पंचायत खबर टोली
गाजीपुर:नोटबंदी की मार से आलू—प्याज सहित सब्जी उत्पादक किसानों की कमर पहले ही टूटी हुई है। फिर भी वह अपनी श्रम की बदौलत किसी तरह अपने जज्बे को बचाए हुए है। ऐसे में यदि किसी किसान की फसल को कीड़े—मकोड़े से नुकसान हो तो उनपर और बुरा प्रभाव परेगा। लेकिन हमारे कृषि वैज्ञानिक हरसंभव प्रयास कर रहे हैं कि किसानों की फसल को नुकसान न हो। वे समय—समय पर उन्हें खेती किसानी से जुड़ी जरूरी जानकारी मुहैया कराते हैं। इसी क्रम को बनाए रखते हुए कृषि विज्ञान केन्द्र, पी.जी. कालेज, गाजीपुर केन्द्र के पादप सुरक्षा वैज्ञानिक डाॅ. आर.पी. सिंह ने प्याज में लगने वाले विभिन्न रोगों से बचाव हेतु जनपद के किसानों को सुझाव दिया है। सिंह का कहना है क प्याज की सबसे भयंकर बीमारी प्याज का बैंगनी धब्बा रोग है। इस रोग का फैलाव उस समय अधिक हेाता है जब तापक्रम 25-28 डिग्री सेन्टीग्रेट तथा आर्द्रता 80-90 प्रतिशत रहती है। यह एक फफूॅंद जनित रोग है। इस रोग के लक्षण सर्वप्रथम पत्तियों पर सफेद हल्के भूरे रंग के धब्बे दिखायी देते हैं इन धब्बों के बीच का रंग बैंगनी हो जाता है। इस रोग का प्रकोप प्याज की पत्तियों, डण्ठलों पर होता है। रोग की उग्रता बढ़ने पर पत्तियाॅं झुलस जाती हैं जिसके कारण उत्पादन घट जाताहै।
कैसे करें बैगनी धब्बे से बचाव
डॉ सिंह का कहना है कि इस रोग के नियंत्रण हेतु प्याज बोने से पहले खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें, खरपतवारों व अन्य अवशेषों को एकत्र कर जला दें, खेत में जल निकास का उचित प्रबंध करें, 2-3 वर्ष का फसल चक्र अपनायें, नर्सरी उगाने की जगह को बदलते रहेें, पौधशाला को थीरम से उपचारित करें। इसके लिए थीरम 5 ग्राम/वर्गमी. प्रयोग करें अथवा ट्राईकोडर्मा की 1 से 1.5 किलोग्राम मात्रा 50-60 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद के साथ प्रति एकड़ प्रयोग करें। बीज बोने से पहले बीज शोधन का कार्य थीरम की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज दर से अथवा ट्राइकोडर्मा की 5-10 ग्राम मात्रा/किलोग्राम बीज की दर से करेें, रोपाई के तुरन्त बाद मैकोजेब की 2.5 ग्र्राम मात्रा/लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें, खेतों में रोग के लक्षण दिखाई देने पर क्लोरोथैलोनील की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
झुलसा रोग से बचाव का उपाय
प्याज की दूसरी प्रमुख बिमारी झुलसा रोग है, इस रोग के लक्षण सबसे पहले पत्तियों एवं डण्ठलों पर छोटे-छोटे सफेद एवं हल्के पीले धब्बे बनते हैं जो बाद में एक दूसरे से मिलकर बड़े व भूरे रंग के हो जाते हैं और अन्त में गहरे भूरे या काले रंग के दिखायी देते हैं। पत्तियाॅं धीरे-धीरे सिरे की तरफ से सुखना शुरू करती हैं और आधार के तरफ बढ़कर पूरी सूख जाती हैं। इस रोग के कारण भी उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस रोग का नियंत्रण कार्य प्याज के बैंगनी धब्बा रोग प्रबंधन के अनुसार ही करना चाहिए। प्याज की फसल में मृदरोमिल आसीता रोग (डाउनीमिलड्यू) रोग का प्रकोप भी होता है। इसके लक्षण पत्तियों एवं डण्ठलों पर सफेद रूई के समान उभार लिए हुए कवक की वृद्धि दिखाई देती है। इसके प्रकोप से प्रभावित भाग कमजोर होकर फटने लगता है। इस रोग के नियंत्रण हेतु रिडोमिल की 2-2.5 ग्राम/लीटर पानी की दर से मिलाकर छिड़काव करना चाहिए।
प्याज उत्पादन को प्रभावित पीला बौना रोग
प्याज का पीला बौना रोग भी उत्पादन को काफी प्रभावित करता है। यह विषाणु जनित रोग है। इस रोग का प्रसार माॅहू कीट के द्वारा होता है। इसके प्रकोप से पौधे की बढ़वार रूक जाती है। पौधा बौना दिखायी देता है। पत्तियाॅं पीले रंग की दिखाई देती हैं। प्रभावित पौधे में कंद का आकार छोटा रह जाता है। इस रोग के प्रसार को रोकने हेतु रोग ग्रसित पौधे को उखाड़कर जला दें तथा इमिडाक्लोरप्रीड की 5 मिली. लीटर मात्रा 15/लीटर पानी की दर से घोल तैयार कर 2-3 छिड़काव 15 दिनों के अन्तराल पर करना चाहिए। यदि किसान भाई प्याज के प्रमुख रोगों का बचाव बतायें गये के अनुसार करते हैं तो प्याज की फसल से अधिक से अधिक मुनाफा कमा सकते है।
