कोरोना संकट के ​बीच ..आम के साथ खास को रूला रहा है दाल की पैदावार

अभिषेक राज
नयी दिल्ली: दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ
जम के मौज मनाओ, कोरोना को दूर भगाओ।
मौज मस्ती के दिन तो बीत ही गये,कोरोना में चहुओर लॉक डाकडाउन है, प्रभु नाम का ही सहारा है, और जीना मुहाल हो गया है। लेकिन इस बीच रोटी तो ठीक है दाल की खपत बढ़ गई है,क्योंकि प्रोटीन संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए यही एक सहारा है। ऐसे में खपत का बढ़ना स्वाभाविक है साथ ही बढ़ते खपत के कारण कीमतें बढ़ रही हैं। दाल की पैदावार के कारण गरीबों की थाली से गायब होने का खतरा बना हुआ है।


क्या है सूरते हाल
देश कोरोना संक्रमण की मार झेल रहा है। जैसे तैसे किसानों ने धान—गेहूं की पैदावार तो की लेकिन दाल की पैदावार ठीक ठाक नहीं हो पाई। हालाकि कोरोना के दौरान लोग संक्रमण के भय से मांसाहार की बजाय शाकाहार को ज्यादा तरजीह दे रहे हैं। ऐसे में कोरोना संक्रमण से बचने के लिए शाकाहारियों के लिए दालें ही प्रोटीन का प्रमुख साधन बन गई हैं। गरीब हो या अमीर दाल रोटी खा के मस्त हो जाना चाह रहा है। उधर दालों की खपत तो बढ़ गई लेकिन जरूरत के मुताबिक पैदावार को लेकर संदेह है। सरकारी दावों की बावजूद दाल की बढ़ती कीमतों से दावों की पोल खुलती नजर आ रही है। आम उपभोक्ता की भाषा में कहा जाहे तो दलहन के भाव में आग लगा हुआ है और गृहणी के पहुंच से दूर होता जा रहा है। इसका अनुमान आपको राशन दुकान पर जाने पर हो ही रहा होगा। चने को छोड़कर बाकी सभी दालों के मूल्य सौ रुपये प्रति किलोग्राम से ऊपर जा पहुंचे हैं। थोक बाजार में साबुत दलहनी फसलें सरकार के घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से अधिक पर बिक रही हैं जिसका लाभ किसानों के साथ एमएसपी की अनिवार्यता की लड़ाई लड़ते महीनों से धरणे पर बैठे किसानों को भी मिल रहा है। लेकिन गरीबों की थाली से दाल गायब होते जा रहे हैं यानी छूमंतर होने का खतरा बढ़ गया है।
दलहन की पैदावार बढ़ाने की होती रहे है कोशिश
सरकार लगातार दलहन की पैदावार बढ़ाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करती रही है। समय—समय सरकार के तरह से हर तरह के प्रयास किए जाते रहे हैं और इसमें सरकार को सफलता भी मिली है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इसके बावजूद क्यों दाल की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। स्वाभाविक है यह उसी सिद्धांत के तहत हो रहा है कि खपत बढ़ती है तो कीमतों में ईजाफा होता है यानी मांग और आर्पूर्ति के सिद्धांत का सीधा असर बाजार पर होता दिख रहा है।मांग और आपूर्ति का अंतर बढ़ने से कीमतों में आई इस तेजी को स्वाभाविक माना जा रहा है।

कृषि मंत्रालय के आंकड़ों पर नहीं है बाजार को भरोसा
कोरोना काल में दालों की पैदावार को लेकर बाजार आश्वस्त नहीं हो पा रहा है और ऐसा लगता है कि उन्हें कृषि मंत्रालय के आंकड़ों पर भरोसा नहीं है। यही कारण है अभी रवी की फसल किसानों के घर आई है। सरकारी स्तर पर यह खरीदगी का मौसम है, बावजूद इसके बाजार में इसकी कमी का रोना रोया जा रहा है। व्यापारियों यही वजह है कि खरीद मौसम में व्यापारियों ने कम उत्पादन का राग अलापना शुरू कर दिया है। जबकी रवी के मौसम के बाद किसान अपनी फसल बेचता है और व्यापारी ये कहते हुए पाए जाते हैं अभी रेट नहीं है। लेकिन दाल के मामले में उल्टा ही होता दिख रहा है जिसका असर थोक से लेकर खुदरा बाजार पर साफ तौर पर देखा जा सकता है। स्थिती यह है कि कृषि मंत्रालय के आंकड़े पर उपभोक्ता मंत्रालय को भी भरोसा नहीं है और दबे स्वरों में ही सही अधिकारी व्यापारियों के सुर में सुर मिलाते नजर आ रहे हैं। व्यापारियों की तरह ही उन्हें भी दलहनी फसल के पैदावार को लेकर संदेह है। ह आमतौर पर किसानों से उपज खरीदने के समय व्यापारी ऐसा नहीं बोलते। उपभोक्ता मंत्रालय के अधिकारी भी व्यापारियों से इत्तेफाक रखते हैं। उन्हें पैदावार के आंकड़ों पर संदेह है।

मिले अच्छा मूल्य तो दलहन की खेती के प्रति आकर्षित होंगे किसान

दलहन के व्यापार से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि बाजार में अच्छे मूल्य मिलने पर ही किसान इसकी खेती के प्रति आकर्षित होंगे। देश की प्रमुख दलहन मंडियों में दलहन का मूल्य एमएसपी से अधिक जा रहे हैं। चालू खरीद सीजन के शुरुआती दौर मार्च में सरकारी एजेंसियों को कुछ अरहर और चना खरीदने में ही मदद मिल पाई थी। इसके बाद तो चने से लेकर मसूर तक एमएसपी से ऊपर बिकने लगी हैं। बफर स्टॉक तक के लिए सरकारी एजेंसियों को तरसना पड़ रहा है।

चने का बफर स्टाक अब तक के न्यूनतम स्तर पर

चने का बफर स्टाक फिलहाल अब तक के न्यूनतम स्तर यानी 12 लाख टन पर पहुंच गया है। चालू सीजन में कुल सवा तीन लाख टन चने की खरीद हो सकी है। जबकि अरहर का बफर स्टाक 3.35 लाख टन है। यह पिछले वर्षो का खरीदा हुआ माल है। अधिकतम बफर स्टाक कभी 40 लाख टन तक रह चुका है। दाल कारोबारी ये बखूबी समझ रहे हैं कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि दलहन की अपेक्षित पैदावार नहीं हो पाई है और कोरोना काल में दलहन की पर्याप्त मांग है। मांग और आपूर्ती के संतुलन को बनाये रखने के लिए सरकारी एजेंसियों के पास हस्तक्षेप करने को पर्याप्त स्टाक नहीं है। ऐसे में व्यापारी उपभोक्ताओं की थाली से दाल छूमंतर करने की कोशिश कर सकते हैं।
क्या कहते हैं आंकड़े
चना : एमएसपी 5,100 रुपये; बाजार भाव 5,700 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच चुका है। फिलहाल भाव 5,400 रुपये के आसपास है।

अरहर : एमएसपी 6,000 रुपये प्रति क्विंटल, बाजार भाव 6,800/7,000 रुपये, पिछले पखवाड़े भाव 7,500 रुपये प्रति क्विंटल छू चुका है।

मसूर : एमएसपी 5,100 रुपये; बाजार भाव 6,200 रुपये, आयात निर्भरता बनी रहती है।

उड़द : एमएसपी 6,000 रुपये; बाजार में 7,200 रुपये क्विंटल।

मूंग : एमएसपी 7,196 रुपये; बाजार भाव 7,300/7,500 रुपये प्रति क्विंटल।

समय के साथ सरकार कर सकती है हस्तक्षेप
दालों की बढ़ती कीमतों को देखते हुए खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग मांग और आपूर्ति पर नजर रख रहा है। अभी रवी के आंकड़े पूरी तरह से सामने नहीं आये हैं। आकलन करने के बाद केंद्र सरकार के फीडबैक के आधार पर कदम उठाए जाएंगे।

 

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