कोरोना की दहशत… “migrant labourers प्रवासी कामगारों” का गांव लौटने का सिलसिला हुआ शुरू..

अमरनाथ झा
पटना: कोरोना की दूसरी लहर की धमक आते ही प्रवासी कामगारों में आतंक फैल गया है और वे जैसे तैसे वापस लौटने लगे हैं। बीते साल की देशबंदी का आतंक उनके चेहरे पर साफ झलक रहा है। अभी महाराष्ट्र, पंजाब व दिल्ली आदि से “migrant labourers प्रवासी कामगारों” का वापस लौटना जारी है। महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर फैल रहे कोरोना की वजह से यहां ऐहतियाती उपाय किए जा रहे हैं। मुंबई, पूना जैसी जगहों से आने वाले यात्रियों की कोरोना जांच तत्काल कराने का निर्देश दिया गया है। हवाई अड्डा और रेल स्टेशनों पर विशेष जांच-केन्द्र बनाए गए हैं। रोजगार छोड़कर वापस आए “migrant labourers प्रवासी कामगारों”  और उनके परिजन अलग किस्म के तनाव में हैं।
देशबंदी के दौरान दूसरे राज्यों से प्रवासी कामगारों के वापस आने पर यहां रोजगार देने की घोषणाएं तो लगातार हुई, पर सभी घोषणाएं कोरी घोषणा ही रही। आजीविका की तलाश में उन्हें फिर अपना घर और गांव छोड़कर निकलना पड़ा और दूसरे राज्यों में जाना पड़ा। कामकाज अभी ठीक से शुरु भी नहीं हुआ था कि फिर प्रवासी कामगारों को शहर छोड़ वापस आने की मजबूरी पैदा हो गई है। पश्चिम चंपारण के धमौरा गांव के त्रिवेणी शंकर दो महीना पहले ही दिल्ली गए थे। काम खोजने में समय लगा, जैसे-तैसे एक जगह काम मिला पर कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए मालिक ने घर लौट जाने की सलाह दी। पड़ोस के दीना पासवान को लुधियाना की फैक्टरी में काम मिल गया था, पर फैक्टरी मालिक के कहने पर उन्हें भी लौटना पड़ा है।
इस तरह के मामले बहुतेरे हैं। “migrant labourers प्रवासी कामगारों” का ट्रेनों से लौटने का सिलसिला शुरू हो गया है। यह भी देखा जा रहा है कि “migrant labourers प्रवासी कामगारों”  का आपस में चंदा करके भाड़ा पर बस लेकर लौटने की स्थिती है। लेकिन यहां आकर करेंगे क्या, खाएंगे क्या?  इसका कोई ठीक नहीं है। अनिश्चितता का दौर पिछले साल से कहीं अधिक गहरा हो गया है। वैसे देशबंदी के बाद जितने शहर-बाजार खुल सके हैं जो भी काम आरंभ हुआ है, वहां सारे काम मास्क लगाकर करना पड़ता है। मास्क लगाकर काम करना बहुत ही असुविधाजनक होता है। फिर भी लोग काम करते रहे। परन्तु कोरोना की ताजा लहर में मालिक स्वयं “migrant labourers प्रवासी कामगारों” को वापस चले जाने के लिए कहने लगे हैं। महाराष्ट्र, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा ही नहीं उत्तराखंड गए “migrant labourers प्रवासी कामगारों” का भी वापस लौटना जारी है। इनमें से कई तो ऐसे भी है जो छंटनी के शिकार हो गए हैं अर्थात उन्हें फिर उस जगह काम मिलने की उम्मीद नहीं रही।

महाराष्ट्र में कोरोना का प्रकोप अधिक होने से वहां से “migrant labourers प्रवासी कामगारों”  के वापस लौटने वालों की तादाद अन्य जगहों से ज्यादा है। मुंबई और पूना से स्पेशल ट्रेनें चलाई जा रही है। 10 अप्रैल से 13 अप्रैल के बीच सात स्पेशल ट्रेनों से 12 हजार से अधिक “migrant labourers प्रवासी कामगारों” के वापस लौटने की संभावना है। दानापुर स्टेशन पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए इन सभी की कोरोना-जांच की जाएगी। जिनकी जांच पॉजिटिव आएगी, उन्हें एकांतवास में भेज दिया जाएगा। बाकी को अपने-अपने घर जाने के लिए छोड़ दिया जाएगा। लेकिन उनके रोजगार के बारे में अभी कोई चर्चा नहीं हो रही है।
आजीविका के लिए दूसरे राज्यों में गए लोगों की वापसी ही नहीं, लोगों का जाना भी चल रहा है। मुंबई,दिल्ली से “migrant labourers प्रवासी कामगारों” के वापस लौटने का सिलसिला चल रहा है तो वहीं दूसरी ओर कलकत्ता और दूसरे पूरब के राज्यों की ओर जाने का सिलसिला भी चल रहा है। इसकी रफ्तार इतनी है कि कोलकत्ता जाने वाली बसों में जगह नहीं मिल रही। पटना के मीठापुर बस स्टैंड से कोलकत्ता से रोजाना 15-20 बसें खुल रही हैं। कोलकत्ता जाने वाले यात्रियों की भीड़ देखते हुए बस वाले अधिक भाड़ा वसूलने लगे हैं। कोलकत्ता का भाड़ा एक हजार से डेढ़ हजार हो गया है। कोलकत्ता जाने वाले प्रवासी कामगारों का कहना है कि कोलकत्ता में चुनाव हो रहे हैं, इसलिए सरकार वहां लॉकडाउन नहीं लगाएगी। उन्हें काम मिलता रहेगा। मुजफ्फरपुर के रीतेश पासवान दिल्ली में काम करते थे, पर वहां कोरोना के बढ़ते मामलों की वजह से लॉकडाउन लगने का आशंका है। इसलिए वे दिल्ली से लौट आए हैं और अब कोलकत्ता जा रहे हैं।
मीठापुर बसस्टैंड में दूसरे राज्यों से आने-जाने वालों का तांता लगा हुआ है। इनमें “migrant labourers प्रवासी कामगारों” की संख्या काफी है पर बसस्टैंड में कोरोना जांच की कोई व्यवस्था नहीं दिखती। बसों में सोशल डिस्टेंसिंग का कोई पालन नहीं हो रहा। बस-चालक सीट से कम यात्री लेकर चलने के लिए तैयार नहीं हैं। चाहे बस राज्य के भीतर किसी जगह जाने वाली हो या दूसरे राज्य में किसी जगह, पर पूरीतरह भरकर ही खुलती हैं। बस वालों का कहना है कि डीजल का दाम बढ़ जाने के बाद सीटें खाली रह जाएं तो उनके डीजल का खर्च भी नहीं निकल पाएगा, कमाएंगे क्या।
कोरोना काल में जब दूसरे राज्यों से बिहार के “migrant labourers प्रवासी कामगारों” का जैसे-तैसे विपरित परिस्थितियों में वापस लौटने का सिलसिला शुरू हुआ, तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बार-बार स्थानीय स्तर पर रोजगार देने का ऐलान कर रहे थे, पर इसकी व्यवस्था जमीनी स्तर पर नहीं हुई। राज्य के बजट में इसके लिए कोई प्रवाधान नहीं किया गया।
कोरोना काल में बाहर से आए प्रवासी कामगारों की दक्षता की जांच करने और उनके लिए रोजगार सुनिश्चित करने का निर्देश मुख्यमंत्री ने पदाधिकारियों को बारबार दिया और इसका खूब प्रचार हुआ कि “migrant labourers प्रवासी कामगारों” के कौशल का सर्वेक्षण कराया जा रहा है। जिसके आधार पर हर किसी के लिए उपयुक्त रोजगार दिया जाएगा। आवश्यकतानुसार इनसे संबंधित निर्माण इकाइयों की स्थापना राज्य में ही करने लिए समुचित कार्रवाई की जाएगी ताकि यहां पर उनके कौशल के अनुसार स्थायी रोजगार उपलब्ध हो सके।
इस दौरान तय हुआ कि “migrant labourers प्रवासी कामगारों”   की दक्षता जांच के लिए एकांतवास शिविरों में ही विशेष सर्वेक्षण कराया जाए। यह काम जिला उद्योग केन्द्रों के महाप्रबंधक को सौंपा गया। उनसे कहा गया कि प्रखंड स्तर पर बने एकांतवास शिविरों में जाकर आपदा प्रबंधन विभाग के साथ तालमेल करके इसका ब्यौरा एकत्र करें। उन्हें एक प्रारूप बनाने के लिए भी कहा गया जिससे श्रमिक के कुशल, अर्ध्द कुशल और अकुशल होने का पता चल सके। मुख्यमंत्री ने बिहार लौटने वाले सभी श्रमिक की दक्षता संबंधी डाटा तैयार करने का निर्देश दिया था। तत्कालीन उद्योग मंत्री श्याम रजक ने विभागीय अधिकारियों के साथ बैठक कर जरूरी निर्देश भी दिया। उनके निर्देश पर सभी जिला उद्योग केंन्द्रों के जरूरी निर्देश भेजे गए। इस संबंध में बियाडा के महाप्रबंधक को भी पत्र भेजा गया और बियाडा के क्षेत्रीय पदाधिकारियों को भी श्रमिकों की दक्षता के आंकड़े जुटाने में सहयोग करने के लिए कहा गया। इन आंकड़ो के आधार पर उन कामगरों के लिए रोजगार की योजना तैयार की जानी थी। विभाग की ओर से जिला प्रबंधकों के एक प्रारूप भी भेजा गया था जिसके आधार पर आठ बिन्दुओं पर सूचनाएं एकत्रित की जानी थी। इस बारे में बिहार के अखबारों में प्रमुखता के साथ खबरें भी प्रकाशित की गईं। उन दिनों मुख्यमंत्री जहां भी जाते श्रमिकों की दक्षता सर्वेक्षण की चर्चा अवश्य करते थे। पर इतने तामझाम के बाद तैयार आंकड़ा कहां गया, इसका पता नहीं चलता। उस सर्वेक्षण में क्या और कितनी जानकारी मिली, यह कोई नहीं बताता।

इस दौरान तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी भी सामने आए और “migrant labourers प्रवासी कामगारों”  के लिए नए कानून की आवश्यकता बताते हुए कहा कि अंतराज्यीय प्रवासी मजदूर अधिनियम 1979 का अगर कड़ाई से पालन किया जाता तो कोरोना काल में देश के एक राज्य से दूसरे राज्य की ओर मजदूरों को पलायन नहीं करना पड़ता, इतनी फजीहत नहीं झेलनी पड़ती। पर नया कानून बनाने के बारे में बिहार सरकार की तैयारी का कोई संकेत नहीं है। हालांकि उप-मुख्यमंत्री ने उन दिनों प्र​काशित खबरों के जरिए कहा था कि चालीस साल पुराने कानून के अनुसार भी “migrant labourers प्रवासी कामगारों”  को घर आने-जाने के लिए रेल किराया देने, बीमार होने पर इलाज, दवा का खर्च वहन करने, प्रति व्यक्ति साढे छह वर्ग मीटर का आवास के साथ पेयजल, शौचालय, स्नानघर और जाड़े में गर्म कपड़ों की व्यवस्था नियोक्ता को करनी थी। विवाद होने पर नियोक्ता को दंडित करने का प्रावधान भी है। कानून का पालन कराने के लिए राज्यों में इंस्पेक्टरों को नियुक्त किया जाना है। यह सब क्यों नहीं हुआ और इसके लिए कड़ाई करने का दायित्व क्या उस राज्य की सरकार का नहीं है जहां से सबसे अधिक मजदूर दूसरे राज्यों में कमाने जाते हैं। इस सवाल को टालते हुए उप-मुख्यमंत्री मोदी ने नए कानून में भविष्य निधि, बीमा, व वन नेशन वन राशन कार्ड जैसी चर्चा करने लगे।
अब कोरोना के दहशत में फिर “migrant labourers प्रवासी कामगारों” की वापसी शुरू हो गई है तो रोजगार का प्रश्न एकबार फिर सामने खड़ा है और राज्य सरकार अधिक रोजगार का सृजन करने की तैयारी में लगने की घोषणा करने लगी है। इसे लेकर ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार अधिकारियों के साथ बैठक करने की कवायद में लग गए हैं। कुल मिलाकर मनरेगा के अंतर्गत अधिक से अधिक रोजगार सृजित करने का निर्देश दिया जा रहा है। मंत्री ने घोषणा की कि काम करने के इच्छुक हर कामगर को काम दिया जाएगा।

 

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