में जाने जाते थे।

 

छपरा के घर की पुरानी तस्वीर, छोटी बहन के साथ

छपरा में हमारा घर राजपूत स्कूल के पास ही है और एक समय अकेला घर हुआ करता था। बचपन में जब हमलोग बताते थे कि छपरा में मेरा घर जगदम कॉलेज के पास है तो कुछ लोग कहते थे कि उहां त एके गो घर बा और कुछ लोग पूछते थे के केकर बेटा बाड़S? टाटा वालू के? मेरे पिताजी का नाम श्री उमारमण सिंह है। जमशेदपुर में नौकरी करते थे और सबसे बड़े हैं सो उम्र से लोग अंदाजा लगा लेते थे कि मैं जमशेदपुर वाले यानी सबसे बड़े बेटे का बेटा होउंगा। वे कुल पांच भाई और तीन बहन हैं। दो बड़ी बहनें अब नहीं रहीं। बाकी सभी भाई और छोटी बुआ हैं। मेरी एक बुआ पिताजी से बड़ी थीं और पटना वीमेन्स कॉलेज से पढ़ी थीं। बाबा दो भाई थे। उनके बड़े भाई वीरेश दत्त सिंह छपरा में राजनीतिक, सामाजिक रूप से सक्रिय थे। पर उनकी कोई संतान नहीं थी।
बचपन में बाबा के साथ एक दफा मैं लगभग भागते हुए स्टेशन पहुंचा था ताकि अंधेरा होने से पहले निकल सकें लेकिन स्टेशन पहुंच कर पता चला कि ट्रेन लेट है। छोटा सा स्टेशन था। ना कोई बेंच ना चाय वाला ना ही पर्याप्त रोशनी। चादर बिछा कर हम दोनों जमीन पर ही सो गये। ट्रेन की आवाज से नींद खुली तो कोयले वाला विशालकाय काला इंजन जैसे सिर पर खड़ा था। हड़बड़ा कर उठे और छपरा पहुंचे तो रात के साढे ग्यारह बज गये थे। समय इसलिए याद है कि उस समय वह सबसे देर तक जगे रहने का रिकार्ड था। हालांकि, सो तो मैं शाम छह बजे ही गया था।

कुछ साल बाद पता चला कि गांव में सड़क बन गई है। जाना-आना आसान हो गया। छपरा से 25 किलोमीटर ही है। लोग साइकिल से जाते-आते थे। मोटर साइकिल और कार से तो कोई दूरी ही नहीं थी। पर जाने का मौका नहीं मिला। एक बार जब गया तो सारे दिन पुक-पुक की आवाज होती रही पर समझ नहीं आया कि क्या है। शाम को बाबा से पूछा तो पता चला कि डीजल इंजन वाले आटा चक्की की आवाज थी।
बड़े होने पर बुलेट मोटरसाइकिल की आवाज अच्छी लगने लगी पर आटा चक्की की आवाज आज भी याद है। बड़े होने के बाद गांव की विशेषताएं धीरे-धीरे कम होती गई। और जाना लगभग नहीं हुआ। कुछ साल पहले छोटा भाई गया था तो मैंने फोटो भेजने के लिए कह दिया और फिर घर व दुआर की हालत देखकर गांव जाने की रही-सही इच्छा भी मर गई। गांव देखने जानने की कोशिश में कई और गांवों में गया हूं पर वहां अपना जैसा कुछ नहीं था।

वैसे भी अब घर के अंदर गांव जैसा कुछ रह नहीं गया है। बिजली नहीं आती है तो भी एलईडी की चार्जेबल लाइट से इतनी रोशनी होती है कि 10 लालटेन में भी वह मजा नहीं था। खुले में शौच खत्म भले न हुआ हो पर अब ‘मिशन’ नहीं रहा। यूरोपियन टॉयलट, जेट और हैंड शावर वहां भी पहुंच गए हैं। चैनल वाले चौधरी और चौरसिया तो हैं ही। इसलिए गांवों में कुछ खास बचा नहीं है। लेकिन धूप सेंकने और पैदल चलने का आनंद तो है।

ऐसे में पिछले दिनों झारखंड के गांव में जाने-रहने का बुलावा मिला तो मैं खुद को रोक नहीं पाया। मेरी बड़ी मामी (मामा अब नहीं रहे) गांव में अपने लड़कों और उनके परिवार के साथ ठाठ से रहती हैं। मामी का गांव बभंडी, झारखंड के पलामू जिले में है और पंचायत है। यह जिला मुख्यालय डाल्टनगंज से उत्तर की ओर 60 किलोमीटर दूर स्थित है। राज्य की राजधानी रांची से 216 किमी पर स्थित है। यह गांव झारखंड के पलामू जिले और बिहार के औरंगाबाद जिले की सीमा से सटा हुआ है। गांव में या गांव तक सड़कें अच्छी हैं, टाइलें लगी हैं और एलईडी लाइट भी। सौर ऊर्जा वाली लाइट भी खूब है और इस कारण लाइट न भी हो तो असुविधा नहीं होती है और गांव में चलना, घूमना निकलना सब आसान है।

ममेरे भाइयों के पास कार-ट्रैक्टर सब है। और उनके बच्चे भी दिल्ली-बंगलौर में। पहले जाना मुश्किल था अब सड़क पुल आदि बन जाने से आसान हो गया है। डालटनगंज स्टेशन से सिर्फ सात किलोमीटर लेकिन रात में रास्ता ऐसा लग रहा था जैसे नैनीताल के जंगल में होऊं। इन दिनों मौसम भी कुछ ऐसा ही था। मैं गया तो इस लालच में था कि रांची दिल्ली राजधानी से आराम से लौट आउंगा पर आते समय ट्रेन कैंसिल हो गई और वह सब हो ही गया जिससे डरता था। लेकिन जेब खाली हो तो जो संकट लगता है वही जेब भरी होने पर रोमांचक अनुभव देता है। और इसी क्रम में मैं वर्षों बाद रात की बस में चला और डालटनगंज से पटना पहुंचा।

इरादा पटना में कार से टहलने, नए फ्लाईओवर और गंगा पर बने पुल देखने का था पर टिकट कंफर्म कराने के चक्कर में यह इच्छा अगली बार के लिए रह गई। हालांकि पटना का नया बना बस अड्डा देख लिया जो शायद आमतौर पर रह जाता और नहीं देखता तो अनुमान भी नहीं होता कि क्या शानदार बना है।

 

 

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