पूजा श्याम
Bihar: हमारा अन्नदाता किसान है। यह बात तो हम सभी कहते हैं। लेकिन जब यही अन्नदाता जब संकट में होते है तब उसकी पीड़ा सुनने वाला कोई नहीं होता है। सासाराम के कोटा गांव की कई महिलाएं वर्षों से खेती-किसानी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करती हैं। खेतों में मेहनत कर सब्जी उगाने वाली ये महिलाएं आज खुद दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही हैं। महंगाई और गिरते बाजार के भाव ने इन महिला किसानों की स्थिति को दयनीय बना दिया है। हालात इतने बिगड़ चुके हैं, कि मुनाफा तो दूर की बात हैं, वे अपनी लागत तक नहीं निकाल पा रही हैं।
क्या कहती है महिला किसान
गांव की किसान महिला अंजू देवी ने बताया की खाद, बीज और दवाइयां महंगी हो गई है। लेकिन हमारी फसल के दाम गिरते जा रहे हैं। हम अपनी पूरी मेहनत खेतों में लगा देते हैं। लेकिन जब हम बाजार में मटर बेचने जाते हैं। तो हमें केवल 10-20 रुपये प्रति किलो का भाव मिलता है। जबकि वहीं मटर बाजार में 70-80 रुपये प्रति किलो बिकता है। इस बाबत गोभी की खेती हुई तब बाजार में दाम मात्र 2 रुपये प्रति किलो था। हालांकि ऐसी कई सब्जियां हैं, जिन्हें बेचना घाटे का सौदा बन गया।
खेती में लागत ज्यादा और आमदनी कम
वहीं दूसरी किसान रेणु देवी अपनी परेशानी बातें हुए कहती हैं, कि हम सालभर मेहनत करते हैं। और बहुत मुश्किल से एक लाख रुपये की सब्जियां बेच पते हैं। लेकिन जब खेत का किराया और मजदूरी वे खेती की अन्य लागत जोड़ते हैं। तो साल के अंत में हाथ में कुछ भी नहीं बचता। सरकार कहती है। कि किसानों की आय दोगुनी होगी। लेकिन हकीकत यह है। कि लागत दोगुनी हो गई और हमारी आमदनी आधी रह गई है।
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बुनियादी सुविधाओं का अभाव
रोहतास गांव की अन्य महिलाओं का कहन हैं, कि किसानों के लिए सिर्फ खेती ही चुनौती नहीं है। बल्कि बुनियादी सुविधाओं की कमी भी उनकी परेशानी बढ़ा रही है। गांव में ना तो सही तरह से बिजली व्यवस्था है। और ना ही सिंचाई व पीने के लिए पर्याप्त पानी है। रेणु देवी ने कहा अगर उनके पास आधुनिक सिंचाई के साधन होते। तो कम लागत में बेहतर उत्पादन हो सकते थे। लेकिन ना तो सरकारी मदद मिल रही है। और ना कोई योजना सही तरीके से उन लोग तक पहुंच रही है। कुछ महिलाओं ने बताया कि उनके पति या तो दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। और कुछ पुरुष ठेला चलाते हैं। लेकिन दोनों की आमदनी मिलाकर भी घर के खर्च नहीं निकल पाते। और कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। खेती में लगातार घाटे के कारण वे मजबूरी में इस पेशे को छोड़ने का भी विचार कर रही है।
कृषि में बढ़ती लागत को नियंत्रित करें सरकार
किसानों की स्थिति केवल कोटा गांव की नहीं, बल्कि कई गांव की कहानी बयां करती है। अब महिलाओं का सहारा सरकार और प्रशासन है। क्या इन्हें उनकी मेहनत का वाजिब मूल्य मिल पाऐंगा या फिर ये महिलाएं अपनी तकदीर के भरोसे संघर्ष करती रहेंगी। जाहिर है कि सरकार को इन महिला किसानों को विशेष समर्थन देना चाहिए। उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करे और कृषि में बढ़ती लागत को नियंत्रित करें।

