ग्राम पंचायत व नग​रपालिका जमीनी विकास में लगी, राजस्व संग्रह में बढ़ानी होगी तत्परता

अशोक कुमार लाहिरी
सदस्य, नीति आयोग

स्थानीय सरकारें अर्थात ग्रामीण इलाके में ग्राम-पंचायत और शहरी इलाके में नगरपालिकाएं जमीनी स्तर पर जमीनी विकास से जुड़ी होती हैं। वे महत्वपूर्ण नागरिक सुविधाएं मसलन- सड़क,पानी और साफ-सफाई तथा प्राथमिक शिक्षा व प्राथमिक चिकित्सा मुहैया कराती हैं। पंद्रहवे वित्त आयोग ने इन स्थानीय सरकारों को केन्द्रीय सरकार की ओर से वर्ष 2021-26 के लिए चार लाख 36 हजार 361 करोड़ रुपए अनुदान देने की सिफारिश की। यह पिछली बार (वर्ष-2015-20) के मुकाबले 52 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। पिछली बार दो लाख 87 हजार 436 करोड़ रुपए का अनुदान दिया गया था। स्थानीय सरकारों को अधिक की आवश्यकता होना का तर्क भी जायज होगा। लेकिन बुनियादी समस्या सरकारों-केन्द्र, राज्य व स्थानीय सरकारों द्वारा संयुक्त रुप से अपर्याप्त राजस्व का संग्रह किया जाता है।

 

अब यह जोड़े कि सरकारों से आपकी क्या अपेक्षा है कि वह शिक्षा, चिकित्सा, प्रतिरक्षा, अधिसंरचना, रियायतों, कानून व व्यवस्था और सामान्य प्रशासन पर जीडीपी का कितना प्रतिशत खर्च करे। इसके आलावा पुराने कर्जों के ब्याज का भुगतान (जीडीपी का लगभग 4-5 प्रतिशत) करना होता है। इस सबका जोड़ जीडीपी के 22 प्रतिशत से अधिक होता है जो केन्द्र व राज्य सरकारें टैक्स व गैर-टैक्स राजस्व के रूप में जितना संग्रह करती है। किसी मद में अधिक खर्च करना दूसरे मद में खर्च कम करने से ही हो सकता है। अधिक खर्च करने के लिए सरकार को पर्याप्त राजस्व संग्रह करने का प्रयास करना होगा।
महामारी के दौर में चार लाख 36 हजार 361 करोड़ रुपए के कुल अनुदान में वित्त आयोग ने 70 हजार 51 करोड़ रुपए प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं की कमजोरियों को दूर करने के लिए दिया है। इसने आठ हजार करोड़ रुपए नए नगरों के विकास के लिए प्रदर्शन आधारित अनुदान दिया जिसमें 450 करोड़ रुपए साझा नागरिक सुविधाओं के लिए था। बाकी बचे तीन लाख 57 हजार 860 करोड़ रुपए में शहरी-ग्रामीण क्षेत्रों के बीच बंटवारा 67 और 33 के अनुपात से बढ़कर 2025-26 में 65 और 35 के अनुपात में हो जाएगा। यह देश के बढ़ते हुए शहरीकरण को दिखाता है। उल्लेखनीय है कि देश की कुल आबादी में शहरी आबादी की हिस्सेदारी 2001 में 28 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 31 प्रतिशत हो गई थी। अभी यह इससे भी अधिक हो गई है।

नए नगरों के विकास और साझा नागरिक सुविधाओं के विकास के लिए आवंटन की संरचना शहरी निकायों के प्रशासन में नवाचार तो प्रोत्साहित करने के लिहाज से बनाई गई है, ताकि हमारी नगरें तेज गति से उन्नति कर सकें। वे नवाचार के लिए बीज या मूल पूंजी हैं। अपेक्षा है कि राज्य सरकारें इसके पूरक के रूप में बड़ी रकम का आवंटन करेगी। आर्थिक उन्नति और रोजगार सृजन को प्रोत्साहित करने के लिए क्षेत्र-आधारित संयुक्त सहयोगी विकास की तत्काल आवश्यकता है और इसके साथ ही सेटलाइट नगरों का विकास करके पुराने नगरों को भीड़भाड़ से मुक्ति दिलाना आवश्यक है। नगरपालिकाओं की सक्षमताओं में व्यापक उन्नयन खासकर चार हजार छोटे शहरों का विकास उनमें से प्रत्येक में क्षमता निर्माण के जरीए नहीं किया जा सकता, बल्कि उनकी स्वायत्ता में हस्तक्षेप किए बगैर संस्थानिक व तकनीकी नवाचारों के जरीए किया जा सकता है। साझा नागरिक सुविधाओं का विकास मोबाइल इंटरनेट नेटवर्क, मानचित्रण और सुविधाओं के आयत को एकसाथ जोड़कर किया जा सकता है। इससे नगरपालिकाओं की सुविधाओं को तेजी से विकसित किया जा सकेगा। वित्त आयोग की सिफारिशों में शामिल नवाचारों में यह भी शामिल है।

राज्यों के भीतर अनुदानों का सभी स्थानीय निकायों के बीच बंटवारे में 90 प्रतिशत जोर जनसंख्या पर दिया जाएगा और 10 प्रतिशत जोर उन इलाकों के आधार पर दिया जाएगा जिनमें चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशों से मिले अनुदानों से कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। पंचायती राज संस्थानों के लिए इसबार हुए आवंटन में तीनों स्तर-ग्राम, प्रखंड और जिला को समाहित किया गया है। इसके साथ ही संविधान के अनुच्छेद- नौ और अनुच्छेद-नौ ए के अंतर्गत एक्सक्लूडेड इलाके को भी शामिल किया गया है। पंचायतों के तीनों स्तर के संस्थान एक प्रणाली के हिस्सा हैं और एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। तीनों को रकम मिलने से इनकी क्रियाशीलता में सुधार होगा और इनके छोटे से कार्यक्षेत्र में साझा सुविधाओं का विकास हो सकेगा। इसीतरह नगर निकायों के लिए वित्त आयोग के आवंटन में छावनी क्षेत्रों को भी शामिल किया गया है। यह पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशों का दूसरा नया आयाम है।
स्थानीय निकायों के शहरी अवयव के लिए वित्त आयोग ने शहरी समूहन पर जोर दिया है जिसमें शहरी निकाय, जनगणना में आए शहर और बेतरतीब बस्तियों को शामिल किया गया है। 2011 की जनगणना में कुल शहरी जनसंख्या 37 करोड़ 70 लाख में 61 प्रतिशत शहरी समूहों में रहते हैं। चालीस प्रतिशत आबादी केवल पांच करोड़ 30 लाख नगरों में रहती है जिसमें 47 शहरी समूह शामिल हैं। वित्त आयोग का जोर जटिल शहरी समस्याओं जैसे-साफ हवा, पानी की आपूर्ति, स्वच्छता और कूड़े-कचरे का निपटारा पर है। इसप्रकार, वर्ष 2021-26 में 38 हजार 196 करोड़ रुपए की बड़ी रकम को वायु की गुणवत्ता सुधारने, पेयजल आपूर्ति, स्वच्छता, कूड़ा-कचरा के निपटारे की स्थिति को मानकों के अनुकूल बनाने पर ही खर्च किया जा सकता है। महानगरीय प्रशासन में इस रकम का खर्च नवाचार के तीसरे स्तर पर प्रदर्शन के आधार पर किया जा सकता है।

दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरी निकायों के लिए 82 हजार 859 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है। दस लाख से कम आबादी वाले शहरी और ग्रामीण निकायों के लिए आवंटन में कई तरह के आधार बनाए गए हैं। दोनों के लिए 40 प्रतिशत अनुदानों को किसी के साथ जोड़ा नहीं गया है। इनका उपयोग उन 29 मदों में जहां जरूरत लगे किया जा सकता है जिन 29 मदों को संविधान में 11 वें अनुच्छेद में पंचायती राज संस्थानों को सौंपा गया है और 12वें अनुच्छेद में जिन 18 मदों को शहरी निकायों के सौंपा गया है। लेकिन यह खर्च वेतन व स्थापना के कार्यों में नहीं किया जा सकता। तीस प्रतिशत आवंटन पेयजल, वर्षाजल संग्रह और मलजल शुद्धिकरण के मद में किया गया है। बाकी तीस प्रतिशत को प्रदर्शन के आधार पर

(1) खुले में शौच मुक्त योजना,घरेलू कचरे का निपटारा, मानव मल का निपटारा

(2) स्वच्छता में बेहतर उदाहरण कायम करने ( ठोस कचरे का निपटारा और मलजल प्रबंधन समेत) से जोड़ा गया है।
स्थानीय निकायों की कार्यकुशलता, सरल कार्यपध्दति और जबाबदेही में निम्नलिखित समस्याएं पाई जाती हैं-

(1) ठीक से तैयार और ऑडिट हुआ खाता-बही

(2) राज्य वित्त निगम से ससमय अनुमोदन और तदनुसार उपयुक्त कार्रवाई

(3) संपत्ति कर राजस्व का समय पर संग्रहण।
इन मुद्दों पर पिछले वित्त आयोगों ने ध्यान दिलाने की कोशिश की, लेकिन उसे कम सफलता मिली। लेकिन इसबार वित्त आयोग के अनुदानों का लाभ लेने के लिए इन्हें शर्त बना दिया गया है। स्थानीय निकायों में इनका कार्यान्वयन को चौथा नवाचार माना जा सकता है।
उम्मीद है कि अगले पांच वर्षों में केन्द्र, राज्य और स्थानीय सरकार की साझीदारी में इन सिफारिशों और नवाचारों से संघीय गणराज्य की भावनाओं के अनुरुप स्थानीय सरकारों की जबाबदेही और प्रभावशीलता में प्रगति हो सकेगी।
(इंडियन एक्सप्रेस से साभार)

 

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