एमएसपी खत्म कर प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण वाली व्यवस्था की ओर बढ़ें किसान और सरकार

अभिनव प्रकाश

आज जरूरत है कि सभी किसान संगठन सरकार और सभी पार्टियां साथ मिलकर एमएसपी से प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण की ओर बढ़ने का खाका तैयार करें। एमएसपी के कारण चंद फसलों की अत्यधिक खेती से पंजाब आज कृषि उत्पादकता में गिरावट का शिकार हो गया है।

ए कृषि कानूनों का विरोध कर रहे कुछ किसान संगठन सरकार की कोई भी बात मानने को तैयार नहीं दिखते। ऐसे में इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है कि इन प्रदर्शनकारी किसानों की मांगें कितनी न्यायसंगत हैं? इन मांगों में एक प्रमुख मांग है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को कानूनी स्वरूप दिया जाए। एमएसपी के उद्भव की जड़ें हरित क्रांति से जुड़ी हैं। तब किसानों को गेहूं और धान जैसे अनाज की ‘हाई यील्ड वैरायटी’ यानी पैदावार को व्यापक स्तर पर बढ़ाने वाले बीज और तकनीक अपनाकर उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन की आवश्यकता थी। स्वतंत्रता के बाद अनाज की किल्लत से निपटने के लिए भारत द्वारा अपनाई गई खाद्यान्न नीति के तीन लक्ष्य थे। अनाज का उत्पादन बढ़े, हर समय पर्याप्त मात्रा में खाद्यान्न भंडारण रहे, किसानों की आय बेहतर हो और अनाज सस्ती दरों पर उपलब्ध हो। हालांकि इन तीनों पहलुओं को एक साथ नहीं साधा जा सकता है। अगर अनाज का उत्पादन बढ़ेगा तो दाम घटेंगे और किसानों की आय पर इसका प्रतिकूल असर पड़ेगा। वहीं सरकार किसानों की आमदनी सुरक्षित रखने के लिए कृत्रिम तरीके से उपज की कीमतें अधिक निर्धारित करेगी तो इससे महंगाई बढ़ेगी, जिससे तीसरा लक्ष्य पूरा नहीं होगा। वास्तव में एमएसपी के जरिये कृत्रिम तरीके से कीमतों को प्रभावित करने से उन्हीं फसलों पर पूरा जोर होगा, जो उसके दायरे में आती हैं।

पंजाब में पूंजीवादी किसान वर्ग उभरा

पंजाब में गेहूं और धान की खेती के रूप में यही हो रहा है। पिछली सदी के छठे-सातवें दशक में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी पर सरकार ने हरित क्रांति के लिए फोकस किया था। आसान कर्ज, सस्ती बिजली, मुफ्त पानी और सस्ते खाद आदि के साथ सरकारी मंडी में एमएसपी पर खरीद उसके अहम पहलू थे। यह नीति न सिर्फ भारत को खाद्य सुरक्षा प्रदान करने में सफल रही, बल्कि इसने कृषक समाज को भी बदल दिया। खासतौर से पंजाब में पूंजीवादी किसान वर्ग उभरा। यह वर्ग परंपरागत श्रमिकों के बजाय मजदूरों के उपयोग और आर्थिक लाभ को केंद्र में रखकर कार्य करता है। आम धारणा के विपरीत पूंजीवाद का मतलब बड़ी-बड़ी इंडस्ट्री और उद्योगपति नहीं होते। पूंजीवाद उत्पादन के संबंध से निर्धारित होता है न कि उत्पादन के स्तर से। पूंजीवाद औद्योगिक क्रांति से भी पुराना है और इसका उद्भव मध्यकालीन यूरोप के कृषि-पूंजीवाद और वणिकवाद से हुआ है।

पंजाब के बड़े किसानों को नए कृषि कानूनों से भय

पंजाब में उभरे ये बड़े किसान कालांतर में खेती के अलावा साहूकारी, ग्रामीण व्यापार एवं वाणिज्य और सरकारी मंडियों के व्यापारी के रूप में स्थापित हुए। राजनीतिक मोर्चे पर भी उनका प्रभाव बढ़ता गया। इसी वर्ग को नए कृषि कानूनों से भय लग रहा है, क्योंकि उसका आर्थिक और सामाजिक वर्चस्व मौजूदा व्यवस्था के बरकरार रहने में ही निहित है। सरकारी सब्सिडी, एपीएमसी का एकाधिकार और उस पर नियंत्रण के साथ ही एमएसपी इस यथास्थिति के आधार स्तंभ हैं। उन्हें आशंका है कि कृषि क्षेत्र में उदारीकरण से यह व्यवस्था समाप्त हो सकती है और साथ ही उनका वर्चस्व भी। इसीलिए नए कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का यही वर्ग सबसे आगे है। अपनी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण यह तबका अपने प्रभाव क्षेत्र में कुछ किसानों को लामबंद करने में सफल भी हुआ है।

बेहतर भविष्य के लिए नये नीतियों की दरकार

इस विरोध-प्रदर्शन के बीच हमें यह भी विचार करना होगा कि अतीत की नीतियों के सहारे भविष्य की ओर नहीं बढ़ सकते। यह आवश्यक नहीं कि पहले जो नीति सही थी वह आज भी उपयुक्त हो। भारत के कुल किसानों में से 85 प्रतिशत छोटे एवं सीमांत किसान हैं। ये भी खाद्यान्न खरीदते हैं। इसके अलावा ग्रामीण आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा भूमिहीन मजदूरों का है।

एफसीआई के पास अनाज भंडारण की पुख्ता व्यवस्था नहीं

यह स्पष्ट है कि अधिक एमएसपी से महंगाई बढ़ती है जो इन सभी वर्गों को प्रभावित करती है। शहरी गरीबों पर भी इसकी मार पड़ती है। जबकि इसका लाभ ग्रामीण क्षेत्र के एक बहुत छोटे से वर्ग को मिलता है, क्योंकि एमएसपी का लाभ कुछ ही किसानों को मिल पाता है। यही नहीं, बाजार से अधिक कीमत और सरकारी मंडी में खरीद का आश्वासन इन किसानों को और अधिक गेहूं और धान बोने का प्रोत्साहन देता है। परिणामस्वरूप भारतीय खाद्य निगम के पास खरीदे गए अनाज को रखने तक की उचित व्यवस्था नहीं होती। साथ ही सरकारी खजाने पर भारी बोझ भी पड़ता है।

फसलों की विविधता त्याग पंजाब सिर्फ गेहूं और धान की कर रहा है खेती

यहां एक तथ्य पर और गौर करना होगा कि जो पंजाब कभी कई किस्म की फसलें उगाया करता था उसके खेत आज मुख्य रूप से गेहूं और धान से अटे होते हैं। वह भी तब जब यह इलाका शुष्क है जो धान की खेती के लिए उपयुक्त नहीं। धान की अंधाधुंध खेती ने यहां जल स्तर को बर्बाद कर दिया है। हालत यह है कि अगले कुछ दशकों में पूरा क्षेत्र पानी की कमी और अकाल का दंश झेलने पर विवश होगा। वहीं धान की पराली जलाने से प्रदूषण का जहर भी उगलता है।

एमएसपी की गारंटी से खेती किसानी पर प्रतिकूल असर

आखिर यह सब क्यों हो रहा है? इसका जवाब यही है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी किसानों को गलत फसल उगाने की दिशा में ले जाती है। असल में एमएसपी खाद्यान्न की किल्लत के दौर में चुनिंदा फसलों को प्रोत्साहित करने की नीति थी न कि किसानों का अधिकार। इसे कानूनी बनाने की मांग पूरी तरफ से गलत और गैर-जिम्मेदार है। सरकार का काम किसी भी निजी उत्पादक को मनचाही कीमत दिलाना नहीं है।

चंद फसलों पर है जोर, पंजाब में कृषि उत्पादन गिरा

जब समाजवादी सोवियत संघ तेजी से उभर रहा था और लगता था कि यही मॉडल भविष्य में कारगर साबित होने वाला है तब ऑस्ट्रियाई अर्थशास्त्री लुडविग वॉन मिजीस ने भविष्यवाणी की थी कि सोवियत संघ ढह जाएगा, क्योंकि यह बाजार की कीमतों को काम नहीं करने देता। अर्थव्यवस्था में कीमतें एक सिग्नलिंग तंत्र के रूप में कार्य करती हैं। उन्हें कृत्रिम तरीके से तय करना संसाधन आवंटन पर विपरीत प्रभाव डालता है। इससे पूरा तंत्र अक्षम और कमजोर होता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के कारण चंद फसलों की अत्यधिक खेती से पंजाब आज कृषि उत्पादकता में गिरावट का शिकार हो गया है। इस गिरावट को रोकने के लिए ही वहां बाजार मूल्य से कम पर उपलब्ध रासायनिक उर्वरक के अत्यधिक उपयोग के कारण पूरा इलाका कैंसर बेल्ट भी बनता जा रहा है। ऐसे में आज जरूरत है कि सभी किसान संगठन, सरकार और सभी पार्टियां साथ मिलकर न्यूनतम समर्थन मूल्य से प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण की ओर बढ़ने का खाका तैयार करें।
(दैनिक जागरण से साभारलेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)

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