मंगरूआ
- यशपाल के गुरदास की तरह बेटी ज्योती को नहीं है ‘अखबार में नाम’ की चाहतआपने भी अपने जमाने में हिंदी के स्कूली पाठ्यक्रम में यशपाल लिखित ‘अखबार में नाम’ कहानी पढ़ी होगी। उस कहानी के संवाद को याद कीजिए और आज बेटी ज्योती जो गुरूग्राम से साईकल चलाते हुए कैरियर पर अपने बीमार पिता को बिठा दरभंगा स्थित अपने गांव सिरहुल्ली पहुंची है दोनों पात्रों को समानांतर रखते हुए स्थिति को देखिए।
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गुरदास संध्या समय थका-मांदा और झुंझलाया हुआ दफ्तर से लौट रहा था। भीड़ में से अखबारवाले ने पुकारा, ‘आज शाम की ताजा अखबार। नाहर मुहल्ले में प्लेग फूट निकला। आज की खबरें पढ़िये।’
अखबार में अपने मुहल्ले का नाम छपने की बात से गुरदास सिहर उठा। उसके मस्तिष्क में चमक गया… ओह, दुलारे की खबर छपी होगी। अखबार प्राय: वह नहीं खरीदता था परन्तु अपने मुहल्ले की खबर छपी होने के कारण उसने चार पैसे खर्च कर अखबार ले लिया। सचमुच दुलारे की खबर पहले पृष्ठ पर ही थी। लिखा था, ‘बीमारी की रोक-थाम के लिए सावधान।’ और फिर दुलारे का नाम और उसकी खबर ही नहीं, स्ट्रेचर पर लेटे हुए, घबराहट में मुंह खोले हुए दुलारे की तस्वीर भी थी।
गुरदास ने पढ़ा कि बीमारी का इलाज देर से आरम्भ होने के कारण दुलारे की अवस्था चिन्ताजनक है। पढ़कर दुख हुआ। फिर ख्याल आया इस आदमी का नाम अखबार में छप जाने की क्या आशा थी? पर छप ही गया।
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कोरोना महामारी में सरकार द्वारा लागू किए गये लॉक डाउन में 13 वर्षीय ज्योती अपने पिता की जान बचाने के लिये साईकल से ही 1200 किलोमीटर दूर दरभंगा के लिए चल पड़ती है। रास्ते में वह कहीं थकती है,कहीं रूकती है, कहीं सुस्ताती है, कहीं कोइ कुछ खिला देता है तो खा लेती है। उसे उम्मीद भी नहीं है कि उसका नाम अखबारों और टीवी चैनलों की सुर्खिया बनेगा। उनके लिए ये कोरोना काल की महत्वपूर्ण खबर साबित होगी। क्योंकि ज्योती नहीं हजारों ज्योतियां अपने परिवार को संग साथ लिए महानगरों से बेदखल हो जान बचाने के लिए अपने गांव में निकल पड़ी थी।
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अपना-अपना भाग्य है, एक गहरी सांस लेकर गुरदास ने सोचा। दुलारे की अवस्था चिन्ताजनक होने की बात से दुख भी हुआ। फिर ख्याल आया देखो, मरते-मरते नाम कर ही गया। मरते तो सभी हैं पर यह बीमारी की मौत फिर भी अच्छी! ख्याल आया, कहीं बीमारी मुझे भी न हो जाये। भय तो लगा पर यह भी ख्याल आया कि नाम तो जिसका छपना था, छप गया। अब सबका नाम थोड़े ही छप सकता है।
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ज्योती का नाम अखबार में छप गया है। टीवी चैनल वाले उसके दरवाजे पहुंच रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति की बेटी उसको केंद्र में रखकर ट्वीट करती हैं। उसके दुरावस्था पर ध्यान न देते हुए उसके बहादुरी को सलाम करती हैं। पीछे—पीछे सियासत भी चल पड़ती है इस बहादुर बेटी की तलाश में उसके गांव सिरहुल्ली। सब लोग उसके बहादुरी का गौरव गान कर रहा है। कोई उसे साईकल गिफ्ट कर रहा है, तो कोई उसके नाम से डांक टिकट जारी कर रहा है। किसी को अब ये फिक्र हो आई है कि बेटी के घर में शौचालय होना चाहिए। तो कोई राशन भरवा रहा है। एक ज्योती। मदद को उठे सैकड़ों हांथ। सब अपने हिस्से का योगदान ज्योती के झोली में डाल देना चाहते हैं।
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‘हाय! हाय मां!’ उसकी चीखें निकली जा रही थी। लोगों ने उठा कर उसे एक मोटर में डाल दिया।
हस्पताल पहुंचकर उसे समझ में आया कि वह बाजार में एक मोटर के धक्के से गिर पड़ा था। मोटर के मालिक एक शरीफ वकील साहब थे। उस घटना के लिए बहुत दुख प्रकट कर रहे थे। एक बच्चे को बचाने के प्रयत्न में मोटर को दायीं तरफ जल्दी से मोड़ना पड़ा। उन्होंने बहुत जोर से हार्न भी बजाया और ब्रेक भी लगाया पर ये आदमी चलता-चलता अखबार पढ़ने में इतना मगन था कि उसने सुना ही नहीं।
गुरदास कूल्हे और घुटने के दर्द के मारे कराह रहा था। कुछ सोचना समझना उसके बस की बात ही न थी।
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रोज बेटी ज्योती का इंटरव्यू हो रहा है। पिता भी फूले नहीं समा रहे हैं। कल ही बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने रविवार की शाम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये बातचीत की। उसे आश्वासन दिया कि उसकी पढ़ाई और शादी का खर्चा उठायेंगे। साथ ही आर्थिक मदद देने की बात कही, ज्योति के पिता मोहन पासवान को नौकरी दिलाने का आश्वासन भी दिया और इसकी जानकारी सोशल मीडिया के जरिए देश के दुनिया के लोगों को भी दिया।
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डाक्टर ने गुरदास को नींद आने की दवाई दे दी। वह भयंकर दर्द से बचकर सो गया। रात में जब नींद टूटी तो दर्द फिर होने लगा और साथ ही ख्याल भी आया कि अब शायद अखबार में उसका नाम छप ही जाये। दर्द में भी एक उत्साह-सा अनुभव हुआ और दर्द भी कम लगने लगा। कल्पना में गुरदास को अखबार के पन्ने पर अपना नाम छपा दिखायी देने लगा।
सुबह जब हस्पताल की नर्स गुरदास के हाथ-मुंह धुलाकर उसका बिस्तर ठीक कर रही थी, मोटर के मालिक वकील साहब उसका हाल-चाल पूछने आ गये।
वकील साहब एक स्टूल खींचकर गुरदास के लोहे के पलंग के पास बैठ गये और समझाने लगे, ‘देखो भाई, ड्राइवर बेचारे की कोई गलती नहीं थी। उसने तो इतने जोर से ब्रेक लगाया कि मोटर को भी नुकसान पहुंच गया। उस बेचारे को सजा भी हो जायेगी तो तुम्हारा भला हो जायेगा? तुम्हारी चोट के लिए बहुत अफसोस है। हम तुम्हारे लिये दो-चार सौ रुपये का भी प्रबन्ध कर देंगे। कचहरी में तो मामला पेश होगा ही, जैसे हम कहें, तुम बयान दे देना; समझे…!’
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ज्योति के पढ़ाई का सारा खर्च लोजपा सांसद चिराग पासवान ने उठाने का वादा किया है। उन्होंने कहा है किवे ज्योती के ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई का सारा खर्च वहन करेंगे। साथ ही उन्होंने ज्योती को 51 हजार रुपये की आर्थिक सहायता देने की घोषणा भी की थी। रोटरी क्लब के सदस्य नीरज खेड़िया ज्योती से मिलने उसके घर गये और हौसले की प्रशंसा करते हुए साइकिल दी। कहते हैं ज्योती ने न केवल जिले, बल्कि पूरे राज्य का नाम रोशन किया है। साइकिल मिलते ही ज्योती खुशी से झूम उठी। पास खड़े लोगों ने ताली बजाकर उसका हौसला बढ़ाया तो उसकी और उसके परिवार की आंखें खुशी से भर आईं। नई साइकिल मिलते ही ज्योती ने उसपर सवार होकर कुछ दूर चक्कर लगाया। मानों वह बता रही थी कि आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार है।
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गुरदास वकील साहब की बात सुन रहा था पर ध्यान उसका वकील साहब के हाथ में गोल-मोल लिपटे अखबार की ओर था। रह न सका तो पूछ बैठा, ‘वकील साहब, अखबार में हमारा नाम छपा है? हमारा नाम गुरदास है। मकान नाहर मुहल्ले में है।’
वकील साहब की सहानुभूति में झुकी आंखें सहसा पूरी खुल गयीं, ‘अखबार में नाम?’ उन्होंने पूछा, ‘चाहते हो? छपवा दें?’
‘हां साहब, अखबार में तो जरूर छपना चाहिए।’ आग्रह और विनय से गुरदास बोला।
‘अच्छा, एक कागज पर नाम-पता लिख दो।’ वकील साहब ने कलम और एक कागज गुरदास की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘अभी नहीं छपा तो कचहरी में मामला पेश होने के दिन छप जायेगा, ऐसी बात है।’
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मां फूलो देवी कह रही है ज्योती को बेटी के रूप में पाकर धन्य महसूस कर रही हूं। उसने परिवार का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया। जब से गुरुग्राम से लौटी है, कोई न कोई मिलने पहुंच रहा है। कोई फोटो ले रहा तो कोई हौसला बढ़ा रहा। कई लोग मदद को आगे आए। कुछ न कुछ देकर गए हैं। जब यह बात ज्योती के पिता को मालूम हुई, तब से वे क्वारंटाइन सेंटर से घर आने को बैचेन हैं। इधर, ज्योती के दो छोटे भाई और दोनों बहनें उसकी उपलब्धि पर फूले नहीं समा रहे।
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गुरदास को लंगड़ाते हुए ही कचहरी जाना पड़ा। वकील साहब की टेढ़ी जिरह का उत्तर देना सहज न था, आरम्भ में ही उन्होंने पूछा- ‘तुम अखबार में नाम छपवाना चाहते थे?’
‘जी हाँ।’ गुरदास को स्वीकार करना पड़ा।
‘तुम्हें उम्मीद थी कि मोटर के नीचे दब जानेवाले आदमी का नाम अखबार में छप जायेगा?’ वकील साहब ने फिर प्रश्न किया।
‘जी हाँ!’ गुरदास कुछ झिझका पर उसने स्वीकार कर लिया।
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जिले के प्रभारी मंत्री सह योजना एवं विकास मंत्री महेश्वर हजारी ने ज्योती को 51 हजार रुपये देने का एलान किया। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन खत्म होते ही वे पहली जून को ज्योती से मिलने उसके गांव जाएंगे। राजद के जिलाध्यक्ष रामनरेश पासवान ने ज्योती को 51 हजार रुपये दिए। विकासशील इंसान पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष उमेश मांझी ने ज्योती के पिता के इलाज के लिए 10 हजार रुपये दिए। ऑल इंडिया दुसाध परिवार ने भी ज्योती को सम्मानित किया। ज्योती को साइकिल, कपड़े, चादर सहित 51 सौ रुपये दिए। ज्योती के पिता को नौकरी देने की पेशकश की।
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अगले दिन अखबार में छपा, ‘मोटर दुर्घटना में आहत गुरदास को अदालत ने हर्जाना दिलाने से इनकार कर दिया। आहत के बयान से साबित हुआ कि अखबार में नाम छपाने के लिए ही वह जान-बूझकर मोटर के सामने आ गया था…’
गुरदास ने अखबार से अपना मुँह ढाँप लिया, किसी को अपना मुँह कैसे दिखाता…।
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ऑल कंपाउंडर एसोसिएशन ने भीज्योती को सम्मानित किया। एसोसिएशन के सदस्यों ने बैग, सैनिटाइजर, मास्क, कपड़े, मेडल, साबुन, डायरी सहित अन्य सामान दिए। अध्यक्ष अमरेश कुमार यादव ने कहा कि ज्योती के पिता के निशुल्क इलाज की व्यवस्था की जाएगी। एसोसिएशन के सदस्यों ने पिता-पुत्री की मौके पर स्क्रीङ्क्षनग कर घर व आसपास को सैनिटाइज किया।
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हुजुर गुरदास की तरह अखबार, टीवी में नाम छपवाना हो छपवा लीजिए। चुनाव के मद्देनजर कुछ वोट का जुगाड़ करना है कर लीजिए लेकिन ये मदद के बहाने इस कोरोना महामारी के दौर में बेटी का पिता के प्रति ममता और जवाबदेही को चंद सिक्कों न तौलिए। सियासत की खातिर किसी के गरीबी का मजाक न उड़ाईए। यदि सचमुच में जवाबदेह हैं तो वो काम कीजिए जिससे किसी ज्योती को अपने पिता का बोझ ढ़ोने को मजबूर न होना पड़े।
