बनारस:देश में गोधन को लेकर अलग—अलग तरह के विमर्श चल रहे हैं। कहीं गो मांस को लेकर सियासत हो रही है तो कहीं अदालत द्वारा कहा जा रहा है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। हालांकि देश के बहुसंख्यक आबादी हिंदूओं में धार्मिक लगाव की वजह से गाय को माता का दर्जा दिया गया हैं। इन सब बहस के बीच एक हकीकत यह भी है कि देश में गायों की संख्या तेजी से घट रही है,हालांकि देश में दुग्ध उत्पादन बढ़ा है।
क्या कहा अदालत ने
राजस्थान उच्च न्यायालय में हिंगोनिया गोशाले मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायधीध ने केंद्र को सलाह देते हुए कहा कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए और गोहत्या करने वालों के लिए सजा और सख्त की जाए। कोर्ट ने सलाह दी कि ऐसे अपराधियों को उम्र कैद की सजा दी जाए। फिलहाल यह सजा तीन साल की है। इतना ही नहीं अदालत ने वन विभाग को यह भी आदेश दिया कि वन विभाग को हर साल गोशाला में 5000 पौधे लगाने का आदेश दिया गया। जज महेश चंद्र शर्मा ने वन विभाग को निर्देश देते हुए कहा कि हर साल गोशाला में 5000 पौधे लगाए जाएं।
एक रिपोर्ट के मुताबिक एक तरफ देश में दुग्ध उत्पादन बढ़ा है जबकि दूसरी तरफ साल दर साल राष्ट्रीय स्तर पर गायों की संख्या घट रही है। इसके पीछे एक ओर जहां दुग्ध के मूल्य की तुलना में चारे के मूल्य में बढ़ोतरी हैं। पशु चारे की भारी कमी से दुग्ध उत्पादन की लागत बहुत बढ़ी है। इसके मुकाबले दुग्ध के मूल्य में वृद्धि नहीं हो रही है। दूध का मूल्य उसके वसा के आधार पर तय होता है। लिहाजा पशु पालक गाय पालने से मुंह मोड़ने लगे हैं।
क्या कहती है पशु गणना रिपोर्ट
पशु गणना की रिपोर्ट की मानें तो घटती संख्या के कारणों में वध पाबंदी भी है। राष्ट्रीय स्तर पर पशुओं की संख्या में जहां गाय तेजी से घटीं है, वहीं उसके मुकाबले भैंस की संख्या में तेज गति से वृद्धि दर्ज की जा रही है। इन आंकड़ों के कई मायने निकाले जा रहे हैं। देश में पशु चारे की जबर्दस्त कमी भी इसकी एक बड़ी वजह है। सरकारी आंकड़े के हिसाब से राष्ट्रीय स्तर पर चारे की कुल जरूरत के 62 फीसद चारे की कमी है। चारे की लागत बढ़ने से पशु पालक केवल दुधारु अथवा जरूरत वाले पशुओं के लिए ही चारे का बंदोबस्त कर पाते हैं। अनुत्पादक गो पशुओं के लिए बड़ी मुश्किल होती है। अन्य प्रजाति के पशुओं के लिए यह मुश्किल नहीं है।

मशीनीकरण के कारण बैलों का उपयोग घटा
बैलों का उपयोग न के बराबर रह गया है। खेती का ज्यादातर कार्य ट्रैक्टरों व अन्य मशीनों के उपयोग के चलते बैलों की उपयोगिता बहुत कम हो गई है। पशुधन विकास के लिए चारे की किल्लत गंभीर चुनौती है। चारे की कमी के चलते गुणवत्ता वाले मवेशियों को पालना संभव नहीं रह गया है। दुग्ध उत्पादन पर आने वाली लागत का 70 फीसद केवल चारे पर खर्च होता है। खाद्यान्न की जरूरतों के मद्देनजर पशुचारे की पैदावार को बढ़ाना संभव नहीं हो पा रहा है। इसके विपरीत देश में चारागाह सिमटते जा रहे हैं।
भैसों की संख्या बढ़ी
दुधारु पशुओं में गाय के मुकाबले भैंसों की आबादी में तेजी से वृद्धि हो रही है। भैंसें जहां ज्यादा दूध देती हैं, वहीं उनके दूध में वसा (फैट) का स्तर ऊंचा होता है, जिसकी बाजार में कीमत अच्छी मिलती है। भैंसे या कटड़े की मांस बाजार में अच्छी कीमत मिल जाती है। रिपोर्ट के अनुसार दुहाई के बाद सूख चुकी गायों को पालना बहुत महंगा साबित होने की वजह से किसानों ने गाय पालन से मुंह मोड़ना शुरू कर दिया है। नतीजतन, आने वाले समय में गायें विलुप्तप्राय हो सकती हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े
पशुगणना की रिपोर्ट
- साल दर साल घट रही गायों की संख्या
- मुनाफा न होने से किसान मोड़ रहे मुंह
- वध पर पाबंदी भी बना एक कारण
- 2003-08 के दौरान गोपशुओं की विकास दर में 5 और 2008-13 के बीच दो फीसद की गिरावट दर्ज की गई
- इसी तरह गायों की आबादी एक फीसद की दर से नीचे आ रही है
- भैंस की संख्या में एक से डेढ़ फीसद की वृद्धि दर्ज की गई4>>
पशु चारे में कमी
- हरे चारे की कुल कमी 62 फीसद
- सूखे चारे में 22 फीसद की कमी
- कांसेनट्रेट फीड में 64 फीसद कमी
सभी आंकड़े: इंडियन ग्रासलैंड एंड फॉडर रिसर्च इंस्टीट्यूट और पशुधन विकास विभाग के अखिल भारतीय पशुगणना। (इनपुट:दैनिक जागरण से साभार)


