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‘सैफई महोत्सव’——-बेहाल किसान…खुशहाल सैफई

आलोक रंजन,युवा पत्रकार बुन्देलखण्ड में किसान सूखे और मौसम की मार झेलने और घांस की रोटी और भाजी खाने की तस्वीर भले ही चर्चा में हों, लेकिन सैफई तो सैफई है, अपने रंग में है, हो भी क्यों न ? सूबे की सरकार और इसके मुखिया का गाँव जो है। चहक रहा है, थिरक रहा …

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यादो में ही न रह जाए नौटंकी

  नाटक और नौटंकी हमारे सामाजिक जीवन में कितने गहरे तक जुड़ी रही होगी इसका पता इससे भी लगाया जा सकता है कि हमारी आम बातचीत में आज भी इन शब्दों का प्रयोग खूब किया जाता है। ये अलग बात है कि हम इनका प्रयोग झूठ या फरेब के पर्याय के रूप में करते है …

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