मंगरूआ
नयी दिल्ली: मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौंसलों से उड़ान होती है। 13 वर्षीय ज्योति का सपना था कि उसे किसी भी तरह अपने बीमार पिता को सुरक्षित अपने गांव पहुंचा देना है। उसके पास पंख तो थे नहीं, हां हौसला था, और इसी हौसले का दामन थाम वो चल पड़ी अनजाने सफर पर। साथ में दो पहिया साइकिल जिसे पिता ने मेहनत, मशक्कत और मजदूरी कर अपनी लाड़ली के लिए खरीदा होगा। लेकिन कहते हैं न असफलता अनाथ होती है लेकिन सफलता के बहुत सारे रिश्तेदार होते हैं। 13 वर्षीय ज्योती के साथ भी ऐसा ही हो रहा है। अपने बीमार पिता को साइकिल की पिछली सीट पर बिठा कर दिल्ली से दरभंगा तक की 12 सौ किमी की यात्रा महज सात दिनों में पूरी करने वाली ज्योती की चर्चा चहुंओर है। देश की कौन पूछे सात समंदर पार तक। यहां तक की अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेटी इवांका ट्रंप उसकी उपलब्धी से हतप्रभ हो उसकी तारीफ करते हुए ज्योति की तस्वीर शेयर करते हुए लिखती हैं। हम बल्लियों उछलने लगते हैं। उछलें भी क्यों न? दुनिया के सबसे मजबूत शख्सियत की बेटी द्वारा हमारी बेटी की प्रशंसा, जिसका सपना मात्र इतना है कि किसी भी तरह अपने बीमार पिता को सकुशल घर पहुंचा देना है।
ज्योती की सफलता, समाज व सरकार के विफलता का परिचायक
अपनी कथित उपलब्धियों से अनजान ज्योती ने कहा, “मैं पहले इवांका दीदी को नहीं जानती थी। अब जान गई हूं। उन्होंने मेरा हौसला बढ़ाया। इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। वो बहुत बड़ी शख्सियत हैं। उन्होंने मेरे जैसी छोटी बच्ची की तारीफ की। यह मेरे लिए बहुत मायने रखता है। मैं बहुत खुश हूं।” उसके बाद शुरू हो जाता है बेटी के बहादुरी के कसीदे पढ़ने का सिलसिला। सियासत भला इस मौके को कैसे हाथ से जाने देती। सियासत से लेकर जिला प्रशासन तक और साईकल फेडरेशन तक प्रियंका के बहादुरी का बखान करते हुए उसके हौसले की दाद देते हैं। डॉ. प्रभात दास फाउंडेशन और सशस्त्र सीमा बल का दल ने भी ज्योती को सम्मानित किया। भारतीय साइकिल फेडरेशन उसे ट्रायल के लिए बुलाता है। जन अधिकार पार्टी से ज्योति को 20 हजार रुपये की आर्थिक मदद दी गई है। ज्योति ने जन अधिकार पार्टी के प्रमुख पप्पू यादव जी को धन्यवाद देते हुए कहा, “मैं इन पैसों का उपयोग आगे की पढ़ाई में करना चाहती हूं।” वहीं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने ट्वीट कर कहा, “सरकार से हारकर एक 15 वर्षीय लड़की निकल पड़ी है अपने घायल पिता को लेकर सैकड़ों मील के सफर पर दिल्ली से दरभंगा। आज देश की हर नारी और हम सब उसके साथ हैं। हम उसके साहस का अभिनंदन करते हुए उस तक 1 लाख रु. की मदद पहुंचाएंगे।” संभव है बेटी ज्योती को आगे भी इस तरह के मदद की पेशकेश हो। और यह भी संभव है प्रधानमंत्री अपने मन की बात कार्यक्रम में दरभंगा के इस बेटी के बहादुरी की गाथा सुनायें।
क्या थी परिस्थिति

लेकिन इन सब के बीच हमें उन परिस्थितियों को भी समझना होगा जिनके बीच एक बेटी साईकल पर अपने बीमार पिता को बिठा 1200 किलोमीटर निर्णय लेती है। साथ ही साथ उस मनोवस्था को भी समझना होगा, उन दुष्वारियों को भी समझना होगा जिसके कुचक्र में इस कोरोना महामारी के दौरान लाखों बेटियां और परिवार फंस गये हैं।
पढ़ने लिखने के उम्र में टूट रहा था सपना
ज्योति के परिवार में छह लोग हैं। दो भाई, दो बहन और माता-पिता। पिता मोहन पासवान अकेले गुरुग्राम में रहकर बैट्री रिक्शा चलाते थे। मां गांव के आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों के लिए खाना बनाती हैं। उन्हें हर महीने दो हजार रुपए मिलते हैं। ज्योति बताती हैं, “माता-पिता की कमाई से किसी तरह घर चल रहा था। वो गांव के स्कूल में पढ़ने जाती थी। एक ट्रक ने उसके पिता के रिक्शा को टक्कर मार दी। उनका घुटना टूट गया। ज्योति के पिता गुरुग्राम में ऑटोरिक्शा चलाते थे और उनके दुर्घटना का शिकार होने के बाद वह अपनी मां और जीजाजी के साथ जनवरी में गुरुग्राम गई थी। पिता की देखभाल के लिए वहीं रुकी थी, इसी बीच कोरोना के कारण लॉकडाउन की घोषणा हो गई और ज्योति के पिता का काम ठप पड़ गया। उपर से बीमारी की मार। घर में खाने को पैसे नहीं,घर जाने की सुविधा नहीं। ऐसे में प्रवासी परिवार अनजान शहर में करता तो क्या करता?
500 रुपए में खरीदी साइकिल
ज्योति आगे कहती है, उसने पहले ही साइकिल चलाना सीख रखा था। वो जब अपने पिता के पास थी तो उसके पास साइकिल नहीं थी। लॉकडाउन के चलते जब भूखे मरने की नौबत आई तब जन-धन खाते से 500 रुपए निकाले। इस पैसे से एक पुरानी साइकिल खरीदी। उसी पर पापा को बैठाकर ले आई। इस तरह से उसने बेटी होने का फर्ज निभाया। वह कहती है जब भी ऐसा मौका मिलेगा। माता-पिता की सेवा करती रहूंगी।
दायित्व भूल यशोगान जारी

13 वर्षीय ज्योति के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी मीडिया और सोशल मीडिया में जारी प्रशस्ति पत्रों, कविताओं और प्रशंसाओं की बाढ़ में उस ऐतिहासिक लाचारी, बेबसी और सरकारों की नाकामी की चर्चा कहीं गौण परती जा रही है। गर्व से अधिक यह शर्म का विषय है। कोरोना महामारी के इस दौर में बीमारी से मुकाबले के लिए थपड़ी पीटने, दीया जलाने, फूल बरसाने के जरिए प्रवासियों की पीड़ा कम नहीं हो पाई और न ही सियासत इस दावे के बावजूद कि हम प्रत्येक प्रवासी के दुख—सुख का ख्याल करेंगे, उन्हें सुरक्षित भेजने का इंतजाम करेंगे के बावजूद न सिर्फ ज्योती बल्कि हजारों की संख्या में प्रवासी ये भरोसा न कर पाए और कोई पैदल चल पड़ा तो कोई जो भी साधन सामने मिला उसी से। क्योंकि उसे अपनी और अपनों की जान बचानी थी। भूखमरी, बीमारी से और न जाने किन हालातों में वे यहां तक पहुंचे और यह सिलसिला अभी भी जारी है।
इसलिए इस किशोरी के यशोगान के पीछे उन सवालों से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता जो प्रवासियों के लिहाज से हमारे सामने मुंह बाये खड़े हैं कि आखिर क्यों इस लॉक डाउन में लाखों को पैदल, साइकिल पर, ट्रकों पर, रिक्शे-ठेले पर, ऑटो पर क्यों हजार-डेढ़ हजार किमी की दूरी, मुसीबत भरी यात्रा करनी पड़ती है। उस मनोवस्था को समझिए जिसमें 13 साल की बच्ची को जिसकी पढ़ने और खेलने-कूदने की उम्र थी, उसे क्यों साइकिल पर 12 सौ किमी तक अपने बीमार पिता को ढोना पड़ा? न जाने रास्ते में कितने लोग मिलें होगे। इस लंबी यात्रा में कहीं उसने रूककर पानी पिया होगा? कहीं खाना—खाया होगा? कभी वो थकी होगी, थक कर चूर हुई होगी, कभी वो ठहर गई होगी? कभी उसे मंजिल पर न पहुंच पाने और किसी अनहोनी के घटित होने का अंदेशा भी हुआ होगा? बावजूद इसके न तो हरियाणा की सरकार उसके काम आई, न तो उत्तर प्रदेश की सरकार और न ही बोर्डर क्रास करते बिहार की सरकार। न ही आम लोगों ने, न ही किसी पुलिसकर्मी ने उसे और उसके पिता को घर पहुंचाने का इंतजाम किया। वो पैडल मारती गई और बढ़ती गई अपनी मंजिल की ओर और तब रूकी जब उसका घर आ गया और पिता व परिवार को ये भरोसा हो गया कि अब उन्हें कोई खतरा नहीं है?

आज उसके बहादुरी का गान हो रहा है। सफलता के किस्से सुनाये जा रहे हैं, हौसलों का दाद दिया जा रहा है लेकिन सारी बातें सभ्य समाज के और अच्छे दिन का दावा करने वाले और जनकल्याण कारी राज्य की अवधारणा की बात करने वाले संविधान और संविधान के प्रावधानों के मुताबिक सियासत करने का दावा करने वाले राजनीतिक दलों और सरकारों के मुंह पर तमाचा सरीखा है जो अपने नागरिकों के लिए ऐसी परिस्थिति पैदा करता है।
