बुंदेलखंड से दस लाख लोगों का पलायन

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अमित त्रिपाठी

  • 3600करोड़ रुपया भी युवाओं को रोजगार नहीं दे सका, नहीं लग सका बुन्देलखण्ड से युवाओं के पलायन पर ब्रेक
  • 2016 में कराये गया था सर्वे। दिल्ली, पंजाब, सूरत, मुंबई, चंडीगढ़ नौकरी की तलाश में जाते हैं यहां के युवा।

बांदा: बदहाल बुंदेलखंड से अब तक लगभग 10 लाख लोग पलायन कर चुके हैं। अकेले बांदा से 2016 में करीब 3029 परिवार अपने घरों से जा चुके हैं।इन परिवारों में रहने वाले करीब 30 हजार मतदाता हैं। ये आंकड़ा साबित करता है कि बुंदेलखंड पैकेज का 36,000 हजार करोड़ रूपया भी युवाओं को रोजगार न दे सका। बुंदेलखंड से पलायन पर ब्रेक नहीं लगा सका।

बुंदेलखंड में अन्य रोजगार और उद्योग धंधे न होने के कारण यहां के युवा दिल्ली,पंजाब,मुंबई व चंडीगढ़ जाकर रोजगार तलाशते हैं। जिले के नहरी,पैगंबरपुर,सिंहपुर,गोबरी,बघेलाबारी,फतेहगंज,गढ़वामानपुर,महोबा के डढ़तमाफपुर तथा चित्रकुट के बढ़गढ़ इलाके के कई गांव खाली परे हैं। यहां तमाम घरों पर सिर्फ ताला लटका रहता है। तमाम गांवो के युवा दिखाई ही नहीं देते हैं। रोजगार की तलाश में वे दूसरे शहर में जाकर बस गये। यहां सिर्फ बुजुर्ग ही दिखाई पड़ते हैं। प्रवास सोसाईटी की आंकड़ो की माने तो एक दशक से बांदा से 7 लाख,37 हजार920,चित्रकुट से 3 लाख,44 हजार 801,महोबा से 2 लाख,97 हजार 547,हमीरपुर से 4 लाख,17 हजार 989,उरई से 5 लाख, 38 हजार 147,झांसी से 5 लाख,58 हजार 377, ललितपुर से 3 लाख, 81 हजार 316 लोग पलायन कर चुके हैं। प्रवास सोसाईटी इस आंकड़े का पल्स पोलियो अभियान बताता है।
उद्योग न होना रहा बुंदेलखंड से पलायन की वजह
विश्वबैंक की एक रिपोर्ट पर गौर करें तो पश्चिमी यूपी में 57 फीसदी और पूर्वी यूपी में 40 फीसदी उद्योग क्षेत्र है जबकि बुंदेलखण्ड में 3 से 4 फीसदी उद्योग उद्योग क्षेत्र है। यहां 5 फीसदी कृषि में विकास की संभावना है जबकी कृषि में पश्चिमी और पूर्वी यूपी में 45 फीसदी है। बुन्देलखण्ड में चार दशक पहले झांसी में बीएचइएल (भेल), सूती मील और बिजली औद्योगिक एरिया विकसित किया गया था। भेल को छोड़कर सभी उद्योग बंद हैं। बरुआ सागर का कालीन उद्योग, रानीपुर का करघा, मऊरानीपुर का टेरीकाट, हमीरपुर के स्टील प्लांट, चित्रकूट बरगढ़ की ग्लास फैक्ट्री, बांदा का शजर व बुकनी उद्योग, कताई मील बंद हो चुकी हैं। ऐसे में तमाम लोगों को घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।

40 फीसदी लोग कभी नहीं लौटे
पलायन करने वाले 60 फीसदी लोग ऐसे हैं जो मौसमी पलायन करते हैं। वह दशहरा के समय अपने घरों से ईंट भट्ठों पर काम करने के लिए दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। बरसात से पहले वह अपने घरों को लौटते हैं। 40 फीसदी लोग ऐसे हैं जो कभी भी अपने घरों को नहीं लौटते हैं। यह संख्या करीब दस लाख बताई जाती है। ये रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों में गए और वहीं बस गए। बुन्देलखण्ड में 2471 वर्ग किलोमीटर भूमि बंजर है। सियासी दलों ने चुनाव के समय पलायन रोकने और यहीं रोजगार देने का वादा तो किया लेकिन वह सत्ता में आने के बाद बुन्देलों को भूल गए।
(हिन्दुस्तान से साभार)

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