सितंबर महीने में हुई बारिश से फसलों को मिली संजीवनी, मुरझाई धान की फसल की लौटी हरियाली

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मनोज कुमार

   बिहार में मौसम हुआ सुहाना, मुरझाई धान की फसल की लौटी हरियाली।

कैमूरः धान का कटोरा कहे जाने वाले कैमूर में इस साल धान की फसल बारिश कम होने की वजह से चौपट होती दिख रही थी। लेकिन पिछले 2 दिनों से हो रही झमाझम बारिश से मुरझाई धान की फसल की हरियाली लौट आई है।

आपको बता दें कि कैमूर जिले भभुआ थाना क्षेत्र के मोकरी और बेतरी गांव में बहुतेरे किसान सुगंधित धान की फसल उगाते हैं। और उससे बनने वाले चावल को विदेशों में भेजा जाता हैं। जिसकी कीमत प्रति 100 किलो 6000 से 8000 ₹ होता है। यही नहीं मोकरी और बेतरी गांव में उपजे धान की फसल और उससे बने चावल का भोग अयोध्या में राम मंदिर में प्रसाद के तौर पर चढ़ाया जाता है।

कैमूर में लगी धान की फसल

लेकिन इस साल जून महीने से लेकर अब तक औसत से भी काफी कम हुई बारिश की वजह से धान की फसल बर्बाद होती दिख रही थी। दरअसल सिंचाई के चार प्रमुख साधन है। जिसमें जलाशयों से निकली नहरे नदियों को बांधकर बनाया गया बीयर और फिर निकाली गई नहर इसके बाद लिफ्ट पंप कैनाल और उसके बाद आता है बिजली चालित समरसेबल या ट्यूबेल। बारिश कम होने की वजह से भूगर्भ जलस्तर काफी नीचे चले जाने की वजह से किसानों के निजी समरसेबल या नलकूप पानी उगलना बंद कर दिए थे। जलाशयों में पानी नहीं होने की वजह से नहरे भी सूखी हुई थी। पंप कैनाल भी जरूरत के मुताबिक पानी नहीं दे पा रहा था। लेकिन सितंबर महीने में शुरू हुई बारिश से एक तरफ किसानों को राहत दी है, तो दूसरी तरफ फसलों को संजीवनी। किसान बुधवार को सुबह होते ही अपने खेतों में उर्वरक का छिड़काव करने की तैयारी में लगे दिखे। यही नहीं सितंबर के मध्य में जिस तरीके से उमस भरी गर्मी से लोग व्याकुल थे उससे राहत मिली है। कैमूर जिले की प्राकृतिक छटा में हरियाली और ठंडक दोनों लौट आई है।

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गौरतलब है कि पुराने समय में जब आधुनिक तकनीकों का प्रचलन नहीं था, उस समय मौसम आधारित भविष्‍यवाणियां सटीक होती थीं, जो अनुभवी लोगों द्वारा समय-समय पर की जाती थीं। ऐसे ही अनुभवी कवियों में माने जाते हैं, अकबर के समय के महाकवि घाघ फसलों के लिए सितंबर महीने की बारिश को लाभदायक बताया है।

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