- बुदेलखंड के कुछ गांवों में जल-पंचायतों व जल-सहेलियों से स्थानीय भागीदारी बढ़ाने में काफी सफलता मिली है।
- जल संरक्षण और संग्रहण के मामले में परंपरागत ज्ञान काफी समृद्ध है। इसका लाभ उठाने की जरूरत है।
जिस तरह हमारे देश के अनेक गांवों और बस्तियों से जल संकट के समाचार आ रहे हैं, उसी तरह विश्व स्तर पर भी इससे जुड़े बहुत गंभीर समाचार मिल रहे हैं। जब से तापमान के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं या दर्ज किए जा रहे हैं, तब से अब तक पिछले 17 वर्षो में से 16 साल सबसे गरम दर्ज किए गए हैं। इसके कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे चाहे अल्पकाल में नदियों में अधिक पानी आए, पर लंबी अवधि में इससे कई नदियों का पानी बहुत कम हो जाएगा। इससे सर्वाधित प्रभावित होने वाले देशों में भारत, पाकिस्तान, चीन और अफगानिस्तान भी हैं।दुनिया के अनेक देश शहरीकरण और औद्योगीकरण के ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसमें ग्रामीण समुदायों व कमजोर वर्गो के लिए जल संकट तेजी से बढ़ सकता है। विभिन्न निर्माण कार्यो के जरिये जल की बड़ी मात्र को इस तरह मोड़ा जा सकता है, जिससे अपेक्षाकृत कमजोर और असंगठित समूहों के जल-संसाधन या जल-आधारित आजीविकाएं तेजी से कम हो जाएं। इसके कारण कई स्तरों पर असंतोष बढ़ सकता है।
यदि इस तरह के बदलाव विभिन्न देशों की सीमाओं के आर-पार होते हैं, तो इससे विभिन्न देशों में टकराव व यहां तक कि युद्ध की आशंका बढ़ सकती है। इस लिहाज से पश्चिम एशिया को सबसे ज्यादा संवेदनशील माना जा रहा है, इसके साथ ही दक्षिण एशिया के कुछ इलाके भी संवेदनशील हैं। हम इस तथ्य को अनदेखा नहीं कर सकते कि जिस समय जल-संकट अपने चरम पर होता है, उस वक्त लोगों की भावनाओं को नियंत्रित करना कठिन हो जाता है, फिर चाहे वे एक ही देश के लोग क्यों न हों। इसलिए बातचीत व समझौते से कोई संतोषजनक राह निकालने की तैयारी बहुत पहले से शुरू कर देनी चाहिए।जितना पानी जीवन के लिए जरूरी है, उसकी उपलब्धता सभी के वास्ते सुनिश्चित करने को उच्च प्राथमिकता देने की जरूरत है। इसके लिए सावधानी से नियोजन करना होगा। विश्व के अनेक देशों में पानी के निजीकरण की बहुत सी योजनाएं तेजी से सामने आ रही हैं। इस स्थिति में इस बात की ओर ध्यान देना बहुत जरूरी है कि जो समाज के सबसे कमजोर तबके के लोग हैं, वे जीवन की इस सबसे बुनियादी जरूरत यानी पानी के अधिकार के मामले में पीछे न धकेले जाएं।प्राय: जल-संकट के समाधान में पशु-पक्षियों की जरूरत पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता।
मगर जल-संकट के संदर्भ में कृषि व डेयरी क्षेत्र से जुड़े मवेशियों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों की जरूरत पर भी ध्यान देना जरूरी है। कई बार देखा गया है कि वनों में जल स्नेतों के सूखने के कारण पानी की तलाश में जंगली पशु आस-पास के गांवों में घुसकर उत्पात मचाने लगते हैं। अत: जंगली पशु-पक्षियों व आस-पास की आबादी के नजरिये से भी वन क्षेत्र में जल संरक्षण पर ध्यान देना होगा।हमारे देश में जो क्षेत्र जल-संकट की दृष्टि से खासे संवेदनशील हैं- जैसे बुंदेलखंड, तमिलनाडु-कर्नाटक सीमा और राजस्थान के कुछ क्षेत्र- उनके लिए विशेष योजना जन-भागीदारी से बनानी चाहिए, जिनमें स्थानीय परंपरागत ज्ञान का उचित उपयोग किया जा सके। ऐसा अनेक उदाहरणों से स्पष्ट हुआ है कि जल संरक्षण व संग्रहण के मामले में अधिकांश क्षेत्रों का परंपरागत ज्ञान काफी समृद्ध है। बुदेलखंड के कुछ गांवों में हाल के वर्षो में जल-पंचायतों के गठन व जल-सहेलियों के चयन से स्थानीय भागीदारी बढ़ाने में सफलता मिली है। इस तरह के प्रयासों को और बढ़ावा मिलना चाहिए। परंपरागत जल-स्नेतों, विशेषकर तालाबों पर दबंगों के अतिक्रमण व कब्जे को रोकना चाहिए। इस बारे में वैसे तो अदालत के निर्देश व शासनादेश जारी होते रहे हैं, फिर भी कई बड़े तालाबों के बारे में पता चला है कि अतिक्रमण के कारण उनके जलग्रहण क्षेत्र को बहुत क्षति पहुंच रही है।पेयजल को उच्च प्राथमिकता देते हुए इसके लिए पर्याप्त संसाधन की व्यवस्था बजट में की जानी चाहिए। कमजोर वर्ग की जरूरतें उपेक्षित न हों, इसके लिए जल-संरक्षण कार्यक्रमों को समावेशी बनाना होगा। दूर-दराज के गांवों में परिवार के लिए पीने के पानी की व्यवस्था में महिलाएं सबसे अधिक पसीना बहाती हैं। इसलिए जल कार्यक्रमों में उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।(ये लेखक के अपने विचार हैं..हिन्दुस्तान से साभार)
