भारत डोगरा
ग्राम स्वराज के बारे में महात्मा गांधी के चिंतन का केंद्र-बिंदु यह था कि सबसे निर्धन व्यक्ति के जीवन को कैसे खुशहाल बनाया जाए। गांधी के गांव की परिकल्पना के पीछे जमीनी बदलाव के प्रति उनकी चेतना थी। लेकिन आज गांधी के चिंतन को आगे बढ़ाने के लिए किसी भी स्तर पर कोई प्रयास होता हुआ नहीं दिखता। इन दिनों किसान चर्चा में हैं लेकिन इन्हीं किसान भूस्वामियों की जमीन को ठेका-पट्टा पर लेकर खेती करने वाला और खेती-किसानी के जरिए आजीविका पाने वाले ग्रामीणों को लेकर कहीं कोई चर्चा या चिंता नहीं दिखाई देती।
आज की विकास नीति के अंतर्गत कथित विकास की जो प्रक्रिया चल पड़ी है उसमें गांव की आत्मनिर्भरता नहीं, बल्कि गांवों से पलायन और खेती से दूरी की झलक मिलती है। लोग खेती छोड़ रहे हैं और जीवन-यापन के लिए, बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जबकि गांधी जी गांव को आत्मनिर्भर बनाने के पक्षधर थे। उनकी सोच थी कि ग्रामीण जीवन को छोड़ना नहीं है, बल्कि गांवों को आदर्श बनाना है और उसे महत्व देना है। गांधी की सोच थी कि हमें प्रकृति ने सबकुछ दिया है और हम इस तरह से गांवों को आत्मनिर्भर बनाएं कि गांव न सिर्फ तरक्की करें अपितु उपलब्ध संसाधनों का अत्यधिक दोहन पर आधारित व्यवस्था न हो। मुझे लगता है कि जो गांधी जी की आर्थिक सोच थी, उसमें उन्होंने आत्मनिर्भर गावों पर जोर दिया है। आज के समय में हर चीज के लिए डिपेंडेंस की बात हो रही है। आज गांव हो या शहर पर्यावरण में भारी गिरावट देखने को मिल रही है, लेकिन चर्चा केवल पराली की होती है। पर्यावरण और जलवायु संरक्षण के काम के प्रति गांव के लोगों को जागरूक करने की जरूरत है।
ऐसा नहीं है कि हम गांधी जी के आत्मनिर्भर गांव की सोच से अवगत नहीं है, लेकिन सच्चाई यही है कि हमने उनकी सीख को भूला दिया है। गांधी जी आत्मनिर्भर गांव की बात करते थे। वे स्वदेशी के पक्षधर होने के साथ ही गांव के हर नागरिक की भागीदारी सुनिश्चित हो, यह चाहते थे। आज स्वदेशी के विचार को लेकर कई तरह का भ्रामक प्रचार किया जा रहा है, लेकिन मूल बात यह है कि गांव जितना आत्मनिर्भर होगा उतना ही समृद्ध होगा। गांधी जी आत्मनिर्भर खेती के पक्षधर थे। उनकी सीख थी कि खेती गांव में उपलब्ध परंपरागत साधनों पर आधारित हो, इसमें बाहरी इनपुट कम से कम हो। हम जीरो बजट खेती की परंपरा को भूलते जा रहे हैं और रासायनिक खाद, मशीनों के बेवजह उपयोग से खेती किसानी मंहगी होती जा रही है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि खेती किसानी में जो बाहरी लागत है वह कम से कम हो, उससे जहां तक संभव हो बचा जाए।
जो प्राकृतिक संसाधन हमें उपलब्ध हैं, उसका बेहतर इस्तेमाल ही विज्ञान है। मिट्टी को उपजाऊ बनाने की प्रकृति की अपनी प्रक्रिया है, उसे समझने की जरूरत है। रासायनिक खादों के अंधाधुंध प्रयोग की वजह से मात्र 50-60 साल में ही मिट्टी की उर्वरा-शक्ति कम हो गयी है। जबकि पशु-पक्षी, मित्र कीट-पतंग, सूक्ष्म जीव, प्राकृतिक प्रक्रियाओं के जरिए बिना खर्च के धरती को उपजाऊ बनाते हैं। इसके साथ ही फसल के चक्र को समझा जाना जरूरी है। किस फसल के साथ कौन-सी अन्य फसल लगे जिससे उत्पादन भी हो और मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहे, इस दिशा में ध्यान दिया जाना चाहिए। इसीलिए मिश्रित खेती की बात की गयी थी ताकि संतुलन बना रहे। जरूरत यह जानने की है कि किस फसल के साथ क्या लगाएं, किसकी छाया में कौन-सी फसल अच्छी होगी। धरती के नीचे कौन-सी जड़ें एक दूसरे की पूरक हैं। जैसे अगर गेहूं-धान के साथ दलहन लगाते हैं तो वे प्रकृति से स्वयं नाईट्रोजन प्राप्त कर लेते हैं, उसके लिए बाहर से कुछ देने की जरूरत नहीं होती। यदि हम वैज्ञानिक सोच से प्रकृति को देखते हैं, स्थानीय प्राकृतिक परिवेश के मुताबिक खेती करते हैं तो बाहरी संसाधनों की जरूरत कम होती है। रासायनिक खाद और कीटनाशक के बिना भी बेहतर खेती की जा सकती है, यह गांव की आत्मनिर्भरता से जुड़ी बात है, गांधी की नीति से जुड़ी बात है।
गांधी जी का जोर चरखा और कताई पर था। इसका सिम्बोलिक महत्व है कि जीवन सादगी भरा हो और हम अपने उपयोग में लाने वाला सामान जहां तक संभव हो, स्थानीय उत्पादन से प्राप्त करें। कपड़े का, भोजन का स्थानीय उपभोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। गांधी जी कहते थे कि मैं बाहरी चीजों का विरोधी नहीं हूं। यदि घड़ी की जरूरत है तो वह बाहर से ली जा सकती है लेकिन खाने के तेल की जरूरत है तो वह गांव के कोल्हू में ही तैयार हो। साग-सब्जी स्थानीय स्तर पर उगाई जाएं। आज चरखा सजावट की चीज बन गयी है, लेकिन गांधी जी की सोच में वह स्थानीय समायोजन और रोजगार की जरूरत से जुड़ी हुई थी।
आज गांवों से बड़ी संख्या में पलायन हो रहा है। यहां यह समझने की जरूरत है कि बेहतर अवसर के लिए पलायन और मजबूरी में पलायन, दोनों दो चीजें हैं। यदि हम गांधी जी के चिंतन के अनुरूप गांव का विकास करें तो यह स्थिति नहीं आएगी। गांव की आत्मनिर्भरता और नवीन रोजगार के सृजन की दिशा में जब तक कदम नहीं बढ़ेगा, तब तक खुशहाली नहीं आएगी। इस लिहाज से मुझे लगता है कि नीतिगत आधार पर हम गांधी की सोच के बिल्कुल विपरीत चल रहे हैं। किसान की बात करे तो लगभग पचास-साठ साल पहले तक बहुत से मामलों में किसान आत्मनिर्भर था। बीज उसके होते थे। खाद वो खुद बना लेता था। उन्होंने ये पहचाना कि केवल खेती आजीविका का पूरा जरिया नहीं हो सकती। इसका मतलब खेती के अलावा अन्य आजीविकाएं भी होनी चाहिए। जीवन में उपयोग होनो वाली अधिकतम चीजों का उत्पादन स्थानीय स्तर पर हो सकता है। उनका ये कहना नहीं था कि बड़ी कम्पनी का उत्पादन न हो। विदेशों से आयात न हो। लेकिन लोकल उत्पादन लोकल स्तर ही पर होना चाहीए। मुझे लगता है कि इस बात को अपना लें और आत्मनिर्भरता कर लें तो जितनी आर्थिक संकट है, दूर हो जाएगी।
भारत के गांवों मे घूमते हुए मैंने दो बातें महसूस की है जो गांवों की व्यवस्था को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकती है। दो बुनियादी काम है जिसके जरिए गांव आत्म निर्भरता की दिशा में बढ़ सकते हैं। पहला, जल संरक्षण यानी नमी का संरक्षण। जहां-जहां जल संरक्षण के काम किए गए हैं उन गांवों में खुशहाली आई है। दूसरा, प्राकृतिक वनों का स्थानीय स्तर पर संरक्षण, संवध्र्दन और समायोजन करने का काम। जल संरक्षण के महत्व को सरकार भी स्वीकार करती है। कुछ जगहों पर सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों ने इस दिशा में काम किया है। निर्धन परिवारों को केंद्र में रखकर कई गांवों में कुछ संगठन काम कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के चित्रकूट के पाठा क्षेत्र में अखिल भारतीय समाज सेवा संस्थान अच्छा काम कर रही है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में चले चिपको आंदोलन की तर्ज पर कर्नाटक के उत्तरी कन्नर जिले में आंदोलन चला। इसी तरह राजस्थान के कोटा जिले में बंधुआ मजदूरी की समाप्ति के लिए समर्पण संस्था द्वारा अच्छा काम किया गया। स्थानीय दस्तकारी, कलाकारी को आगे बढ़ाने, कोल्हू की परंपरा को बनाए रखने का काम कहीं-कहीं हुआ है। इसे और विस्तार देने की जरूरत है। हम खादी पर आधारित ग्रामोद्योग का काम बेहतर तरीके से नहीं कर पाए। बदले हुए समय के अनुरूप यदि परंपरागत और आधुनिक के संगम से प्रयास किया जाता तो बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन हो सकता था। साधारण गांव वासियों की क्षमतायें अधिक हैं। जो पहचानी नहीं जाती है। हम ये सोचते हैं कि जो डिग्री प्राप्त करेंगे, उनमें ही क्षमतायें हैं। लेकिन आम गांव वासियों की क्षमतायें छुपी रह जाती है। उन्हें पहचाने जाने और पहचान देने की जरूरत है जैसे कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी गांव में चावल के कई किस्मों को जिंदा रखा गया है। आज की हरित क्रांति में तो उसका सोच भी नहीं सकते। यह बिल्कुल मानो कल्चर है। और बिल्कुल जैव-विविधता को खेतों में ही बचा के रखा जा सकता है। जमीनी समस्याओं के सामाधान की क्षमता जितना गांव वासियों, किसानों और दस्तकारों में आ सकता है। उतना डिग्री धारकों में नहीं आ सकती है। गांव वालों के पास व्यवहारिक ज्ञान है और उसे सहेजे जाने की जररूत है और विस्तार देने की जरूरत है।
देश गांधी जी की 150 वीं जयंती वर्ष मना रहा है। हमें गांधी के अहिंसा के सिद्धांतों पर अमन, शांति के सभी पहलुओं पर अमल करने की पुरजोर कोशिश करनी चाहिए। समाज में व्याप्त सांप्रदायिक, जातिगत, राजनीतिक, महिला विरोधी हिंसा की रोकथाम के लिए व्यापक अभियान चले तो यह सिर्फ अपने देश के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए बेहतर होगा। इस तरह की सार्थक पहल हो तो गांधी 150 पर बेहतर माहौल बनेगा। हमारी खेती में इस तरह का विकास कैसे हो, जिससे कि हम आत्मनिर्भरता को, परम्परागत ज्ञान को, परम्परागत बीजों को सहेतने की कोशिश कर सके। इन सब मुद्दों पर काम किये जाने की जरूरत है। आत्मनिर्भर गांव के साथ ही प्रकृति के साथ परस्पर सहयोग, पूरी दुनिया के स्तर पर जलवायु परिवर्तन के संकट पर मिलजुलकर कार्य हो, तो गांधी जी की सार्थकता होगी।
(ग्राम यात्री, वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता)


