दाना पानी से इंकार बीच.. अवार्ड वापसी की सियासत हुई वापसी.. सवाल…कितनी कारगर होगी बातचीत

पंचायत खबर टोली

नयी दिल्ली:आप कहेंगे कि अवार्ड वापसी का किसानों से क्या काम? लेकिन एक बार फिर से ये प्रक्रिया शुरू हुई है। किसान आंदोलन के पक्ष में शिरोमणी अकाली दल ने कृषि कानूनों के खिलाफ अपना पद्म विभूषण वापस कर दिया है। ये सिलसिला यहीं नहीं रूका। कांग्रेस नेता सुखदेव सिंह ढ़िढ़सा और परगट सिंह ने भी अपने अवार्ड वापसी की घोषणा की है। हो सकता है कि आगे ये सिलसिला और लंबा चले। इस बीच विज्ञान भवन में सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बीच लगभग चार घंटे की बैठक हो चुकी है। किसान प्रतिनिधियों ने अपनी बातें रखी हैं लेकिन पिछले बैठक में चाय पीने से इंकार कर जलेबी और लंगर का निमंत्रण देने वाले किसान ने आज सरकार के टी ब्रेक में हाई टी से और लंच ब्रेक में लंच लेने से इंकार कर दिया। किसानों ने सरकार का खाना खाने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा है कि जब तक सरकार से कृषि कानूनों पर कोई समझौता नहीं होता, वे सरकार की दी हुई किसी चीज का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

विज्ञान भवन में गुरूद्वारा का खाना खाते किसान

किसान नेताओं ने अपने भोजन का प्रबंध स्वयं किया और उनके लिए एक नजदीकी गुरुद्वारे से भोजन लाया गया। इसके लिए शाम तीन बजे एक एंबुलेंस के जरिये खाने-पीने का सभी सामान वार्ता स्थल विज्ञान भवन तक लाया गया। किसान नेता ने बताया कि यह केवल एक संकेत है कि अगर सरकार हमारी मांगे नहीं मानती है तो उसका दिया हुआ कुछ भी हमें स्वीकार नहीं होगा। सरकार को हर हाल में हमारी मांगें स्वीकार करनी पड़ेगी क्योंकि ये केवल हमारा विषय नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के किसानों और उनकी आने वाली पीढ़ियों का प्रश्न है।

साफ है उन्होंने लंच तो लिया लेकिन सरकार का नहीं बगल में स्थित गुरूद्वारे का। पंगत बैठी और किसानों ने भोजन के बाद फिर से बैठक में शामिल होना स्वीकार किया। इतना ही नहीं बिजली से संबंधित बातें भी किसानों ने सरकार के सामने रखी। साथ ही साथ पराली से संबंधित कानून में भी बदलाव करने की बात भी किसानों ने दुहराई।


प्रकाश सिंह बादल ने किया अवार्ड वापसी
प्रकाश सिंह बादल ने कहा है कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसानों को अपने हक की मांग के लिए सरकार के दरवाजे पर आकर बैठना पड़ रहा है। जो केंद्र सरकार किसानों का सम्मान नहीं कर सकती है उससे मिला सम्मान रखने का कोई औचित्य नहीं है। यह सम्मान भी मुझे किसानों के लिए काम करने से मिला है। उन्होंने अपने पत्र में यह भी लिखा है कि मैं इतना गरीब हूं कि किसानों के आंदोलन में त्याग करने के लिए मेरे पास इस अवार्ड के सिवा कुछ नहीं है। वहीं अकाली दल के पूर्व नेता सुखदेव सिंह ढींढसा ने भी अपना पद्म भूषण सम्मान लौटाने का ऐलान किया है। किसान आंदोलन के समर्थन में उन्होंने कहा है कि वह अपना पद्म भूषण सम्मान राष्ट्रपति के पास भेज रहे हैं। किसान आंदोलन में शामिल किसान संगठनों ने एक दिन पहले ऐलान किया था कि अगर सरकार हमारी बात नहीं मानेगी तो सभी खिलाड़ी और सैनिक अपना सम्मान वापस लौटा देंगे। इसके बाद ही प्रकाश सिंह बादल और सुखदेव ढींढसा के सम्मान लौटाने की खबर सामने आई है।

इस बीच गैर राजनीतिक कहे जाने वाले किसान आंदोलन को चहुओर से विपक्षी राजनीतिक दलों का समर्थन मिल रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हों या महाराष्ट्र की शिवसेना सरकार को फंसा देख अपने बयानों से किसानों को भड़काने और खुद को उनके पक्ष में खड़ा दिखाने का कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
बैठक जारी है। दोनों पक्ष अपनी मांगो को मनवाने के लिए कवायद रहे हैं। बता दें कि प्रदर्शनकारी किसान राष्ट्रीय राजधानी से लगी सीमाओं पर डटे हैं और सरकार से नये कृषि कानून वापस लेने की मांग कर रहे हैं। उनमें से ज्यादातर किसान पंजाब से हैं। हालांकि इसमें पूरे देश के किसान शामिल हैं। इससे पहले किसानों ने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि तीनों किसान कानूनों को रद्द नहीं किया गया तो वे दिल्‍ली के रास्‍ते ब्‍लॉक कर देंगे। हालांकि दिल्ली के सभी बोर्डर पर किसानों का जमावड़ा बढ़ता ही जा रहा है। किसानों के मांग के समर्थन में नारे लग रहे हैं लेकिन निगाहें विज्ञान भवन की तरफ हैं।

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