हम मेहनत कश जगवालों से.. अपना हिस्सा मांगेगे,
इक खेत नहीं..इक देश नहीं हम अपना हिस्सा मांगेगे..फैज हम फैज की ये पंक्तियां
जमीन हमारे आपकी, नहीं किसी के बाप की..जैसे नारों हो या
गांव छोड़ब नहीं, खेत छोड़ब नाहीं,
माई माटी छोड़ब नहीं, लड़ाई छोड़ब नहीं…..लड़ाई छोड़ब नहीं
जैसे संकल्प के साथ जंतर—मंतर पर संसद से चंद सौ मीटर की दूरी पर खेतीहर किसान मजदूरों की हजारों की तादाद। पता नहीं रोहित वेमुला और जेएनयू के हलचल से चिंतित हुक्मरानों तक ये नारे पहुंचे की नहीं लेकिन देश भर से आये किसान—मजदूरों ने यह तो मान लिया कि उनकी जीत तभी संभव है जब लड़ाई सतत जारी रहे। लगभग 300 से अधिक किसान संगठनों के देश भर से आये हजारों किसान मजदूरों ने यह एकत्रित होकर सरकार को कहा कि यह देश हमारा है, पूंजीपतियों की जागीर नहीं और वह किसी भी हालत में अपनी जमीन कॉर्पोरेट ताकतों को नहीं कब्जाने देंगे। जल-जंगल-जमीन और श्रम की कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ भूमि अधिकार आंदोलन के नेतृत्व में आयोजित इस रैली में देश के विभिन्न राज्यों से हजारों किसानों, मजदूरों, मछुवारों, वनाश्रितों और दलितों ने हिस्सा लिया।
इस जमावड़े को संबोधित करते हुए मेधा पाटकर ने इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि सरकार को आंदोलनकारियों की ताकत के कारण भूमि अधिग्रहण के अध्यादेशों से पीछे हटना पड़ा है। सरकार को साफ समझ लेना चाहिए कि हमें भूमी अधिग्रहण नहीं भूमी अधिकार चाहिए। हमारी जीविका के अधिकार का कोई भी सामान भूमि हो, पानी हो,जंगल हो,उस पर आम जन का नैसर्गिक अधिकार चाहिए। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार भले ही भूमि अधिग्रहण अध्यादेशों से पीछे हट गयी है लेकिन पिछले दरवाजे अर्थात राज्यों के जरिए भूमि अधिग्रहण की चेष्टा बार—बार की जा रही है। उन्होंने कहा कि आज हालत यह बन रही है कि कॉरपोरेट जहां उंग्ली रख दे वो जमीन उनकी,लेकिन भूमिहीनों को जमीन देने के लिए सरकार के पास जमीन नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं में ग्राम सभा की अवहेलना क्यों? साथ ही कहा कि निजी कंपनियां भी यदि जमीन लें तो उन्हें ग्राम सभा से पूछना चाहिए। मेधा पाटकर ने कहा कि जब सरकार को जमीन लेने पर दूसरी जगह वैसी ही व्यवस्था करवाने की हिम्मत हो तभी जमीन लें नहीं तो ऐसा करने का उन्हें कोई हक नहीं। उन्होंने कहा कि सरकार आरोप लगा रही है कि लोग भारत के बर्बादी के नारे लगा रहे हैं..लेकिन ये तो खुद भारत को बर्बाद करने वाले लोग हैं। हम इन्हें ऐसा नहीं करने देंगे।

जय किसान आंदोलन के नेता योगेंद्र यादव ने कहा कि इस देश में खेती और किसानी संकट में है। देश के सूखाग्रस्त प्रदेश चाहे कनार्टक हो, तेलांगना हो, आंध्रप्रदेश, महाराष्ट्र,राज्स्थान,बिहार,झारखंड इन सब जगह किसान परेशान हैं लेकिन आज मीडिया या टीवी चैनल किसानों की परेशानी नहीं दिखाते। आज किसानों को सरकार की ज्यादा जरूरत है लेकिन दुर्भाग्य से देश की सरकार किसान के साथ खड़ा होने की बजाय उनका विरोध कर रही है। किसान कर्ज के बोझ से दबा हुआ है, जबकि सरकार ने सीने पर पत्थर रख लिया है। किसान के पांव के नीचे बाप दादा की थोड़ी सी जमीन है सरकार उन्हें भी किसी न किसी तरह लेने में लगी हुई है। भूमि अधिग्रहण के कानून को लेकर किसानों को जीत मिली है लेकिन अभी जीतने की आदत नहीं पड़ी है। किसान संगठनों का एकजुट रहना होगा, नहीं तो सरकार अध्यादेश को दुबारा ला सकती है। उन्होने कहा कि जिस दिन केंद्र सरकार बजट पेश करेगी, वे भी जय किसान आंदोलन की तरफ से किसानों का बजट पेश करेंगे।
पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री और राजद नेता रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि देश में जो भी लड़ाई चल रही है वो जमीन के लिए है। हिंदूस्तान में एक तिहाई और बिहार में दो तिहाई लोग भूमिहीन हैं। इनकी स्थिति ऐसी है कि यदि काम मिलेगा तो खायेंगे नहीं तो भूखे रहना पड़ेगा। पूर्व यूपीए सरकार ने इनके लिए रोजगार गारंटी कानून बनाया। उन्हें रोजगार दिया। शुरू में भाजपा इस कानून की आलोचना कर रही थी,लेकिन अब समझ आ गया है। रघुवंश सिंह ने कहा कि जिस जनधन योजना की बात हो रही है और बैंक खाते खोले जाने की बात मोदी सरकार कर रही है इनमें 10,000 करोड़ खाते मनरेगा के मजदूरों के लिए खोले गए थे आज उन्हीं खातों में मजदूर भाईयों का 25,000 करोड़ रूपया है। इनके कार्यकाल में जो एक करोड़ खाते खोले गए हैं उनमें कोई पैसा नहीं है। उन्होंन कहा कि ग्राम सभा को मजबूत करना होगा, लाख दुखों की एक दवा, सबसे उपर ग्राम सभा। आज किसान बाढ़ से,सुखाड़ से, कटाव से, जलजमाव से परेशान है और देश की सरकार भूमी अधिग्रहण को लेकर परेशान है।
इस तरह विभिन्न राज्यों में अपनी भू-अधिकार को लेकर लड़ रहे इन समुदायों के प्रतिनिधियों ने इस बात को स्पष्ट कर दिया कि मौजूदा सरकार जिस तरह से देश के प्राकृतिक संसाधनों को निजी ताकतों के हाथ सौंप रही है, वह उसे हर्गिज बर्दाश्त नहीं करेंगे। इस रैली को मेधा पाटकर, डॉ. सुनीलम, अशोक चौधरी, रोमा मलिक, हनन मुल्ला, सुमीत चक्रवर्ती, दीप सिंह शेखावत, ऋचा सिंह समेत अनेक जनांदोलनों के नेतृत्वकारी साथियों ने संबोधित किया। रैली में सरकार के समक्ष निम्न मांगें रखी गईँ ।
किसान मजदूर आंदोलन की मुख्य माँगे:
— भूमि अधिग्रहण (संशोधन) बिल 2015 वापस लो। भूमि अधिग्रहण नहीं भू अधिकार चाहिए। भूमि अधिग्रहण 2013 कानून की अवहेलना बंद करो और राज्य सरकार द्वारा किये जा रहे छेड़छाड़ एवं बनाये कानूनों की मंजूरी रोको।
— राज्य सरकारों द्वारा गैर कानूनी ढंग से किये जा रहे भूमि अधिग्रहण पर लगाम लगाओ। वनाधिकार कानून 2006 से छेड़छाड़ बंद करो और प्रभावी तरीके से लागू करो।
— कृषि संकट से निपटने के लिए तात्कालिक उपाय करो, फसल का उचित दाम और क्षति फसल के बदले उचित मुआवजा दो। बुनियादी भूमि सुधार एवं भू हदबंदी लागू करो या अतरिक्त जमीन का बंटवारा करो, गरीबों के लिए आवास मुहैया कराओ और जबरन विस्थापन बंद करो।
— मनरेगा कानून में बदलाव बंद करो, आवंटन बढ़ाओ और 300 दिन और 300 रूपये रोज का काम सुनिश्चित करो।
— टी एस सुब्रमनियन समिति द्वारा प्रस्तावित पर्यावरणीय कानूनों को खारिज करो।
— श्रम कानूनों में फेरबदल खत्म करो, मजदूरों का अधिकार बहाल हो।


