कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रम्यै त्वा पोषाय त्वा

कमलेश कुमार सिंह
पटना: मौजूदा दौर में गांव और किसानों के हालात। इसके लिए दो बातें। पहली बात आदी काल की। उसके बाद, बात वर्तमान परिदृश्य की।
पहले बात, पुरानी।
आदी काल में भारत में यह मान्यता रही है कि गांव एक स्वावलंबी और आत्मनिर्भर इकाई के रूप में विकसित हों। प्रारंभ से ही भारतीय ग्रामीण जीवन में कृषि को सर्वोत्कृष्ट कार्य के रूप में मान्यता प्रदान की जाती रही है। भारतीय चिंतन में नागरिकों को कृषि करने के निर्देश देते हुए कहा गया है- ‘अक्षेर्मा दीव्या कृषिमित्कृषस्व।’ राज्य द्वारा नहरों का निर्माण करने और कृषि हेतु आवश्यक प्रशिक्षण की व्यवस्था करने का उल्लेख भी वेदों में मिलता है। सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के अनुसार चाक्षुष मनु के प्रपौत्र राजा वेन के पुत्र पृथु आदि कृषक थे, जिनके नाम पर धरती का नाम पृथ्वी पड़ा। ऋग्वेद में राजा का सबसे प्रमुख कर्तव्य कृषि की उन्नति को बताया गया है- ‘कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रम्यै त्वा पोषाय त्वा।’ इसी प्रकार अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त में कहा गया है, ’माता भूमि पुत्रोयं पृथिव्याः’ अर्थात पृथ्वी माता है और मैं पुत्र। इस वेद के अनुसार कृषि कार्य गौरवमयी है।

वेदों में पंचायत का भी उल्लेख मिलता है। वैदिक काल में राज के तीन प्रमुख अधिकारी हुआ करते थे- पुरोहित, सेनापति और ग्रामीण। ग्रामीण गांव का अधिपति और पंचायतों का प्रमुख होता था। महाभारत में कहा गया है कि कृषक और गणित राष्ट्र को समृद्ध बनाते हैं। अतः राजा को इनके प्रति विशेष दृष्टि रखनी चाहिए। स्पष्ट है कि भारतीय सामाजिक जीवन में गांव सर्वोच्च की इकाई रहे हैं।
अबकी बात-
यूपीए-द्वितीय के दौरान एक बार लोकसभा में बोलते हुए सांसद हुकुमदेव नारायण यादव- योजना केवल शहरों के किनारे विकास के लिए बनाई गई और जितने शहर बसाए गए हैं, वहां कभी गांव रहा होगा। वहां कभी किसान रहे होंगे। वहां खेती करने वाले लोग थे। उनकी जमीन छीन ली गई और उसमें बड़ी-बड़ी कल कारखने बसा दी गई। उनके बच्चों को उजाड़ कर भगा दिया गया। वह भीख मंगे बन गए। गांव में चले गए। निर्धन निर्बल बन गए। लेकिन बड़ी-बड़ी कॉलोनियां बनाई गई। बड़े बड़े मकान बनाए गए। बड़े-बड़े अफसरों को गगनचुंबी अट्टालिकाओं में सजे सजाए मकान में रखवाया गयार्। इंट की दिवारें बनी। उत्तराखंड, हिमाचल से लकड़ी काट काट कर उन दीवारों पर लकड़ी लगाई गई। फर्स के ऊपर लकड़ी लगाई गई। छत के नीचे लगाए गए। उस गांव में बसने वाले लोगों के पास खंभे, छप्पर के लिए लकड़ी नहीं है। चूल्हे में जलाने के लिए लकड़ी नहीं है। यह ईंट के मकान को लकड़ियों से सजाया गया और वही लोग पर्यावरण की बात करते हैं। जो पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं।

जो हिंदुस्तान का मरुस्थली है, रेगिस्तान का इलाका है, बंजर जमीन है, कंकरीली जमीन है जहां कुछ फायदा नहीं होता ऐसी गैर उपजाऊ जमीन में जहां विकास नहीं किया। क्या आप उन इलाकों में औद्योगिकीकरण नहीं कर सकते? इसी संसद में बोलते हुए समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने इस प्रश्न को छेड़ा था। उन्होंने कहा था जो अविकसित इलाका है, उस इलाके में उद्योग खड़ा कीजिए। जब यह लगेगा तो वहां बिजली जाएगी। मकान बनेंगे। अफसर रहेंगे। दुकानें खुलेगी। चाय की दुकान। पान की दुकान। उद्योग खोलेंगे तो बड़े-बड़े उद्योगपति उसमें मौज करेंगे। अफसर मौज करेंगे। लेकिन चाय की दुकान। पान की दुकान। खुलेंगे तो दुकान छोटे से ढाबे चलाकर हमारे बच्चे और बहू बेटियों को रोजगार मिलेगा। अगर वहां तक सड़के जाएंगी तो उस इलाके का विकास होगा। वहां उद्योग किसलिए नहीं बनेगा? क्योंकि वह इलाका विकसित नहीं है। मैं कहता हूं कि वह इलाका इसलिए विकसित नहीं है, क्योंकि वहां उद्योग व्यापार व्यवसाय रोजगार नहीं है। अच्छे स्कूल नहीं बना सकते। नहीं बनाएंगे किसलिए नहीं बनाएंगे? क्योंकि वहां राजनीतिक दबाव वाले लोग नहीं है। वोकल लोग नहीं हैं। इसलिए मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि जो अविकसित इलाका है उसे विकसित करने के लिए योजना बनाएं। क्या कभी योजना आयोग जो अब नीति आयोग हो गया है… में किसी सांसद से पूछा जाता है किसी विधायक से पूछा जाता है किसी जनप्रतिनिधि से पूछा जाता है। योजना आयोग में बड़े-बड़े लोग उसके सदस्य बनते हैं। इसलिए उनकी दृष्टि और मेरी दृष्टि में फर्क है। उनकी दृष्टि ग्रामोन्मुखी, गरीबोन्मुखी, किसानोन्मुखी, निर्धन-निर्बल के प्रतिन्मुखी नहीं है। इसलिए कबीर दास ने कहा है कि जो दर्शन करना चाहिए तो दर्पण मांजते रहिए, दर्पण में लागा काई, तो दरस कहां से पाई। यह जो हमारी योजना बनाने वाले हैं उनके हृदय में यह नहीं है। उनके हृदय में गरीब की तस्वीर नहीं है। मजदूर की तस्वीर नहीं है। इसलिए भारत का यह इलाका पिछड़ा रह गया। भारत का समाज पिछड़ा रह गया।

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