पंचायत खबर टोली
- तकनीकी विधि और अच्छी प्रजाति के बीजों का करना होगा चयन
- संकर प्रजाति की फसल एक तापमान में कई दिनों तक जा सकता है रखा
- मऊ : हमारे देश में विविध खेती की परंपरा रही हैं किसान भाई परंपरागत फसलों जैसे गेहूं, धान की खेती के अलावा समय—समय पर नयी—नयी फसल लगाते हैं। कृषि वैज्ञानिकों की सलाह है कि यदि किसान टमाटर की खेती करें तो उन्हें काफी लाभ हो सकता है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वे इसके लिए नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल करें और अच्छी प्रजाती के बीजों का चयन करें। ऐसा कर किसान भाई टमाटर की खेती से मालामाल हो सकते हैं।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ
कृषि विज्ञान केंद्र पिलखी के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. एनके सिंह का कहना है कि टमाटर में सामान्य व संकर दोनों प्रकार की किस्में उपलब्ध हैं। सामान्य प्रजाति के टमाटर में छिलके पतले व जूस ज्यादा होते हैं तथा संकर में छिलके मोटे होते है। संकर प्रजाति के टमाटर के फल कमरे के तापक्रम पर कई दिनों तक रखे जा सकते हैं और वह खराब नहीं होंगे। सामान्य प्रजाति में काशी अमृता, काशी पूसा आदि किस्में शामिल हैं। इनके फलों के पकने की अवधि 80 से 90 दिन है तथा उत्पादन 400 से 500 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है। इनके लिए बीज की मात्रा 450-500 ग्राम प्रति हेक्टेअर पर्याप्त होती है। संकर प्रजाति में स्वर्ण वैभव, अविनाश-2, रूपाली, कंचन, नवीन आदि किस्में हैं। स्वर्ण वैभव के पकने की अवधि 55 से 60 दिन तथा उत्पादन 700 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेअर है। अविनाश-2 की 85 से 90 दिन में उत्पादन 600 से 700 प्रति हेक्टेअर है। इसके लिए 300 से 350 ग्राम बीज प्रति हेक्टेअर के लिए आवश्यक है। संकर प्रजाति के बीज का रोपण करके टमाटर की खेती से अधिक उत्पादन किसान पा सकते है।
रोपाई के समय इन बातो का रखें ध्यान
डा. सिंह ने बताया कि खेत में 250 ग्राम नीम की खली का प्रयोग करने के बाद गोबर की खाद 1/2 भाग डाल दें और बीज की नर्सरी डालने से पहले 24 घंटे पानी में भिगोकर रखने के बाद ही बीज खेत में डालें। उसके बाद नर्सरी में पौधे की उंचाई 15-20 सेमी की हो तब रोपाई करनी चाहिए। इसके लिए 60 सेमी चौड़ी तथा जमीन की सतह से 20 सेंमी ऊंची उठी हुई क्यारियां बनानी चाहिए जिनके दोनों तरफ 30 सेमी की दूरी पर पौध की रोपाई करनी चाहिए। मुख्य रूप से टमाटर की दो फसलें होती हैं। पहली जाड़े की फसल जिसकी बोआई किसान दिसंबर प्रथम व द्वितीय सप्ताह तक कर सकते हैं तथा दूसरी बरसात के मौसम में जून-जुलाई में पौध तैयार कर रोपण किया जाता है।

