के एन गोविंदाचार्य
चंपारन सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के अंतर्गत चंपारन जिले में कुछ दिन घूमने, समझने का अवसर प्राप्त हुआ। कई स्थानों पर तो ऐसा लगा कि काल 100 साल पहले ठहर गया है|
खेती का तरीका बदल गया है, गोधन नष्ट प्राय है, कारीगर पलायन कर चुके है, चीनी मिलें बंद है या बंद हो रही है | मिलो से जुड़े किसान, मजदूर आगे का रास्ता नहीं खोज पा रहे है| मोतिहारी चीनी मिल के दो मजदूर नेताओं ने आत्मदाह कर लिया, मर भी गए। फिर भी विडम्बना यह है कि एक तरफ चंपारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में सरकारों द्वारा जश्न मनाया जा रहा था और उन्हीं दिनों चीनी मिल के दो मजदूर नेताओं, नरेश श्रीवास्तव और सूरज बैठा ने आत्मदाह कर लिया।
शासन-प्रशासन की मजदूरों और किसानों से संवेदनहीनता अपने चरम पर थी। राष्ट्रपति से लेकर थाने तक आत्मदाह की चेतावनी मजदूर नेताओं ने औपचारिक और अनौपचारिक नीति से पहुंचा दी थी| मिल मजदूरों से मिलने पर एक स्थानीय निवासी ने बताया की आत्मदाह के दिन भी थाने को खबर कर दी गई थी| थाने के ही संभवतः किसी कर्मचारी ने फोन पर कहा कि धुआं उठेगा तो हम लोग आ जायेंगे|
शासन-प्रशासन के किसी भी आदमी को अंदाजा नहीं था कि वाकई आत्मदाह हो जाएगा | वे इसे बन्दर-घुडकी समझ रहे थे। मगर इस बार ऐसा न था| उन दोनों मजदूर नेताओं के घर देखने बाद समझ में आया कि वे नेता बिकाऊ नहीं थे| सूरज बैठा का घर तो मड़ई था, खपरैल भी नही था, जबकि दूसरे नेता नरेश श्रीवास्तव के घर के छत के आधे हिस्से में खपरैल भी नहीं था और नरेश श्रीवास्तव के माता जी की कमर की हड्डी टूटने के कारण बिस्तर पर पड़ी थी |
स्थानीय लोगों ने बताया की मिल मालिकों की इच्छा ही नहीं है कि चीनी मिल चले| वे मिल की जमीन में ज्यादा रुचि रखते है| सत्याग्रह शताब्दी समारोह के बारे में केन्द्रीय सरकार से जुड़े हुए लोगो की शिकायत थी कि प्रदेश की सरकार ने अपने आयोजित कार्यक्रमों में अपने विपक्ष के लोगों को कोई स्थान नहीं दिया है| गाँधी जी के नाम पर दलों के लोगों के बीच अस्वस्थ भौडी प्रतियोगिता हो रही थी| सत्तारूढ़ और विपक्षी दोनों दलो के अपने-अपने गाँधी थे |
गांधी जी को भुनाने के लिए इस कोशिश की सर्वत्र निंदा हुई | श्रमिक नेताओं के आत्मदाह ने फिर एक बार नेता,अफसर, थैलीशाह के अघोषित सांठ-गांठ को बेनकाब किया हैं | 100 साल पहले तो निलहे अंग्रेज का बोलबाला था | मजदूर, किसान पिस रहे थे| पिछले 100 साल में 30 साल गोरे अंग्रेजों का शासन था | अंग्रेजों के जाने के बाद सरकारे तो बदली हैं मगर सरकारों का चरित्र नही बदला | आजादी के बाद सरकार चलाने में अंग्रेजों के समय की माई-बाप संस्कृति आज भी कलेक्टर, एस.पी, थानेदार चला रहे हैं और दहशत फैला रहे हैं | दहशत दूर करना, आत्मदाह की घटना के कारण मीमांसा, समुचित जाँच श्रमिकों को राहत दिलाने की कोशिश तत्का लिक रूप से जरूरी है।
बलिदान हुए नरेश श्रीवास्तव और सूरज बैठा के परिवारों को राहत एवं रोजगार की व्यवस्था सरीखे पहलू वहां जाने पर सामने आये |
सूरज बैठा और नरेश श्रीवास्तव के घर के हालात, उनकी विपन्नता, श्रमिक आन्दोलन के प्रति उनकी निष्ठा का बयान करते हैं |यह तो सिद्ध हुआ ही कि वे बिकाऊ नही थे। आत्मदाह के कारणों की जाँच सी.बी.आई से हो यही उचित रहेगा|
बंधुआ मुक्ति मोर्चा के स्वामी अग्निवेश, बिहार सर्वोदय मंडल के श्री मनोहर मानव एवं पुलिस अधिकारी रहे हुए सामाजिक कार्यकर्त्ता पी.के.सिदार्थ जन सुनवाई के लिए मोतिहारी मंह कुछ दिन रहे। उनमे से पी.के.सिदार्थ 400 मिल मजदूरों की आजीविका के प्रति गंभीरता से सक्रिय हैं | स्वामी अग्निवेश, मनोहर मानव और उनके साथी चीनी मिल के मजदुर प्रतिनिधियों एवं श्रीमती सूरज बैठा, श्रीमती नरेश श्रीवास्तव के परिवारों को राहत दिलाने के मांगो के साथ जंतर-मंतर पर धरने पर बैठे हैं |
चंपारण जिले में घूमते हुए ध्यान में आया कि कुछ दीर्घकालिक परिपेक्ष्य में काम होने की जरुरत हैं| आजीविका के लिए हुनर, नारी सहभागिता, स्वावलंबन, सामाजिक एकता, सर्वजन सुलभ सस्ता शिक्षा, स्वास्थ्य एवं न्याय की व्यवस्था आदि काम के कुछ आयाम गिनाये जा सकते हैं |
चंपारण क्षेत्र का रिसोर्स एटलस बनना हैं | पदमश्री पुरस्कार प्राप्त कृषि विशेषज्ञ सुभाष पालेकर के मार्गदर्शन में शून्य लागत खेती के प्रशिक्षण के लिए किसानों का शिविर लगे इसकी व्यवस्था जरूरी हैं |
बुनियादी विद्यालयों की विषय वस्तु में समयानुकूल परिमार्जन होना हैं | उसी प्रकार कम पूंजी, कम लागत की चिकित्सा व्यवस्था खड़ी होनी चाहिए। ये वहाँ की जरुरत है जिसमे प्राकृतिक चिकित्सा घरेलु चिकित्सा एवं आयुर्वेद की प्रमुख भूमिका हो सकती हैं |
सस्ता, सही, सर्वसुलभ न्याय व्यवस्था के लिए तो सत्याग्रह का शास्त्र ही उपाय हैं | इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में सामाजिक कार्यकर्त्ता अपनी क्षमता के अनुसार चंपारण जिले में समय शक्ति लगाये एवं संवाद, सहमति और सहकार को अपनाकर परस्पर पूरक बनें ये वक्त की मांग हैं |मैं भी महीने में एक बार कुछ दिन चंपारण बिहार के क्षेत्र में लगाने की कोशिश करूँगा |
