दिल..दिमाग …सरकार सब आबाद, फिर किसान बर्बाद क्यों?

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संतोष कुमार सिंह

नयी दिल्ली: सूखे की अपनी राजनीति है, सूखे की अपनी सामाजिकता है, सूखे का अपना अर्थशास्त्र है..अपने आंकड़े हैं, अपने—अपने दावे हैं और इन दावों के बीच पिसता है हमारा अन्नदाता। जो कभी सूखा परने पर खेत में ही दम तोड़ देता है, तो कभी बिस्तर पर। तो कभी इस उम्मीद में कि उसे घोषित मुआवजा मिलेगा,बैंक और खुद उनके द्वारा चुनी गयी सरकार कर्ज माफ करेगी। सूखा पड़ता है..सिर्फ एक साल नहीं लगातार दूसरे साल। बीच में जो थोड़ी बहुत बारिश होती है उसमें किसान फसल लगाता है,लेकिन ओला वृष्टि फसल नस्ट कर देती है। ऐसे में हमारा अन्न दाता करे तो क्या? सरकार बहादुर का मुंह ताक रहा है। सरकार बहादुर अभी आकलन करने में लगे हैं कि कितना मुआवजा मिले। तय भी कैसे हो, जब सूखे के प्रभाव को लेकर केंद्र सरकार के अलग दावे, राज्य सरकार के अलग दावे, किसान संगठनों के अलग दावे। लेकिन सरकार बहादुर भी खुश हैं। अनुमान आया है अगले साल 106 फीसदी बारिश होगी। कुछ इसी तरह के पेशोपेश में चाहे बुदेंलखंड का किसान हो या मराठवाड़ा या फिर देश के अन्य ईलाकों का गाहे बगाहे मौका मिलते ही फंदा डाल देता है। और फिर कुंभकरनी नींद खुलती है चर्चा भी होती है..इंतजार शुरू हो जाता अन्नदाता के अच्छे दिन का।

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आज सूखे को लेकर एक इसी तरह की परिचर्चा इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट के सभागार में हुई। नाम दिया गया…”सूखा पर राष्ट्रीय मशविरा : चूँकि दिल और दिमाग़ नहीं सूखा”। आयोजक था स्वराज अभियान का जय किसान आंदोलन और इसके साथ जुड़े कई किसान संगठन। दिल भी आबाद, दिमाग भी आबाद..सरकार बहादुर भी आबाद तो फिर किसान बदहाल क्यों?

खैर देखते हैं इस परिचर्चा में क्या कहा गया। “सूखा पर दृष्टिकोण” नामक पहले सत्र की अध्यक्षता स्वराज अभियान के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अग्रणी समाजशास्त्री प्रोफेसर आनंद कुमार ने की। इस सत्र में ‘डाउन टू अर्थ’ पत्रिका के सूखा विशेषांक का विमोचन भी हुआ। जय किसान आंदोलन के राष्ट्रीय सह-संयोजक और कृषि कार्यकर्ता अभीक साहा ने बताया कि स्वराज अभियान का जय किसान आन्दोलन और इसके साथी किसान संगठन अक्टूबर 2015 से सूखा पर काम कर रहे हैं। सूखा प्रभावित जिलों में चार यात्राएं हुईं, सर्वे किए गए। सर्वे में कई चौंकाने वाले परिणाम सामने आए जिससे सरकार को अवगत कराया गया और कार्रवाई के लिए दबाव बनाया गया। इस राष्ट्रीय मशविरा से निकले परिणाम को भारत के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में ले जाने और क्रियान्वयन के लिए स्वराज अभियान के जय किसान आन्दोलन और साथी किसान संगठनों ने निर्णय लिया है कि –

– 21 मई 2016 से मराठवाड़ा और बुंदेलखण्ड में 10 दिवसीय पदयात्रा होगी।

– सूखा प्रबंधन और राहत कार्य में स्थानीय पहल और भागीदारी बढ़ाने के लिए सभी तहसील और जिलाओं में राहत समितियों का निर्माण होगा। 

– सूखाग्रस्त गाँवों को देखने, वहाँ रहने और वहाँ के लोगों को मदद करने के लिए देशभर के विद्यार्थियों और युवाओं का आह्वान किया जाएगा।

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सूखा पर इस राष्ट्रीय विमर्श में यह भी  रेखांकित हुआ कि देश के 13 राज्यों में,  कुल जनसंख्या के पाँचवे हिस्सा का दोगुना, यानि 54 करोड़ किसान और ग्रामीण सूखा की गिरफ्त में हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जिनके लिए सूखा लगातार दूसरे या तीसरे साल आया है। लोग पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। खाद्यान्न की कमी है। लोग किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं। भूखे-प्यासे घरेलु पशु खुला छोड़ दिए गए हैं, मर रहे हैं। खेत बंजर पड़े हैं। जीवन और जीविका में ठहराव आ गया है।

स्वराज अभियान की राष्ट्रीय संयोजन समिति के सदस्य और अग्रणी जनहित अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने स्वराज अभियान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर सूखा राहत जनहित याचिका में उठाए गए महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रस्तुति दी। इस याचिका में माननीय न्यायालय से प्रार्थना की गई है कि न्यायालय केंद्र सरकार एवं 12 राज्यों को सूखा प्रबंधन नियमावली के तहत त्वरित राहत पहुँचाने का निर्देश दे। सर्वोच्च न्यायालय में याचिका की सुनवाई समाप्त हो चुकी है और जल्द ही निर्णय आने वाला है। प्रशांत भूषण ने लोगों के ध्यान में लाया कि कैसे केंद्र सरकार ने कोर्ट में सारी कोशिशें की कि कानूनी कर्तव्य पूरी करने से बच जाए। यहाँ तक कि सरकार ने कोर्ट में गलत और भ्रामक सूचनाएँ दी।

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सूखा पर राष्ट्रीय विमर्श की समाप्ति “आगे की राह पर परिचर्चा“ से हुई। प्रसिद्ध पर्यावरण विशेषज्ञ सुनिता नारायण, अंतरराष्ट्रीय स्तर के कृषि, खाद्य और ट्रेड पॉलिसी के विशेषज्ञ देविंदर शर्मा,  प्रसिद्ध टीवी एंकर राजदीप सरदेसाई, व्यापक रूप से सम्मानित प्रशासक नंदा कुमार और जय किसान आन्दोलन के राष्ट्रीय संयोजक और स्वराज अभियान के नेता योगेन्द्र यादव ने विचार-विमर्श किया कि सूखा के प्रभाव को कम करने के लिए सभी स्तर पर क्या कदम उठाए जाने चाहिए। इस सत्र में परंपरागत और स्थानीय जल संरक्षण की पहल, स्थानीय परिस्थिति के योग्य खेती विधि, जलवायु अनुरूप पारंपरिक अनाज, दाल, तिलहन, सब्जी और बागवानी जैसे नए विचार एवं कार्य योजना का सुझाव दिया गया और गहराई से विचार किया गया। सूखा प्रबंधन के समूचे वैधानिक और प्रशासनिक ढाँचे के एकीकरण और संवेदीकरण की जरूरत है जिससे सूखा राहत को कर्तव्य के रूप में समझा जाए न कि परोपकार। पैनल ने इस बात पर जोर दिया कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जल संरक्षण, वहनीय कृषि और इनसे जुड़े अन्य क्षेत्रों के सभी विशेसज्ञों, कार्यकर्ताओं, संगठनों और संघों को एक साथ आकर मौजूदा सूखे की त्रासदी को समझ कर बारीकी से जांच करना चाहिए और  लघु, मध्यम और दीर्घ काल में इससे निपटने के उपायों को ढ़ूढ़ना चाहिए।

 

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