न राहुल के कलावती के दिन बहुरे, न मोदी के लक्ष्मी के दिन बहुरेंगे…न कलावती की गरीबी मिटी, न ही नरेंद्र मोदी लक्ष्मी के आएंगे अच्छे दिन

मंगरूआ
कोलकाता: आज लक्ष्मी की चर्चा है कभी कलावती चर्चा में थी। रातों रात सेलिब्रेटी बन गईं। कभी कलावती का झोंपड़ी चर्चा में था तो आज लक्ष्मी को मिला आवास चर्चा में हैं। जिस तरह कलावती को भूला दिया गया है, कल लक्ष्मी भी भूला दी जाएगी। न राहुल के कलावती के दिन बहुरे, न मोदी के लक्ष्मी के दिन बहुरेंगे। न कलावती की गरीबी मिटी, और न ही नरेंद्र मोदी लक्ष्मी के आएंगे।  अच्छे दिन कलावती भी गरीबी ओढ़े नेताओं के वोट बैंक के लिए मोहरा मात्र साबित हुई थी और लक्ष्मी भी वोट जुगाड़ने का मोहरा बनेगी। वहां भी फोटो सेशन हुआ था, यहां भी फोटो सेशन हुआ है। लेकिन इन सब के बीच जो नहीं बदला वो उनकी स्थिती। सिर्फ एक कलावती और लक्ष्मी ही क्यों हजारों-लाखों लक्ष्मी और कलावतियां नेताओं के इसी झूठी अदा और सियासती नुस्खे पर कुर्बान जाती हैं।
यदि बारी-बारी इन दोनों घटना क्रम की चर्चा परत दर परत करें तो लक्ष्मी और कलावती के तस्वीरों के बहाने सामने आती है भूखे, नंगे भारत की तस्वीर। उस भूखे नंगे भारत की तस्वीर जिसे चुनावी रण में पहुंचे नेता अच्छे दिन के सब्जबाग दिखाते हैं। उनके गरीबी को ही उनके शोहरत का आधार बना लेते हैं और फिर जैसे-जैसे समय बीतता है उनके जिंदगी में प्रकाश आने के बजाय अंधेरा ही छाया रहता है।


सबसे पहले बात कलावती की
कलावती यवतमाल जिले के मारेगांव तालुका स्थित जालका गांव में रहने वाली एक महिला हैं। उनके किसान पति ने कर्ज न चुका पाने के कारण वर्ष 2005 में आत्महत्या कर ली थी। वर्ष 2008 में महाराष्ट्र के विदर्भ की गरीब महिला कलावती के घर खाना खाने के बाद कलावती के साथ फोटो खिंचवाकर राहुल गांधी ने देश भर में खूब वाहवाही भी लूटी थी। राहुल गांधी कलावती से मिलने उनके घर तक गए। और फिर संसद में उनके साहस को सलाम किया तो वह अचानक से सुर्खियों में आ गई। देशभर के मीडिया संस्थानों के कैमरे के फलैश से अचानक कलावती का झोपड़ा जगमगा उठा और गुरबत और गरीबी में गुजर—बसर करने वाली कलावती देखते ही देखते  किसान विधवाओं के लिए प्रतीक बन गईं। इसके बाद उन्हें सरकार की तरफ से कुछ आर्थिक मदद और खेती के जमीनें भी दी गई थीं।


लेकिन इससे कलावती के जीवन में कुछ खास नहीं बदला। कलावती के कुल आठ बच्चे थे, जिनमें से दो बच्चों की मौत पहले ही हो चुकी थी। राहुल गांधी के आश्वासन देने के बाद भी कर्ज के बोझ से दबकर कलावती की बेटी और दामाद ने आत्महत्या कर लेने की खबरें तो आईं लेकिन कांग्रेसी युवराज उस फोटो सेशन और संसद में दिए गये अपने भाषण के बाद शायद ही कलावती की सुध ली हो।
अब बात लक्ष्मी की
पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनाव चल रहा है। स्वाभाविक है नेताओं के भीड़ और खुशहाली के दावों के बीच अखबारों में विज्ञापन भी छपेगा। ऐसा ही एक विज्ञापन 25 फरवरी को बंगाल के स्थानीय बड़े—छोटे अखबारों में एक विज्ञापन छपता है। ‘आत्मनिर्भर भारत, आत्मनिर्भर बंगाल’ के नारे के साथ इस विज्ञापन में लिखा है, प्रधानमंत्री आवास योजना में मुझे मिला अपना घर। सर के ऊपर छत मिलने से करीब 24 लाख परिवार हुए आत्मनिर्भर। साथ आइये और एक साथ मिलकर आत्मनिर्भर भारत के सपने को सच करते हैं।
आश्चर्य तब हुआ जब आधे अखबारी पन्ने में छपे विज्ञापन में जिस महिला लक्ष्मी की हंसते—मुस्कुराते,खुशहाल भविष्य का आस बंधाते तस्वीर प्रधानमंत्री के साथ छपी थी, उस महिला लक्ष्मी देवी को भी आवास मिलने की जानकारी विज्ञापन छपने के बाद मिली।


क्या कहती हैं लक्ष्मी
कलावती की गरीबी की तरह जब लक्ष्मी की खुशहाली की खबर अखबारों के विज्ञापन के जरिए लोगों तक पहुंची तो लोग तो हैरान थे ही साथ ही हैरान होने की बारी लक्ष्मी की भी थी। स्वाभाविक था चुनावी शोर के बीच कलावती बनी लक्ष्मी की पड़ताल के लिए मीडिया उनके द्वार पर दस्तक देती। और जो तस्वीर सामने आई वो अपने साथ सियासत को बेपर्दा करने का मसाला भी साथ लाई।
कोलकाता के बहुबाज़ार इलाके में किराये के कमरे में रहने वाले लक्ष्मी देवी के द्वार पर जब दस्तक हुई तो लक्ष्मी खुद तो हैरान थी हीं साथ ही हैरान परेशान थे आस-पड़ोस के लोग। हाथ में अखबार का विज्ञापन लिए उन्हें पता ही नहीं चला कि उनकी तस्वीर कब और किसने छाप दी, जबकि उन्हें कोई भी घर नहीं मिला है और वो आज भी किराये के एक छोटे से कमरे में अपने परिवार के छह अन्य लोगों के साथ रहती हैं।

बिहार के छपरा जिले की रहने वाली लक्ष्मी बचपन में ही अपने परिजनों के साथ कोलकाता चली आईं। वे पिछले 40 सालों से कोलकाता के बहुबाजार थाने के मलागा लाइन इलाके परिवार सहित रहती हैं। उनकी शादी बिहार के रहने वाले चंद्रदेव प्रसाद से हुई थी जिनका निधन साल 2009 में हो गया।

लक्ष्मी  कहती हैं, ‘‘उनके पास ना गांव में जमीन है ना ही बंगाल में अपनी जमीन है। पति की मौत के बाद सारी जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर आ गई। तीन बेटे और तीन बेटी हैं। सबकी शादी हो चुकी है। दो बेटे साथ रहते हैं व कूरियर का समान ढोते हैं। इससे उन्हें 200 से 300 रुपए रोजाना कमाते हैं। ’’

वो आगे कहती हैं-

“हम किराये के घर पर रहते हैं। 500 रुपए देते हैं। हमें खुद का घर नहीं मिला है। छोटे से कमरे में मेरे बेटे, बहू और बच्चे रहते हैं। मैं बाहर सो जाती हूं, कमरे के अंदर बच्चे सोते हैं। पानी टपकता रहता है। मेरे से बिना पूछे ही ये तस्वीर दे दी गई। मुझे पता ही नहीं चला कि किसने ये तस्वीर दे दी। अगर पता होता तो मैं खींचने ही नहीं देती। जब मैं सोकर उठी, तो सबने कहा कि आपका पेपर में फोटो आया है। मैं डर गई, सोचा कि मैंने तो कुछ किया ही नहीं है, ऐसे कैसे फोटो आ गया?”
लक्ष्मी कहती है कि हमारे घर में शौचालय भी नहीं है और न ही गैस का चूल्हा। उन्हें व उनके परिवार को शौच के लिए पास में ही कॉरपोरेशन का शौचालय में जाना पड़ता है जहां प्रत्येक बार,प्रत्येक व्यक्ति पांच रुपए लगते हैं।
स्वाभाविक था अखबार में छपे विज्ञापन और प्रधानमंत्री के साथ अपनी तस्वीर देखकर लक्ष्मी हैरान थीं और उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया। इसी उधेड़बुन में उन्होंने पूरे दिन अखबार के दफ्तरों का चक्कर काटा,ये संवाचती रहीं कि उनकी तस्वीर क्यों छापी गई। जब अखबार वालों ने बताया कि यह उन्होंने नहीं भारत सरकार ने छापी है तो लक्ष्मी की हैरानी और बढ़ गई। लक्ष्मी हैरान हैं कि जो है ही नहीं, जो मिला ही नहीं उसकी खबर बाकी लोगों को कैसे हो गई।

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी अपने गंवई अंदाज में लिखते हैं, 15 मार्च को मारे को इस स्टोरी को ब्रेक किया था।
झोपड़ी में रहने वाली लखमी देबी का पीएम के साथ विज्ञापन में फोटो छापकर बता दिया कि लखटकिया घर में रहती है।
इस फोटो को लेकर टीएमसी अउर बीजेपी में गहागद मचा है।

कुछ इसी तरह की हैरानी कलावती को भी हुई होगी जब उसका झोपड़ा तलाशते उसकी गरीबी की कथा समझने राहुल गांधी उसके झोपड़े में गये होंगे। ठीक उसी तरह लक्ष्मी भी हैरान है कि जिस तरह से उसकी तस्वीर अखबारों में छपी है और मीडिया वालों का जमावड़ा उसके घर होने लगा है वैसे ही उसके जीवन में खुशहाली आये। लक्ष्मी को उम्मीद है आज तस्वीर छपी है कल घर भी मिलेगा।
लेकिन आशंका इस बात की भी है जैसे कलावती भूला दी गई वैसे ही चुनाव बाद लक्ष्मी भी न भूला दी जाये क्योंकि लक्ष्मी यदि खुशहाल हो गई तो फिर उन जैसी लक्ष्मी और कलावतियों की कहानियां कैसे सामने आएंगी, कैसे वोट के लिए इनका इस्तेमाल होगा।

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