केंद्र व राज्य के बीच ठनी रार में पिसते किंजरगांव के किसान

सुखाड़ के बावजूद किंजरगांव के धान की रोपनी की... लेकिन फसल बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है।

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कमलेश कुमार सिंह
  • सुखाड़ के बावजूद किंजरगांव के धान की रोपनी की है। लेकिन फसल बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है।
  • केंद्र और राज्य के बीच खाद को लेकर ठनी रार में बेचारे किसान पिस रहे हैं, जिनकी सुध लेता फिलहाल कोई नहीं दिख रहा।

अरवल: करपी प्रखंड से लगभग 15 किलोमिटर की दूरी पर स्थित किंजर गांव। गांव से गुजरते हुए एकाएक खेतों को दखकर मन में कई सवाल उभरने लगे। क्योंकि जहां कभी खेतों में लगी धान के लहलहाते फसलों को देख मन खुश हो जाया करता था, वहां का मंजर कुछ अलग सा लग रहा है। सुखाड़ के बावजूद किसानों ने धान की रोपनी की है। लेकिन फसल बर्बाद होने का खतरा मंडरा रहा है। ऐसा कोई दैविय प्रकोप के कारण नहीं बल्कि कुछ और ही है। दरअसल, किंजर समेत परियारी, इब्राहिमपुर, नगमा पंचायत के अनेकों गांव के किसान खाद नहीं मिलने से काफी परेशान हैं।
खेतों में लगी धान की फसल खाद के अभाव में कमजोर होती जा रही है। किसान खाद खरीदने के लिए रोज पैसे लेकर आते हैं और घंटों लाइन में लगकर लौटकर जाते हैं। किसानों को खाद खरीदने के लिए पाकेट में रुपये व आधार कार्ड लेकर घूमते देखा जा सकता है। किसान सभी खुदरा विक्रेताओं की दुकानों का शटर बंद देखकर बैरंग लौट जाते हैं। किसान राजकुमार केवट, मोहम्मद अहमद, श्याम बहादुर पासवान, नरेश बिंद आदि ने कहा कि खाद खरीदने के लिए कभी किंजर तो कभी मोतीपुर, शांतिपुरम आ-जा रहे हैं। पर धान में छिड़काव करने के लिए खाद नहीं मिल रही। बड़ी मेहनत से इस वर्ष सुखाड़ में धान की रोपनी की है। खाद के बिना फसल बर्बाद हो जाएगी। ऐसी कहानी केवल अरवल जिले के ही नहीं है बल्कि कमोबेश बिहार के हरेक जिले की है। एक ओर सुखाड़ तो दूसरी ओर किसान अब यूरिया और खाद की किल्लत से भारी मुसीबतों का सामना कर रहे हैं।


वहीं खाद को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच रार ठनी हुई है। दोनों आरोप-प्रत्यारोप का सियासी खेल खेल रहे हैं। बिहार के कृषि मंत्री सुधाकर सिंह के अनुसार, पिछले साल भी खाद की कमी से किसानों को परेशानी हुई थी। जब खेती का सीजन नहीं होता है, तब केंद्र जरूरत से ज्यादा खाद भेज देता है।

हालाकि सुधाकर सिंह स्वीकार करते हैं कि राज्य के प्रबंधन सही नहीं होने के कारण खाद की कालाबाजारी होती है। अब इसे दुरूस्त कर रहे हैं। कृषि विभाग के अनुसार, 2022-2023 में राज्य को 4800 मीट्रिक टन अकार्बनिक उर्वरक देने का लक्ष्य रखा गया । जबकि इस साल 31 जुलाई तक 1316 मीट्रिक टन ही दिया गया है। उधर केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक राज्यमंत्री भगवंत खुबा दावा करते हैं कि बिहार में कालाबाजारी और जमाखोरी के कारण किसानों को खाद की किल्लत हो रही है। बिहार में मांग से अधिक खाद और डीएपी उपलब्ध है। सरकार ने यूरिया का का मूल्य 262 रुपए निर्धारित किया है। जबकि उसे 700 रुपए में बेचा जा रहा है।इन दिनों बिहार के किसान खाद की कमी से परेशान हैं।

50 किलोग्राम वाले यूरिया के एक बोरी की कीमत ₹266 है, जबकि किसानों को ₹500-₹700 प्रति बोरी के हिसाब मिल रहा है। इससे किसानों में काफी नाराजगी है। इसकी बानगी पिछले दिनों पूर्वी चंपारण जिले में देखने को मिली। जहां यूरिया खाद के तकरीबन दोगुने रेट पर मिलने से नाराज किसानों ने किसान सलाहकार पर गुस्‍सा उतारा। किसान सलाहकार को बिजली के खंभे से बांध दिया गया। मौके पर पहुंची स्‍थानीय पुलिस किसी तरह किसान सलाहकार को बचाकर ले गई। इस घटना का एक वीडियो वायरल भी हुआ। इस बीच खाद संकट के बीच कुछ ऐसे लोग सामने आए हैं, जो किसानों को नकली खाद बेचकर अपनी झोली भर रहे हैं।
कुल मिलाकर कहें तो केंद्र और राज्य के बीच खाद को लेकर ठनी रार में बेचारे किसान पिस रहे हैं, जिनकी सुध लेता कोई नहीं दिख रहा। ऐसे में किसान खेती से दूर होते जा रहे हैं, तो इसमें उनका क्या कसूर!

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