नाटक और नौटंकी हमारे सामाजिक जीवन में कितने गहरे तक जुड़ी रही होगी इसका पता इससे भी लगाया जा सकता है कि हमारी आम बातचीत में आज भी इन शब्दों का प्रयोग खूब किया जाता है। ये अलग बात है कि हम इनका प्रयोग झूठ या फरेब के पर्याय के रूप में करते है कि, ‘ नाटक मत करो‘, नौटंकी बन्द करो‘ शायद इस कारण कि नाटक या नौटंकी वास्तविक दुनिया का एक फरेब उत्पन्न करती है, वास्तविकता की नकल,उसका अभिनय करती है। एैसा लगता है कि नौटंकी अब शब्द के रूप में हमारी बातचीत में ही सिमट कर रह जाएगी।
अधिक समय नही हुआ जब भारतखण्डे संगीत संस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति एवं प्रसिद्व शास्त्रीय गायक विद्याधर व्यास को प्रसिद्व नौटंकी कलाकार गिर्राज प्रसाद की उपस्थित में गिर्राज प्रसाद पर शरद नागर की लिखी पुस्तक के लोकार्पण समारोह में आमंत्रित किया गया था। वृद्व गिर्राज प्रसाद से लोगो ने कुछ छन्द सुनाने का बहुत अनुरोध किया तो वे इस अनुरोध को टाल न सके और जब उन्होने सुनाना शुरू किया तो विद्याधर व्यास बस मुग्ध होकर उन्हे सुनते ही रह गये।
वास्तव में एक कुशल नौटंकी कलाकार जब छन्दों को सुनाता था तो कभी उनमें शास्त्रीय संगीत की गहरी छाया दिखायी देती थी तो कभी लोकसंगीत का स्निग्ध स्पर्श। प्रायः शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के बिना भी परम्परा से मिले ज्ञान के कारण वह जब प्रस्तुति देता था तो शास्त्रीय संगीत के दिग्गज कलाकार भी आश्चर्य चकित रह जाते थे। इसी प्रकार नक्कारा वादक की कठिन लयकारियां भी विस्मय में डाल देती थी। तीन- चार दशक पहले तक नौटंकी की धूम थी। नक्कारा बजता तो मजमा जुट जाता। नौटंकियां होती तो दूर दराज के लोग जुटते और रात-रात भर नौटंकियां देखते। पहले नौटंकी दलो में पुरूष ही महिलाओ की भूमिकाए करते थे लेकिन धीरे-धीरे कई महिलाए भी इसमें शामिल हुई। एैसी महिलाओ में गुलाब बाई, कमलेश लता जैसे नाम प्रमुख है। लेकिन जब रेडियो और फिर सिनेमा जैसे माध्यम अधिक प्रभावी होने तो नौटंकी ने खुद को बचाए रखने के लिए इसमे तमाम समझौते भी किए। लोगो को लुभाने के लिए इसमें सस्तापन शामिल होने लगा। फिल्मी गीतो पर धुने बनने लगी।
भौड़े प्रदर्शन होने लगे और नौटंकियो को अर्थ अश्लील प्रदर्शनो से लिया जाने लगा । इससे नौटंकी की काफी बदनामी हुई। नौटंकी वैसे भी कभी अभिजात्य वर्ग के बहुत करीब नही रही लेकिन इस बदलाव ने उसे उसके उन चाहने वाले से भी दूर कर दिया जो इसके पारम्परिक रूप के प्रति गहरा लगाव रखते थे। हला कि यह बदलाव केवल नौटंकी को लेकर नही था, विभिन्न लोकविद्याओ को अपने को बचाने के लिए एैसे समझौते करने पड़े।
नौटंकी को पुनर्जीवित करने में लगे और अपनी ‘हरिश्चन्नर की लड़ाई‘ और ‘तुम सम पुरूष ना मो सम नारी‘ जैसी नौटंकियो के लिए चर्चित उर्मिल कुमार थपलियाल मानते है कि लखनऊ की तुलना में कानपुर, हाथरस, मथुरा,फैजाबाद, बांदा के नौटंकी दलो की अधिक पूछ रही है और ये ही दल लखनऊ आकर नौटंकियो करते रहे है। अलग- अलग जगह के नौटंकी दल अपनी विशिष्टताए भी रखते थे जिससे उनकी नौटंकियो की माॅग रहती थी।
नौटंकी की उपेक्षा पर चिन्ता जताते हुए वरिष्ठ रंगकर्मी राज बिसारिया कहते है कि महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल मे रंगमंच को लेकर जिस तरह के संस्कार है वह हिन्दी प्रदेशो में नही विकसित हो सके। उनकी लोकनाट्य तमाशा या नाच को तो आज भी सम्मान प्राप्त है। लेकिन नौटंकी उपेक्षित है। वह कहते है कि हिन्दी प्रदेश में रंग संस्कार इस कारण भी नही पड़े कि इन्हे स्कूल या कालेज में इन्हे जगह नही दी गयी। ‘आला अफसर‘ जैसी नौटंकियाॅ लिखने वाले साहित्यकार मुराक्षस हो या फिर रंगकर्मी आतमजीत सिंह और उर्मिल कुमार थपलियाल हो, नौटंकी को पुनर्जीवित करने के प्रयास को लेकर आज एक द्वंद भी है। कुछ संस्कृतिकर्मी मानते है कि नौटंकी को अगर जीवित रखना है तो उसे उसके पारम्परिक रूप में ही बनाए रखना चाहिए। जब कि कुछ लोगो का विचार है कि इसे समय के साथ बदलना भी होगा और इसमें आधुनिक कलारूपो को शामिल करने से परहेज नही किया जाना चाहिए।
नौटंकी के छंदः दोहा, चैबोला, दौड़, बहरतबील, दुबोला, सोहनी, लावनी, कड़ा, वीर छन्द, कव्वाली, रेखता, गजल, दादरा, माॅड़, कालगंडा, रंगत, लंगडी, दादरा ईमन, ठुमरी।
बीते दौर की कुछ लोकप्रिय नौटंकिया सुल्ताना डाकू, लैला मजनू, शीरी फरहाद, आलम आरा, अमर सिंह राठौर, सत्यवादी हरिश्चन्दª, सत्यवान सावित्री, पूरनमल, माॅंडो की लड़ाई।
साभारः अमर उजाला(चौपाल)
