क्लाइमेट इमरजेंसी को झेलता बिहार

अमरनाथ
पटना: बिहार में क्लाइमेट इमरजेंसी की स्थिती बनती दिख रही है। सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिहाज से तैयार नीति आयोग की रिपोर्ट तो यही संकेत देते हैं। क्योंकि सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिहाज से तैयार नीति आयोग की रिपोर्ट में बिहार को सबसे नीचले पादान पर रखे जाने और जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने की तैयारी के मामले केवल 16 अंक मिला है। बावजूद इसके बिहार में जलवायु परिवर्तन की थोड़ा-बहुत चर्चा शुरू हुई है, पर अभी लगता नहीं कि जलवायु-परिवर्तन का असर बिहार में किस तरह पड़ रहा है, इसकी कोई समझदारी सरकारी या गैर-सरकारी हलके में है।


बिहार में पिछले दो-तीन दशक से मौसम में आ रहे बदलाव को साफ-साफ देखा जा रहा है। बेमौसम बारिस सामान्य चीज हो गई है। एकबारगी काफी वर्षा हो जाना मानों बादल फट गए हों और फिर कई दिनों तक तेज धूप निकलना। लेकिन कुल मिलाकर वर्षा की मात्रा घट रही है। वज्रपात की घटनाएं बढ़ गई हैं। वर्षा ही नहीं, भूजल के स्तर में भी घट-बढ़ हो रही है। जाड़े के मौसम में ठंड नहीं पड़ना, गर्मी में गर्म हवाओं के झोंके चलना आदि घटनाएं इसतरह हो रही है जिसका अनुभव इधर के लोगों को नहीं रहा। मौसम के इस परिवर्तन की वजह से विभिन्न मौसम में होने वाली फसलों को काफी क्षति होती है। इसपर नजर रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता रंजीव कुमार कहते हैं कि ‘बिहार में जलवायु परिवर्तन तो दो-तीन दशकों से दिख रही है, पर अब हालत जलवायु आपातकाल (क्लाइमेट इमरजेंसी) की है। सरकारी स्तर पर जिस तरह के काम हो रहे हैं, वे समस्या को कम करने के बजाए उसे बढ़ाने वाले ही हैं।‘                     …क्लाइमेट इमरजेंसी
जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बिहार देश के सर्वाधिक जोखिमग्रस्त आठ राज्यों में शामिल है। यह निष्कर्ष उन वैज्ञानिक संस्थानों की है जिन्होंने जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करने के लिहाज से देश की तैयारी को जांचने के लिए जमीनी अध्ययन किया है। वे संस्थान भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) बंगलोर, आईआईटी, गुवाहाटी और आईआईटी,मंडी हैं। उन्होंने तीन प्रमुख कारकों को आधार बनाया है- प्रति हजार ग्रामीण आबादी पर वन क्षेत्र का कम होना, अनाज की पैदावार में बहुत घट-बढ़ होना और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं व संरचनाओं की संख्या काफी कम होना। इसके अलावा बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बशर करना और सीमांत व छोटी जोतों की संख्या अधिक होना जिनकी वजह से जलवायु परिवर्तन के लिहाज से नए तौर-तरीके अपनाना कठिन है।

रिपोर्ट के अनुसार सर्वाधिक जोखिमग्रस्त सभी राज्य गरीब हैं, उनकी प्रति व्यक्ति आय कम है और मानव विकास सूचकांक भी निम्न है। जो बताता है कि इन राज्यों की अनुकूलन क्षमता कम है। वन क्षेत्र कम होने और स्वास्थ्य के लिहाज से अधिक संवेदनशील होने से विभिन्न बीमारियों की मौजूदगी के बावजूद स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बहुत कम होने से इन राज्यों में जोखिम बढ़ जाता है। इसके साथ गरीबी रेखा से नीचे गुजरबशर वाली आबादी का प्रतिशत अधिक होने, वर्षा पर निर्भर खेती होने और फसल बीमा के अभाव होने से कृषि का जोखिम अधिक हो जाता है।                                                                                                                    …क्लाइमेट इमरजेंसी
जोखिम अक्सर बहुआयामी होते हैं जो सर्वाधिक जोखिमग्रस्त राज्यों-बिहार, झारखंड और आसाम में साफ दिखता है। इनमें जैव-भौतिकीय, सामाजिक-आर्थिक, आजीविका और संस्थागत व अधिसंरचना संबंधी कारक शामिल हैं। खासकर संस्थागत विकास और अधिसंरचना के मामले में कमजोरी का अधिक असर होता है क्योंकि वे अनुकूलन क्षमता का निर्माण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
वैज्ञानिक संस्थानों ने जिला स्तर पर जोखिम का आंकलन भी किया है और देश के सर्वाधिक जोखिमग्रस्त जिलों में बिहार के कटिहार, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, जमुई, शिवहर, मधेपुरा, पूर्व चंपारण, लखीसराय, सिवान, सीतामढ़ी, खगडिया, गोपालगंज, मधुबनी और बक्सर शामिल हैं। देश के अधिक जोखिमग्रस्त 100 जिलों में 23 जिले बिहार के, 24 आसाम, 11 झारखंड, उत्तर प्रदेश-8, ओडीसा-7, मध्यप्रदेश-6, महाराष्ट्र और बंगाल-पांच प्रत्येक हैं। जम्मू-कश्मीर के चार, मणिपुर व मिजोरम के एक-एक और तमिलनाडु के तीन जिले को इसमें रखा गया है। हरियाणा व तेलंगना के एक-एक जिले भी इसमें शामिल हैं।                                              …क्लाइमेट इमरजेंसी
बिहार 94 हजार 163 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बसा है जिसकी अर्थव्यवस्था में 2016 के आंकड़ों के अनुसार 60 प्रतिशत हिस्सेदारी सेवाक्षेत्र की, 23 प्रतिशत हिस्सेदारी कृषि की और 17 प्रतिशत हिस्सेदारी उद्योग क्षेत्र की है। 38 जिलों के आंकलन में पाया गया कि सर्वाधिक जोखिमग्रस्त किशनगंज जिला है तो सबसे कम रोहतास जिला है। खराब चिकित्सा सुविधाओं की वजह से 36 जिले जोखिमग्रस्त हैं तो छोटी व सीमांत जोतों की वजह से 24 जिले। मनरेगा कार्यक्रम के कार्यान्वयन में कमजोरी की वजह से 14 जिले जोखिमग्रस्त हैं। यह कार्यक्रम आजीविका का वैकल्पिक साधन उपलब्ध कराता है। इसके बाद कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी का मामला आता है जिसकी वजह से 11 जिले जोखिमग्रस्त हैं। कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ने से प्रति व्यक्ति आय में बढ़ोतरी होगी। इससे स्पष्ट होता है कि स्वास्थ्य सुविधाओं में बढ़ोतरी और मनरेगा जैसे कार्यक्रमों के कार्यान्वयन से राज्य के जोखिमग्रस्त होने के स्थिति में कमी आएगी। लोगों की अनुकूलन क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी।                                                                                                    …क्लाइमेट इमरजेंसी

सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिहाज से बिहार की स्थिति को क्रमवार देखें तो गरीबी उन्मूलन में बिहार सबसे नीचले पादान पर है उसे 32 अंक मिले हैं। झारखंड की स्थिति उससे बेहतर है जिसे 36 अंक मिले हैं। भूखमरी को समाप्त करने के दूसरे लक्ष्य को हासिल करने में बिहार नीचे से दूसरे स्थान पर है, उसे 31 अंक मिले है। झारखंड 19 अंक लेकर उसके नीचे है। बेहतर स्वास्थ्य व कुशलक्षेम के तीसरे लक्ष्य के मामले में बिहार को 66 अंक मिले हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामले में बिहार फिर सबसे नीचे है, उसे 29 अंक मिले हैं। झारखंड 45 अंक लेकर उससे सात पदान उपर है। लैंगिक समानता के मामले में यह 48 अंक लेकर राष्ट्रीय औसत के बराबर है। साफ पानी और स्वच्छता के छठे लक्ष्य के मामले में बिहार की स्थिति बेहतर है और उसे राष्ट्रीय औसत से अधिक 91 अंक मिले हैं। किफायती व स्वच्छ बिजली के मामले में बिहार का स्थान नीचे से पांचवां है, उसे 78 अंक मिले हैं। आठवां लक्ष्य काम के बेहतर माहौल और आर्थिक विकास को लेकर है। इसमें बिहार को नीचे से चौथा स्थान और 50 अंक मिले हैं। नौवां लक्ष्य उद्योग, नवाचार और अधिसंरचना के बारे में है, जिसमें बिहार को एकबार फिर सबसे नीचे का स्थान मिला है और महज 24 अंक मिले हैं।

असमानता घटाने के लक्ष्य 10 वां है जिसमें बिहार को नीचे से चौथा स्थान मिला है, उसे 48 अंक मिले हैं। ग्यारहवां लक्ष्य टिकाऊ नगर व समुदायों के बारे में है जिसमें बिहार की स्थिति थोड़ी बेहतर है और उसे नीचे से नौवां स्थान मिला है। उसे 67 अंक मिले हैं। जिम्मेवारीपूर्ण उपभोग और उत्पादन बारहवां लक्ष्य है। इसमें भी बिहार को नीचे से चौथा स्थान मिला है, उसे 59 अंक मिले हैं। तेरहवां लक्ष्य जलवायु संबंधी कार्रवाई का है जो मौजूदा माहौल में सबसे महत्वपूर्ण है और इसमें बिहार सबसे नीचले पादान पर है और उसे केवल 16 अंक मिले हैं। चौदहवां लक्ष्य जलचर जीवों के बारे में है और यह तटीय राज्यों से संबंधित है। पंद्रहवां लक्ष्य थलचरों के बारे में है। वन और वनवासी जीव-जंतु इसके अंतर्गत ही आते हैं। इसमें बिहार का स्थान नीचे से ग्यारहवां है, उसे 62 अंक मिले हैं। सोलहवां लक्ष्य शांति, न्याय और संस्थागत सशक्तीकरण से जुड़ा है। इसमें बिहार का स्थान थोडी बेहतर है और वह राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही नीचे हैं। उसे 73 अंक मिले हैं, राष्ट्रीय औसत 74 है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए साझेदारी सत्रहवां लक्ष्य है जिसका राज्य स्तर पर आंकलन नहीं हुआ है।                                                             …क्लाइमेट इमरजेंसी

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