अबकी बार अनपढ़ों की बाढ़

मनीष अग्रहरि

हरियाणा सरकार ने पंचायत चुनाव में शैक्षणिक योग्यता को लागू करने का फैसला क्या किया चारों तरफ से इस विषय पर चर्चा शुरू हो गयी है। किसी का दावा है कि इससे पंचायत प्रतिनिधि मजबूत होंगे तो किसी का आरोप है कि इससे बहुत बड़ी आबादी चुनाव लड़ने से वंचित हो जाएगी। लेकिन अभी हाल में संपन्न यूपी पंचायत चुनाव के बाद भले ही मीडिया ये नारे गढ़ रहा हो कि “ अबकी बार पढ़े लिखे प्रधान” लेकिन मेरा मानना है कि देश की मीडिया आम तौर पर भेड़ चाल चलने को आदी है। फिर वो चाहे प्रिन्ट हो या इलेक्ट्रानिक। कुछ ऐसा ही इस बार सम्पन्न हुए प्रधानी चुनाव के नतीजो मे देखने को मिला। मगर खंगालने पर पता चला कि हकीकत तो इससे ठीक उलट ही है। साल 2010 के आंकड़ो से तुलना करने पर यह आसानी से समझा जा सकता है कि यहां तो अंगूठा टेक प्रधानो की संख्या लगभग दुगुनी हो गई है।

ऐसे में हरियाणा के पंचायत चुनावो को लेकर मचा शोर शराबा यू पी के नतीजो से नये बहस को जन्म दे सकती है। दर असल मे सन् 2010 में हुए पंचायत चुनावो में निरक्षर प्रधान मात्र 5.7 फीसदी ही थे मगर इस बार निरक्षर प्रधानो की संख्या 9.59 फीसदी जा पहुची है। परास्नातक पास प्रधानो की संख्या लगभग जस की तस है तो वही स्नातक, हाईस्कूल, इंटरमीडिएट पास प्रधानो की संख्या भी घट गई। कुछ अच्छा दिख रहा है तो यह कि प्राइमरी पास प्रधानो की संख्या मात्र एक फीसदी बढ़ी तथा प्रदेश में 13 प्रधान पीएचडी डिग्री धारी है। अगर डिग्री के इतर कुछ जानकारी की बात करें तो कई प्रधानो को यह नहीं पता की उनके देश का प्रधान मंत्री, राष्ट्रपति का नाम क्या है। कई तो ये भी नहीं जानते की प्रदेश का मुख्या मंत्री का नाम क्या है या जिलाधिकारी का काम क्या है?

प्रधान जी की पढ़ाई (आॅकड़े प्रतिशत में)

शैक्षणिक योग्यता      2015        2010

निरक्षर                 9.59         5.7

प्राईमरी                40.04        39panchayat chunao up

आठवी पास            13.39       12.67

हाईस्कूल              11.52       14.80

इंटरमीडिएट            11.43       13.42

स्नातक               10.39         10.75

परास्नातक              3.61        3.62

 

कुछ और अच्छी बाते करे तो प्रदेश में पंचायत चुनावो में महिलाओ का 33 फीसदी आरक्षण है मगर 44 फीसदी सीटे महिलाओ के हवाले है। 35 फीसदी सीटे युवाओ (35 साल से कम उम्र) के हवाले है। यहाँ पर उल्लेखनीय है कि महिलाओं की भागीदारी भले ही बढ़ गई है मगर वो आज भी गाँव मे महज मर्द की मोहरा भर बन कर रह गई है। इसकी पुष्टि आप इस बात से आराम से पा सकते है कि जब जीत का ताज प्रधान पति ही पहनता है, प्रखंड विकास कार्यालय मे हाजिर होने का काम एवं गांव का सारा काम प्रधानपति ही देखता है तो 44 फीसदी महिलाए अपने पतियो की मोहरा नही तो और क्या है। इनसे योजनावो को सही तरीके से लागु करने और विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया को मजबूत करने के साथ ग्राम स्वराज के सपने को पूरा करने की बात सोचना भी बेमानी है। ऐसे में कुल मिलाकर यह कहना अतिश्योक्ति नही होगा कि अबकी बार अनपढ़ प्रधानो की बाढ़।

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