अमरनाथ झा
गांव अपने अपरिहार्य अंत की बाट जोहते मृतप्राय अवशेष हैं या नवसृजन के लिए बेचैन आहत जन निकाय,इस मार्मिक प्रष्न के इर्दगिर्द एक पूरी किताब गांव, स्वशासन और पंचायती राज लिख दी है मंथन ने।
संविधान सभा की बहसों और तमाम कानूनों की पड़ताल लेखक ने की है और इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि सामाजिक कार्यो के दौरान जिन कानूनों से रिश्ता बनता या पाला पड़ता है, विमर्शों और पढ़ने-सुनने के दरम्यान जिन कानूनों की जानकारी मिलती है, उसमें लगभग सारे कानूनों से गांव की छवि ही गायब है। जबकि दरअसल उन कानूनों की प्रभाव भूमि या प्रहार भूमि अधिकांशतः गांव ही है। बे चेहरा, बिनहिचक, बिन जिम्मा गांव कानूनों का बोझ ढोते रहने को बेबस हैं।
गांव के अस्तित्व की इतनी वैधानिकता भी नहीं कि वह प्रशासन के निर्णय को रोक सके। नागरिक अपनी पहचान, अपनी आस्था का अधिकार रखता है, अपनी जाति-धर्म सुरक्षित रख सकता है,पर सारे ग्रामीण मिलकर भी किसी गांव की पहचान को सुरक्षित रखने का हक नहीं रखते। गांवों को शहरी क्षेत्र में लाना, पंचायती क्षेत्र को नगर परिषद क्षेत्र में लाना, खेती की जमीन पर व्यावसायिक टैक्स लागू कर देना, भूमि का उपयोग पैटर्न कानूनी रूप से बदल देना-यह सब ब्यूरोक्रेसी की निर्णायकता के क्षेत्र में है। इसके लिए ग्रामीणों से अलग-अलग या ग्रामसभा की बैठक की सहमति की कोई अनिवार्यता प्रशासन नहीं समझता, नहीं मानता। ऐसी वैधानिक अनिवार्यता है या नहीं-इस पर विवाद है, पर प्रशासन में इसपर कोई मतभेद नहीं।
लेखक साफ तौर पर रेखांकित करता है कि आज का पंचायती राज कानून वास्तविक स्थानीय स्वशासन या ग्राम स्वराज की स्थापना नहीं कर सकता। यह ज्यादा से ज्यादा शीर्ष संचालित विकास की एक सक्रिय और निर्वाचित एजेंसी की रचना कर सकता है। पंचायती राज संस्थाएं कुपोषित हैं, अपंग हैं, लगभग निष्प्राण हैं। कुपोषण और अपंगता की असल जड़ तलाशना और उसे पूरी तरह सबल-निरोग बनाने के उपाय करना तो मुश्किल और वक्त लेने वाला कार्य है। मौजूदा हालत में कानूनी रूप से हासिल हकों को भी कैसे लिया जा सकता है, किन कमजोरियों को दूर कर इन संस्थानों में यथासंभव जान भरी जा सकती है। इसके संभव तात्कालीक कार्यवाहियों के सुझाव दिए जा सकते हैं।
पंचायती संस्थानों का बुनियादी मकसद गांवों, गांवों की सामुहिकता, ग्रामीण जीवन को उन्नत और शक्तिमान बनाना होना चाहिए। किन्तु वे मौजूदा शासन निकायों की तरह गांव को निचोड़ने-कमजोर करने का काम भी कर सकते हैं। ऐसी ही दिषा पंचायती राज की है भी। इसके कारण हैं। विधान बनाना तो विधायकों का काम है। विधान पर अमल के लिए नियमावली बनाना, प्रक्रियाएं गढ़ना, संकल्प जारी करना, अधिसूचना जारी करना-ये सारे तो नौकरीशुदा कार्यपालिका के मुख्य कार्यक्षेत्र हैं। नियमावली के जरिए भी अधिकारों को कुतरा जा सकता है, अधिकारों को देने की प्रक्रिया जटिल बनाई जा सकती है, अधिकारों के आवंटन की प्रक्रिया को लंबा से लंबा से लंबा खींचते हुए लम्बे समय तक टाला जा सकता है। अब या तो केन्द्रीय विधायिका और प्रांतीय विधायिका को अफसरशाही की इस लटकाउ विशेषज्ञता/दक्षता का अन्दाज नहीं होगा, या वे भी यह जानते चाहते होंगे। इसे तय करना कठिन है। इतना तय है कि गांव की सामुहिक पहल से ही गांव की निर्णायकता, गांव की खुशहाली सुनिष्चित हो सकती है। गांव और ग्राम सभा की शक्ति का विस्तार सिर्फ कानूनी अधिकारों पर ही निर्भर नहीं होता। ऐसी बहुत सारी सामाजिक, सांस्कृतिक,अनौपचारिक गतिविधियां हो सकती हैं, जिनकी सशक्त राजनीतिक अभिव्यक्तियां हो सकती हैं, जो गांव को और ग्राम-सभा को एक निर्णायक निकाय की हैसियत दिला सकती हैं।
स्वषासन के बढने का अर्थ है शासन का घटना-स्वशासन लगातार बढता जाए, शासन लगातार घटता जाए-प्रत्यक्ष लोकतंत्र के हर संभव आयाम सधते जाएं। बस अनिवार्य संदर्भों में (जो प्रत्यक्ष स्वशासन के जरिए संभव नहीं) प्रातिनिधिक लोकतंत्र और गैर निर्वाचित मशीनरियां रह जाएं। इस दिषा में बातें कभी बढती नहीं। यानी आज की सरकारी शब्दावली में स्वशासन का सिर्फ सांकेतिक संदर्भ है। सीमित स्थानीय शासन या स्थानीय स्तर पर सार्वजनिक गतिविधियों को संचालित करने, कुछ सीमित एवं निर्धारित भूमिकाओं को कार्यान्वित करने के लिए बनाए गए निर्वाचन आधारित निकायों को दिया गया सुन्दर मोहक नाम है -स्वशासन की संस्थाएं। दरअसल, काफी तीखी और धारदार बहस और हस्तक्षेप के बाद संविधान में आर्टिकल 40 के रूप में इसे जगह मिल सकी जो राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों में शामिल है। संविधान के 73 वें संषोधन के पहले तक यही स्थिति बनी रही। संविधान संशोधन के बाद भी ग्राम सभा संवैधानिक इकाई नहीं बनी। बनी भी तो एक सामान्यीकृत रूप में, हर मौजूद गांव संवैधानिक इकाई नहीं बना। गांव अपना अस्तित्व, अपनी पहचान सुरक्षित रख पाने के मामले में भी निर्णायक या स्वायत्त नहीं बना।
गांव निस्संदेह एक ठोस सच्चाई है। आज भी देश की सबसे बड़ी आबादी गांवों में बसी है। खासी आबादी गांव छोड़ चुकी है, शहरों में पूरी तरह जम चुकी है। उस आबादी का भी एक हिस्सा भावनात्मक रूप से या जमीन के कारण भौतिक रूप से या रीति-रिवाजों के निर्वाह के लिए धार्मिक-सांस्कृतिक रूप से आज भी गांव से जुड़ा है। शहरीकरण के विस्तार, तकनोलाॅजी के विस्तार के बाद भी शहर तमाम शहरियों के लिए स्थाई और भरोसेमंद, संतोषजनक और आत्मीय वास-विकल्प नहीं बन पाया है। शहरों के विस्तार और गांवों के उजाड़ की समकालीन परिघटना और बहुविध भावी संभावना को गहराई में स्वतंत्र रूप से परखने की जरूरत है। इस जरूरत को कमोबेश पूरा करने के प्रयास में यह किताब एक महत्वपूर्ण पड़ाव दिखती है।
इस किताब के माध्यम से लेखक की अपेक्षा फिलहाल इतनी ही है कि ‘गांव तार्किक और विवेकशील बहस के केन्द्र में आएं, गांव सकारात्मक परिवर्तन और सृजन की जमीन बनें, गांव बुनियादी परिवर्तन का सुयोग्य और निर्णायक वाहक बने।लेखक मानता है कि वह समय देश के लोकतंत्र को पूरी तरह से तार्किक और समृद्ध बनाने का समय होगा जब गांवों को स्वतंत्र रूप से समग्रता में देश के राज-काज, आर्थिक,राजनीतिक और बहुत जरूरी तौर पर पर्यावरणीय दृष्टि से संपन्न इकाई के रूप में देखना शुरू होगा और सामाजिक संरचना में बदलाव के लिए गांव अगर तैयार होते हैं तो जो भी राजनैतिक ताकत उन्हें हासिल हुई है उसका एक सार्थक परिणाम होगा।

