देखन में छोटन लगे तीखापन भरपूर, लौंगिया मिर्च किसानों की आमदनी भरपूर

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वर्षा वर्मा

पटना: वैसे तो मिर्ची के कई प्रकार हैं लेकिन उसी में मिर्च की एक खास वेराईटी है लौंगिया मिर्च। ठीक उसी कहावत की तर्ज पर देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर। यानी भले ही इसकी साईज अन्य मिर्च की तुलना में छोटी होती है लेकिन होती काफी तीखी है तभी तो लोग कहते हैं लौंगिया मिर्च है। और इसी लौगिंया मिर्च की खेती कर बिहार के बेगूसराय जिले में किसान लाखों की कमाई कर रहे हैं। इतना ही नहीं जिले का प्रसिद्ध और आकार में बहुत ही बड़ा गांव चमथा की पहचान भी मिर्च की खेती की वजह से ही है।

 

क्या कहते हैं मुखिया
इस बाबत पंचायत के मुखिया का कहना है कि मिर्च की खेती करने से किसानों की आर्थिक स्थिति में भी सुधार हो रहा है। बेहतर बचत और कमाई के कारण किसान पारंपरिक खेती से हटकर मिर्च की खेती कर रहे हैं। दरअसल बेगूसराय जिले का चमथा गांव मिर्च उत्पादन करने वाले किसानों के लिए स्वर्ग साबित हो रहा है। इस गांव के मुखिया संजय राय ने उनके गांव से प्रतिदिन 5 ट्रक हरी मिर्च की सप्लाई होती है। इनमें चमथा एक पंचायत से तीन पिकअप वाहन और चमथा दो से भी तीन पिकअप वाहन और चमथा के ही बिशनपुर से पिकअप जाते हैं। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि प्रतिदिन कितने क्विंटल मिर्च यहां से सप्लाई होती है। पंचायत में करीब 15 हजार की आबादी है। मिर्च की खेती से कम से कम दो सौ से ज्यादा किसान जुड़े हुए हैं।

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इन राज्यों में होती है सप्लाई
पंचायत के मुखिया संजय ने कहा कि चमथा में उत्पादित होने वाली मिर्च पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड के अलावा बिहार के करीब सभी जिलों में सप्लाई होती है। जहां से डिमांड होती है, वहां सप्लाई की जाती है। उन्होंने कहा कि मिर्च की खेती से इलाके के किसानों की आर्थिक हालात में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। बाढ़ आने की वजह से किसानों को नुकसान होता है। अगर बाढ़ का कहर न हो तो मिर्च का उत्पादन भरपूर होता है। जिससे किसानों की आर्थिक हालत बेहतर हो जाएगी।

 

मिर्च की खेती से लाखों की कमाई
चमथा के किसानों ने पहले लंबे आकार वाली हरी मिर्च की खेती की, इसके बाद लौंगिया मिर्च की खेती शुरू कर दी है। और बाजारों में इसकी डिमांड भी है, थोक के साथ खुदरा खरीदार लौंगिया मिर्च को पसंद कर रहे हैं। इसकी बाजार में डिमांड और बेहतर आमदनी के कारण किसान मिर्च की खेती कर रहे हैं। कभी-कभी इतनी डिमांड हो जाती है कि थोक में ही सौ रुपए प्रति किलो तक का दाम मिल जाता है। हालांकि थोक में कभी भी 30 रुपए प्रति किलो से नीचे दाम नहीं आता है। इस इलाके में हाइब्रिड, देशी, हरे व काले रंग वाली मिर्च की खेती होती है। हालांकि किसानों ने कहा कि सरकारी स्तर पर फिलहाल कोई मदद अब तक नहीं मिली है। पंचायत के मुखिया संजय राय ने कहा कि गांव के किसानों ने पहले कम स्तर पर मिर्च की खेती की शुरुआत की थी। लेकिन धीरे-धीरे मिर्च की खेती से ही गांव की पहचान बन रही है। दूर दूर तक मिर्च जा रही है, किसान पारंपरिक खेती से हटकर मिर्च की खेती की तरफ जुड़ते जा रहे हैं।

 

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