बिहार के भूजल में आर्सेनिक के प्रकोप को उजागर करने का श्रेय भोजपुर जिले को

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बिहार में आर्सेनिक के प्रकोप का दायरा लगातार बढता गया है। इसके चपेट में 17 जिले आ गए हैं। पचास लाख से  अधिक लोगों के स्वास्थ्य पर संकट है। बक्सर जिला सर्वाधिक संकटग्रस्त जिलों में है। पूरे राज्य में हर साल करीब 75 हजार कैंसर के नए मरीज चिन्हित किए जा रहे हैं। आधे से अधिक आर्सेनिक के शिकार होते हैं। परन्तु राज्य में आर्सेनिक जनित कैंसर की पहचान के लिए सार्वजनिक पैथोलॉजिकल लैब एक भी नहीं है।

महाबीर कैंसर संस्थान व शोधकेन्द्र में पहला उपकरण आया। इसका उल्लेख करते हुए भूजल में आर्सेनिक की समस्या पर लगातार शोधरत डॉक्टर ए के घोष ने कहा कि पूरी गंगा घाटी में यह समस्या है। गंगा के दोनों ओर पांच किलोमीटर में समस्या अधिक गंभीर है। गंगा से दूरी बढने पर उसकी मात्रा कम मिलती है। लेकिन आर्सेनिक की उपस्थिति नेपाल तराई के क्षेत्रों में भी है।

आर्सेनिक दरअसल धरती की कोख में पड़ा है। प्राकृतिक कारणों से अलग अलग जगहों पर वह अलग-अलग रूपों और मात्रा में बिखरा हुआ है। गंगाघाटी में चापाकलों और नलकूपों के माध्यम से भूजल का दोहन बडे़ पैमाने पर होने लगने पर यह आर्सेनिक समस्या बन गया। भूजल दोहन से धरती के भीतर के पर्यावरण में बदलाव हुआ। भूजल स्तर घटने से आक्सीजन को भूजल भंड़ार में जाने का मौका मिला। आक्सीजन के संपर्क में आर्सेनिक के पुराने रूपों का विखंडन हुआ और घूलनशील अवयवों में बदल जाने से वह पानी में घूलने लगा। पेयजल के साथ वह शरीर में प्रवेश तो कर जाता है, पर मल या मूत्र के माध्यम से षरीर से बाहर नहीं निकलता, वहीं पड़ा रहता है। यही संकट का कारण है।

asssssssssssssडॉ घोष बताते हैं कि समूची गंगाघाटी की धरती के नीचे आर्सेनोपायरायट (आयरन आर्सेनिक सल्फाइड) के रूप में आर्सेनिक दबा हुआ है जो पानी में घूलनशील नहीं होता है। पर भूजल के अत्यधिक दोहन और आक्सिजन के प्रवेश करने से भूगर्भ का वातावरण बदलता है। आर्सेनोपायरायट का विखंडन होकर आयरन और आर्सेनिक अलग हो जाता है और आवेशित रूप में आजाते हैं। आवेशित अवस्था में आर्सेनिक जल में घूलनशील है और भूजल में आर्सेनिक घूलने लगता है। इसलिए भूजल में आर्सेनिक की मात्रा बढती गई है। बिहार के भूजल में आर्सेनिक घूलने का पता सबसे पहले 2002 में भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के सेमरिया ओझवलिया गांव में चला। शिक्षक कुनेष्वर ओझा लीवर कैंसर से अपनी मां और पत्नी की मृत्यु हो जाने पर चिंतित हुए। तब तक अखबारों के माध्यम से उन्हें बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में भूजल में आर्सेनिक घूले होने की जानकारी मिल गई थी। वे अपने चापाकल के पानी का नमूने लेकर कोलकाता के यादवपुर विश्वविद्यालय के दीपंकर चक्रवर्ती के पास गए।  चक्रवर्ती की प्रयोगशाला में हुई जांच में पानी में बहुत अधिक मात्रा में आर्सेनिक मिला। इसका दायरा बढ़ता गया।

arsssssssssssssssssssssss2004 में दो,(भोजपूर और पटना) 2005 में चार (वैशाली,भागलपूर शामिल) और 2007 में 12 जिलों में पसर गया था। 2009 में 16 जिलों के भूजल में आर्सेनिक के मामले दर्ज किए गए। 2015 में 17 जिलों में आर्सेनिक के मामले दर्ज किए गए हैं। हालांकि पर्यावरण विज्ञान के प्राध्यापक डॉ अशोक कुमार घोष का मामना है कि केवल दो जिलों-भभुआ और रोहतास को छोडकर समूचे बिहार के भूजल में आर्सेनिक है। उनका आकलन है कि बिहार के 87 प्रतिशत क्षेत्र का भूजल आर्सेनिक से दूषित हो गया है। सर्वाधिक पीडित भोजपुर, बक्सर, वैशाली, भागलपुर, समस्तीपुर, खगडिया, कटिहार, छपरा, मुंगेर और दरभंगा जिले हैं। भूजल में आर्सेनिक की मात्रा मौसम के अनुसार घटती बढ़ती़ भी है। कुछ स्थल ऐसे मिल सकते हैं जहां आर्सेनिक नहीं हो।  इसलिए भूजल की नियमित जांच आवश्यक है। परन्तु बिहार में पानी की जांच करने की व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं है।
आर्सेनिक के जहरीले प्रभाव से बचाव की कई तकनीकें हैं। पर इसका केवल तकनीकी समाधान नहीं हो सकता। सामुदायिक भागीदारी जरूरी है। अभी सरकारी स्तर पर आर्सेनिक से बचाव के तौर पर अधिक गहरे नलकूप और फिल्टर लगाए जाते हैं। इससे केवल फौरी राहत मिलती है। एकतरफ दोहन बढ़ने से भूजल के अधिक गहरे स्तर में आर्सेनिक दूषण का खतरा उत्पन्न होता है। दूसरे आर्सेनिक की अधिक सांद्रता वाला कचरा निकलता है जिसे पास के खेतों में डाल दिया जाता है। वह रिस-रिसकर फिर भूगर्भ में पहुंचता है और पहले से अधिक बडी समस्या का कारण बताता है। वैसे संचालनगत कमजोरियों, उचित निगरानी और रखरखाव के अभाव में फिल्टर जल्दी खराब हो जाते हैं। आर्सेनिक प्रभावित चापाकल को लाल रंग दिया जाता है। लेकिन आर्थिक कारणों से परिशोधन संयंत्र लगने में विलंब होता है। इस प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों के षामिल नहीं होने से भी कठिनाई होती है। लोग संयंत्र को सरकारी वस्तु मानते हैं। डा घोष बताते हैं कि पेयजल के तौर पर आर्सेनिक मुक्त पानी मुहैया कराने का केवल एक सरकारी प्रकल्प चल रहा है। भोजपुर जिले के मोजामपुर में यह प्रकल्प लगा है जो गंगा के पानी को साफ कर करीब 20 गांव में आपूर्ति करता है। दूसरा सफल प्रयोग मनेर में हुआ है। जहां फिल्टर प्रकल्प से निकले कचरे को जैविक ढंग से निपटाने की व्यवस्था भी की गई है। इस प्रकल्प में मुक्त आर्सेनिक को धरती पर फेंकने के बजाए इंटों के बीच चिपका देने के बारे में सोचा गया है। ईंटों में दब जाने पर यह हवा और पानी में घूल नहीं सकेगा और भविष्य में बडी समस्या उत्पन्न होने का खतरा नहीं रहेगा।

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