संतोष कुमार सिंह
समाज प्रगती कर रहा है। बेटियों को बराबर का दर्जा मिले यह सोच है। पढ़ेगी बेटी, बढ़ेगी बेटी का नारा गूंज रहा है। बेटी के साथ सेल्फी भी लिए जा रहे हैं। लेकिन आज भी हमारा ग्राम समाज बेटिंयों से भेदभाव,उनके लालन—पालन में बेटों की तुलना में अंतर जारी रखे हुए है। वे रिश्ते नाते तो जोड़ती हैं लेकिन कुछ नाते उन्हें भारी पडते हैं। वे दहेज के लिए सुलगाई जाती हैं तो कहीं डायन बुलाई जाती है, तो कभी उनके देह का सौदा होता है, तो कभी वह चंचल हिरणी सी कुलांचे न भर सके इसलिए उसे पांगल बताया जाता है। लेकिन पागल का भी शरीर पर हक नहीं होता..उसे तरेंगनी की तरह आसमान में टिमटिमाने नहीं दिया जाता, डर है कहीं ध्रुवतारा न बन जाये। क्योंकि समाज इस समझ को स्वीकार ही नहीं कर पाता कि बेटियां अभिशाप नहीं आशीर्वाद होती हैं…
एक ही ऐसी ही बेटी यानी तरेगनी की कहानी लेकर आया है गांव वाला क्रिएशन…जिसे दूरदर्शन पर सोमवार से गुरूवार तक रात 10 बजे दिखाया जा रहा है। कहानी है उस लड़की की जो खोयी खोयी सी रहती है..जिसे डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिस आॅर्डर जिसे मेंटल डिस आॅर्डर भी कहते हैं। आज हमारे देश में इस बीमारी से ग्रसित हज़ारों लाखों लड़कियां हैं। इस बीमारी के लिए ज़िम्मेदार कोई और नहीं जाने-अनजाने उनके अपने ही होते हैं। जी हां, समाज के वही लोग जिनमें से किसी के लिए वह मां, किसी के लिए बेटी बेटी और किसी की बहन और पत्नी होती हैं।
अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, रोशीनी के आने में रुकावट नहीं बनता… शायद इसलिए अंधेरे की शक्ल हर जगह एक जैसी होती है। तभी तो तरेगनी की ज़िन्दगी में आज भी तरंग है। बदकिस्मत तरेगनी की खुशकिस्मती यही तो थी कि नभ उसे बहुत प्यार करता था। लगभग तीन साल लगे तरेगनी को उसके अकेलेपन से निकालने में। लेकिन हमारे देश की उन लड़कियों का क्या होगा जिनकी तक़दीर तरेगनी जैसी नहीं है। तरेगनी हमेशा अपनी छह बहनों के साथ होती है। अपने घर के आसमान में उछलती, कूदती अपनी बहनों को इसी आसमान के हिसाब से सजाती-संवारती है। मगर बाहर की दुनिया में उन्हें कभी जाने नहीं देती। उसका बाहर की दुनिया से कोई लगाव या सरोकार नही होता। दूसरे शब्दों में कहें तो घर की दहलीज़ के बाहर दुनिया या समाज एक स्त्री के स्त्रित्व को जिस तरह से नकारता है, उसी नकारात्मक सोच की उपज है, तरेगनी।
तरेगनी नाम है एक लड़की का या एक लड़की की सोच का, या एक लड़की के साथ होने वाले समाज के बुरे बर्ताव का। सच कहें तो आज की हर उस लडकी का नाम है तरेगनी जो सामाजिक उपेक्षा का दंश झेल रही हैं। बगैर यह समझे-बूझे कि आखिर उनका कुसूर क्या है?
तरेंगनी समाज से पूछ रही है उसका कसूर क्या है? सोचिए न उसका कुसूर क्या है और अपनी सोच को विकसित होते देखेंगे गांव वाला क्रिएशन हाउस प्रोडक्शन हाउस के सीरियल तरेंगनी में। जैसे जैसे सीरियल आगे बढ़ेगा पंचायत खबर बच्ची और समाज के बीच के अंर्तद्वंद के सभी पहलूओं को समेटते आपके साथ होगा तरेंगनी की कहानी कहने के लिए। इस सीरियल के निर्माण के पीछे के सोंच को रेखांकित करने के लिए।
