
WORLD PULSES DAY: हर साल 10 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व दलहन दिवस, दलहन की खेती और उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है। दलहनी फसलों में नाइट्रोजन की मांग कम होती है और इनकी जड़ों में राइजोबियम जीवाणु होता है। इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है। दलहनों में पाया जाने वाला प्रोटीन, फाइबर, और अमीनो अम्ल इसे पोषक गुणों से भरपूर बनाते हैं। भारत में दलहन का उत्पादन, उपभोग, और आयात दुनिया में सबसे ज्यादा होता है। दलहन की खेती भारत में लगभग 5,000 सालों से हो रही है। दलहन की खेती से मिट्टी की उर्वरा-शक्ति बढ़ती है और पर्यावरण भी स्वस्थ रहता है।
दालें क्या हैं?
दालों में प्रोटीन अधिक और वसा कम होती है। इनमें घुलनशील फाइबर भरपूर मात्रा में होता है। जो रक्त शर्करा को नियंत्रित करने और कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद कर सकता है। स्वास्थ्य संगठन मधुमेह और हृदय रोग जैसी गैर-संचारी बीमारियों के प्रबंधन के लिए दालों की सलाह देते हैं। दालों के उदाहरणों में छोले, सूखी फलियां और चना, मसूर, अरहर, मूंग, उड़द आदि दालें शामिल हैं। दालों में 20 से 30 प्रतिशत प्रोटीन होता है।
क्यों मनाया जाता है दलहन दिवस
दालों के पोषण और पर्यावरणीय लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने।
वैश्विक खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में दालों की भूमिका को पहचान दिलाने।
मिट्टी के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए।
दालों के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए।
कृषि प्रणालियों में विविधता लाने के लिए।
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दलहन दिवस की शुरुआत कैसे हुई?
बुर्किना फासो ने सतत विकास के लक्ष्य को 2030 तक प्राप्त करने के लिए दालों की क्षमता को पहचानने के लिए, इस दिन का प्रस्ताव रखा। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2019 में 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस के रूप में घोषित किया। संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन (FAO) विश्व दलहन दिवस मनाता है। इस दिवस की शुरुआत वैश्विक स्तर पर दालों के महत्व और उसकी माध्यम से प्राप्त होने वाले पोषिक तत्वों को ध्यान में रखते हुए की गई थी। दालों का प्रयोग न केवल पोषण प्राप्त करने के लिए किया जाता है। बल्कि इसके माध्यम से भूख और गरीबी को मिटाने में भी सहायता मिल रही है। दालें सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी खानपान का जरूरी हिस्सा हैं। शाकाहारी लोगों के लिए तो दालें ही प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत हैं। विश्व दलहन दिवस स्थायी खाद्य उत्पादन के हिस्से के रूप में दालों के पोषण और पर्यावरणीय लाभों के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है।
भारत सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता
दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक भारत पिछले कुछ वर्षों में आयात पर अपनी निर्भरता बढ़ाता हुआ देख रहा है। क्योंकि अनियमित जलवायु ने घरेलू उत्पादन को प्रभावित किया है। घरेलू उत्पादन में कमी के कारण दालों की कीमतों में उछाल आया है। वित्त वर्ष 2024-25 के पहले नौ महीनों में, दालों का आयात मूल्य के लिहाज से 53 प्रतिशत बढ़कर 3.78 अरब डॉलर हो गया। जो पिछले वर्ष इसी अवधि में 2.46 अरब डॉलर था। मात्रा के लिहाज से, दालों का आयात कैलेंडर वर्ष 2024 के दौरान लगभग दोगुना होकर रिकॉर्ड 66.33 लाख टन हो गया है। जबकि पिछले वर्ष यह 33.07 लाख टन था। कैलेंडर वर्ष 2024 के दौरान आयात घरेलू खपत का लगभग एक चौथाई हिस्सा है। जो लगभग 270 लाख टन है।
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दलहन में आत्मनिर्भरता की प्लानिंग
दलहन की खेती में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। इनमें दलहन की खरीद, लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना, और दलहन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए अनुसंधान शामिल हैं। साल 2025-26 के लिए केंद्र सरकार ने दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की है। इस मिशन के तहत, सरकार तूर, उड़द, और मसूर पर विशेष ध्यान देगी। इसके लिए, केंद्रीय एजेंसियां नेफ़ेड और एनसीसीएफ अगले चार सालों तक किसानों से इन दालों को खरीदेंगी। केंद्रीय एजेंसियां (नेफेड और एनसीसीएफ) किसानों से अगले 4 वर्षों के दौरान जितनी भी दालें खरीदने की पेशकश की जाएगी। उन्हें खरीदने के लिए तैयार रहेंगी। भारत में दलहन का सबसे ज्यादा उत्पादन मध्य प्रदेश में होता है। जबकि, बुंदेलखंड को दाल का कटोरा कहा जाता है। दलहनी फसलों पर भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान शोध करता है।
वर्ष 2025-26 के बजट में, सरकार ने 6 वर्षीय दलहन मिशन शुरू करने की घोषणा की है। इस मिशन में जलवायु अनुकूल बीजों के विकास और व्यावसायिक उपलब्धता, प्रोटीन सामग्री को बढ़ाने और उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। यह फसल कटाई के बाद भंडारण और प्रबंधन में सुधार और किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने पर भी ध्यान केंद्रित करेगा।


