जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा चुनी हुई सरकार दायित्व भूल, सियासत में उलझी

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 मनीष अग्रहरि 

ओ मजदूर! ओ मजदूर ! तू सब चीजो का कर्मा,तू ही सारी सुविधाओं से दूर
लखनऊ: काल बने कोरोना मर्ज के दौर में जिस तरह से मजदूरों पर सरकारी सितम ढ़ाया जा रहा है, ये लाइने बेसहारा, मजबूर, मजलूम, मजदूरों के लिए बिल्कुल सही साबित होती है। पहले तो शहरो के पूंजीपतियों ने उन्हे अपने काम, कारोबार बंद होने पर दूध में पड़ी मक्खी समझ कर उनके हालात पर उन्हे तिल,तिल के भूखों मरने को छोड़ दिया, बाद में रही, सही कसर केन्द्र और राज्य सरकारों ने पूरा कर दिया। सरकारों द्वारा मजदूरो को उनकी औकात बता दिया गया कि उन्हे सैकड़ों, हजारो किलो मीटर पैदल चल के घर पहुंचने, पुलिस की लाठियां खाने, भूखों मरने का अधिकार पिछले जन्म के कर्मो के फल की वजह से मिल रहा है। हालिया मामला मजदूरो से रेलवे द्वारा श्रमिक एक्सप्रेस नाम की चलाई गई रेलगाड़ियों से किराया के अतिरिक्त चार्ज वसूलने और बसों द्वारा घर भेजने के बजाय बीच रास्ते में ही अटका देने का है। हालांकि बाद में विपक्षी पार्टियो के हल्ला बोल और कुछेक मीडिया संस्थानो में किरकिरी होने के कारण रेलवे ने यह सफाई दी कि उसकी मंशा ऐसी नहीं थी, मगर हो चाहे जो यह सफाई और सख्ती सरकार की तब दिखी जब मजलूम, मजबूर, मजदूरों की जेब कट गई। 


रेल और राज्य के बीच पिसा मजदूर: केन्द्र सरकार ने लाकडाउन 3 के दौरान विभिन्न शहरों में फंसे प्रवासी मजदूरो को उनके घर पहुंचाने के लिए श्रमिक एक्सप्रेस नाम से स्पेशल ट्रेनें चलाई जिसमें तय था कि मजदूरों का किराया रेलवे और राज्य सरकारें 85 व 15 के अनुपात में वहन करेगी। मगर बाद में रेलवे और राज्य सरकारो के बीच आपसी सामंजस्य न बैठ पाने के कारण मजदूरो को न सिर्फ स्पेशल ट्रेन का टिकट खरीदना पड़ा बल्कि 30 रूपये प्रति टिकट सुपरफास्ट चार्ज और 20 रूपये अतिरिक्त किराया देना पड़ा। अकेले यूपी के लखनऊ शहर में 4 मई को जब 2100 मजदूर महाराष्ट्र से ट्रेन के मार्फत आए तो उन्होने महाराष्ट्र सरकार द्वारा खरीदे गए टिकटों को मीडिया को दिखा दिया, जिससे सरकार की लीपापोती से पर्दा उठ गया।
महाराष्ट्र के भिवंडी में यूपी के गोरखपुर के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई गई, जिसमे ट्रेन टिकट के अलावा 20 रूपये और 30 रूपये अतिरिक्त लिए जाने के कारण 100 से ज्यादा मजदूर बैरंग वापस लौट गए, और भिवंडी से गोरखपुर जाने वाली ट्रेन की 90 सीटे खाली रह गई। अब सवाल उठता है कि जब पूर्णबंदी का इतना दिन गुजर गया हो तो भला इन मजदूरों के पास इतना धन कहाॅं से आयेगा? वही दूसरी ओर रेलवे ने पल्ला झाड़ते हुये बताया कि ट्रेन के किराये की ज्यादा जिम्मेदारी (85 फीसदी) रेलवे और 15 फीसदी राज्य सरकारो की है। जिस राज्य को जितनी स्पेशल ट्रेनेे चाहिए, उसे उतने का इसी अनुपात में किराया वहन करना पड़ेगा। 
सवाल खड़ा होता है कि जब मजदूरोे के घर वापसी के लिए पहले से राज्य सरकारोे द्वारा पंजीकरण किया गया था तो, उसी समय ऐसी कोई व्यवस्था क्यो नही बनाई गई कि मजदूरों को टिकट न लेना पड़े। यदि राज्य सरकारो व रेलवे के द्वारा मुफ्त में ही मजदूरो को यात्रा करवानी थी तो टिकट काउंटर किस लिए खोले गए? इसका मतलब साफ है कि  महाराष्ट्र जैसे राज्य सरकार की यह सोची-समझी चाल थी?


हालांकि बाद में रेलवे और राज्य सरकार दोनो की किरकिरी होने पर केन्द्र की भाजपा सरकार व बिहार समेत अन्य राज्यों ने न केवल प्रवासी मजदूरो का किराया वहन करने की बात कही बल्कि रेलवे की तरफ से भी मामले की लीपापोती करते हुए सफाई देने का प्रयास हुआ। कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एलान किया कि इन मजदूरो के टिकट का पैसा कांग्रेस वहन करेगी। वही बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि अन्य राज्यो से श्रमिक स्पेशल ट्रेन से लौटने वाले मजदूरो को किराये की राशि प्रदेश सरकार लौटा देगी। वही दूसरी ओर केन्द्र सरकार की ओर से बचाव में देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा “हमने लाकडाउन के दौरान सभी लोगो को वे जहां है, वही रहने की सलाह दी है, लेकिन विशेष् स्थित में ट्रेनो के चलने की अनुमति दी। हमने प्रवासी मजदूरो से किराया वसूलने की बात कभी नही की।” वही मजदूरों से किराया वसूलने वाले राज्य महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्वव ठाकरे ने कहा कि मजदूर अपने घर जा रहे है, ऐसे में उनसे किराया लेना उचित नही है। बावजूद इसके  मजदूरों के घर वापसी के लिए रेल और राज्य के बीच वहन करने वाले किराये के नियम को कुछ इस तरह पेंचीदा बनाया गया कि मजदूरो को भुखमरी के दौर में भी किराया देना पड़ा, और जो न दे पाया वो अपने आंसू बहाते, डंडे खाते बैरंग शहरों में ही रहने को अभिशप्त हुआ। 

प्रशासन ने फेरा मजदूरों के पैसे पर पानी: ऐसा नही कि मजदूरो से पैसे ऐंठने की घटनाए सिर्फ ट्रेन यात्रियों के साथ हुई, बल्कि मजदूरों द्वारा निजी बस बुक करने पर बीच रास्ते मे ही भूखे प्यासे छोड़ कर भी धोखा दिया गया । ऐसा एक वाकया है जिसमें गुजरात के सूरत शहर में यूपी  के गोरखपुर और उसके इर्द, गिर्द के मजदूरो ने पांच-पांच हजार रूपये के चंदे लगाकर अपने घर वापसी को पास बनवाए, जिसमें गुजरात प्रशासन द्वारा लगभग 7000 लोगो को घर भेजने का पास बनाया गया था। बसो के वहां से चलने पर गोधरा मध्य प्रदेश के विभिन्न बार्डर पर बसों को रोक दिया गया, जिससे मजदूर और उनके परिवार भूख, प्यास और दर्द से तड़पने रहे।   

खाना के नाम पर खेल: विभिन्न राज्यों में मजदूरो के लिए केंद्र और राज्यों द्वारा दाना, पानी मुहैया कराये जाने का फंड दिया है, मगर राज्यो की नौकरशाही सही से वितरित न करके सौ को खिला कर लाख का दिखा के अपना उल्लू सीधा कर रही है। शायद यह भी एक कारण है कि राज्य सरकारे उन्हे कीड़े, मकोड़े समझ कर उन्हे उनके हाल पर मरने दे रही है, ताकि जब तक ये बाहरी राज्य के मजदूर बसे रहेगे तब तक लालफीताशाही के जरिए धन उगाही होती रहेगी।
हेल्पलाइन नंबर का जवाब नहीं

लाक डाउन में फंसे ज्यादातर गैर राज्यो के लोग अपने-अपने राज्यो द्वारा दिए गए हेल्पलाइन से हसरत पाले बैठे थे, मगर फोन रिसीव ही नही होता था। यूपी के प्रतापगढ़ जिले के रहने वाले पदुम यादव ने बताया कि ”मै महाराश्ट्र में फॅंसा हुुआ था, इस दौरान जब मैने यूपी के हेल्पलाइन नंबर पर फोन किया तो फोन ही नही उठा।“

 

पिटते, मरते मजदूर:

 2 मई: यूपी,एमपी के सीमा पर फंसे जौनपुर के मड़ियाहू तहसील के सैकड़ो मजदूरो को एमपी की पुलिस मार कर यूपी में खदेड़ देती है, जब कि यूपी की पुलिस मारकर एमपी में खदेड़ देती है।

  1 मई को बिहार के खगड़िया जिले का रहने वाला 35 साल का धर्मवीर दिल्ली से अपने घर बिहार साईकिल से जा रहा था, हालत गंभीर होने पर यूपी के सहारनपुर के पास उसकी सांसे थम गई।

 28 अप्रैल: जैसलमेर (राजस्थान) से लौटते हुए उज्जैन के पास भैरवगढ़ मंदिर के पास सड़क पर सो रहे तीन मजदूरो के ऊपर ट्रक चढ़ने से मौत हो गई ।

 27 अप्रैल: सबसे दर्दनाक कहानी यूपी के श्रावस्ती जिले के मुंबई में हेल्पर का काम करने वाले इंसाफ अली का है। वे 13 अप्रैल को मुंबई से यूपी के श्रावस्ती जिले के मठकनवा गांव के लिए निकले। करीब 1500 किमी का सफर 14 दिनो में तय कर लिया, मगर वहां पहुंचने पर कारैंटाइन कर दिया गया, उसी दिन उनकी मौत हो गई।

 27 मार्च: गुजरात से बिहार पैदल जा रहे 4 मजदूरो की मुबई-अहमदाबाद राजमार्ग पर आटो से कुचल कर मौत हो गई।
 

आज जब सभी सरकारे, मजदूरो के भलाई के दावे कर रही है, तो इस तरह मजदूरों की शर्मनाक मौत और उनकी दुरावस्था सरकारों की नुमाइंदगी पर प्रश्नचिंह खड़ा करती है। बेहतर होगा कि सरकार कथनी, करनी में अंतर घटाये, क्यो कि ये वही मजदूर है, जो असल में राष्ट्र निर्माता है, इनके बिना न तो कोई इंडस्ट्री चलेगी, न ही कोई निर्माण, विनिर्माण। बावजूद इसके शहर निर्माताओं के साथ कोरोना काल में जिस तरह का व्यवहार लगातार हो रहा है, और जिस तरह के सियासत के कुचक्र में वो फंसे हुए हैं वो वर्षों तक याद किया जाएगा।

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