बिना गाय अधूरा है भारत

0
410

आरके सिन्हा

  • जो लोग गोमांस खाने की वकालत कर रहे हैं वे भारत की मूलआत्मा को समझने के लिए तैयार नहीं
  • निर्विवाद रूप से हमारी संस्कृति, और सभ्यता का आधार गंगा, गऊ और गायत्री रहे हैं। गाय को कामधेनु तथा सर्व देवमयी गोमाता माना गया है, क्योंकि वह हमें दूध, दही, घी, गोबर-गोमूत्र के रूप में पंचगव्य प्रदान करती है। वेदों में कण-कण के प्रति कृतज्ञता के भाव की अभिव्यक्ति है।

देश को स्वतंत्र हुए 70 साल होने जा रहे हैं, लेकिन अभी तक गोहत्या पर प्रभावी रोक नहीं लग सकी है। यह तब है जब संविधान में गोहत्या पर प्रतिबंध राज्य के नीति निर्देशक तत्वों में शामिल है। ये नीति निर्देशक तत्व, राज्य और केंद्र सरकारों को नीति निर्धारण में पथप्रदर्शन के लिए हैं। संविधान का अनुच्छेद 48 कहता है राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं की नस्लों में सुधार के साथ-साथ उनके वध पर रोक लगाने के लिए कदम उठाएगा। केरल के कन्नूर में कांग्रेस के कुछ सिरफिरे कार्यकर्ताओं ने जिस बेशर्मी और निर्ममता से सरेआम बछड़े को काटा और उसके मांस को वितरित किया वह न केवल अमानवीय, बल्कि संविधान की मूल भावना के विरुद्ध था। आज जिस प्रकार गोवंश की तस्करी और हत्या हो रही है वह किसी से छिपा नहीं, लेकिन लंबे समय से इस सवाल पर मौन छाया है। इस मौन के बीच कुछ ताकतें ऐसे सवाल करती रहती हैं कि किसी के खानपान के हक को छीना नहीं जा सकता। यह बिल्कुल ठीक बात है, पर गोमांस खाने की वकालत करने वाले हो सके तो संविधान पढ़ें। सारी स्थितियां स्पष्ट हो जाएंगी।

महात्मा गांधी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ में गोरक्षा के सवाल पर कहा था, मैं खुद गाय को पूजता हूं। गाय भारत की रक्षा करने वाली है, क्योंकि उसकी संतान पर हिंदुस्तान का, जो खेती प्रधान देश है, आधार टिका है। उन्होंने यह भी कहा था कि गाय उपयोगी जानवर है, इस बात को मुसलमान भी कबूल करेंगे। गांधी जी यह मानते थे कि गाय की रक्षा के लिए मनुष्य की हत्या करना हिंदू धर्म और अहिंसा धर्म से दूर होना है। आज अगर बापू होते तो वे गोरक्षा की आड़ में लफंगई करने वालों को माफ नहीं करते। जिस धर्म ने गाय की पूजा का प्रवर्तन किया वह मनुष्य के अमानवीय बहिष्कार का समर्थन कैसे कर सकता है? देश के पूर्वोतर के कुछ राज्यों और दक्षिण भारत के कुछ छोटे समूह गाय के मांस का सेवन करते हैं। भारत जैसे बेहद विविधता से भरे देश में यह मुमकिन है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि सब हिंदू गाय का मांस खाते हैं। जो लोग गोमांस खाने की वकालत कर रहे हैं वे भारत की मूल आत्मा को समझने के लिए तैयार नहीं। यह समझ से परे है कि आइआइटी और कुछ अन्य शिक्षण संस्थानों में गोमांस के फेस्टिवल कैसे आयोजित हो जाते हैं? आइआइटी मद्रास परिसर में बीते दिनों ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन हुआ। इसका विरोध कर रहे कुछ छात्रों ने कथित रूप से एक पीएचडी छात्र को पीट दिया। आखिर इस शिक्षण संस्थान में बीफ फेस्टिवल की अनुमति कैसे मिल गई?

निर्विवाद रूप से हमारी संस्कृति, और सभ्यता का आधार गंगा, गऊ और गायत्री रहे हैं। गाय को कामधेनु तथा सर्व देवमयी गोमाता माना गया है, क्योंकि वह हमें दूध, दही, घी, गोबर-गोमूत्र के रूप में पंचगव्य प्रदान करती है। वेदों में कण-कण के प्रति कृतज्ञता के भाव की अभिव्यक्ति है। भारत पुरातन काल से सूर्य-चंद्र, ग्रह नक्षत्र, पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधों को पूज्य मानता रहा है। प्रकृति का कण-कण हमें देता ही है। इस प्राकृतिक संरचना में गाय को भारत ने विशेष दर्जा दिया। यह कहना भी गलत है कि आज ताकतवर उच्च जातियां ही बीफ के खिलाफ हैं, लेकिन दलित और जनजातियां तो हमेशा से बीफ खाती रही हैं। मैं 50 सालों से सार्वजनिक जीवन में हूं और देश का चप्पा-चप्पा घूम चुका हूं। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अधिकतर हिंदू बीफ नहीं खाते। जब मदनमोहन मालवीय, भारतीय गोरक्षा प्रचारक मंडल, काशी के सभापति थे तब उन्होंने कहा था, ‘‘मैं मानता हूं कि गऊ के बराबर मनुष्य का उपकार करने वाला कोई दूसरा जीव है ही नहीं। गाय घास खाकर और जल पीकर मनुष्य को दूध से तृप्त करती है। उसके बछड़ों के द्वारा हमारी खेती होती है। वह कपास उपजाकर हमारे पहनने के लिए वस्त्र देती है और मरने के बाद भी अपनी हड्डी और चर्म से मनुष्य की सेवा करती है। इसीलिए ऋषि लोग सृष्टि के आरंभ से गाय की देवता के समान पूजा और सत्कार करते आए हैं। भारत के करोड़ों मनुष्य गौ को पूजते हैं और गोमाता कहते हैं।’’ मुगल काल में बादशाह अकबर के दरबार में जब एक गोकशी करने वाले को पेश किया गया तो उन्होंने उसे सरेआम सौ कोड़े मारने का हुक्म दिया था ताकि कोई भविष्य में गोकशी की बात सोच भी न सके। अकबर ने कहा था, ‘‘मैं गाय को अपनी मां के बराबर मानता हूं। जब मेरी मां का दूध सुख गया था तब मैं गाय के दूध पर ही पला। गाय मेरी मां है। इसकी हत्या मेरे लिए बर्दाश्त से बाहर है।’’ ध्यान रहे कि हाल में जमीयत उलेमा हिंद के प्रमुख ने भी गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की मांग की है। ऐसी ही मांग अन्य लोग भी कर रहे हैं।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में गोवंश की रक्षा अति आवश्यक है। हमारे अधिकतर किसानों के पास औसतन मात्र दो एकड़ या उससे भी कम की जोत के खेत हैं। ये छोटे किसान ट्रैक्टर नहीं खरीद सकते। उन्हें तो गाय और बैल ही चाहिए। भारत और गाय में संबंध अलग तरह का है। जो लोग गाय पालते हैं उनके लिए वह परिवार के सदस्य का दर्जा ले लेती है। भारत सदियों से गाय के प्रति कृतज्ञता का भाव रखता है। यह दुखद है कि बीते कुछ समय से गाय को लेकर खेमेबाजी होने लगी है। इस पर विराम लगे और गऊ को वह स्थान मिले जिसकी वह हकदार है।(लेखक राज्यसभा के सदस्य हैं..दैनिक जागरण से साभार)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here